चम्पा ने जिसके ऊपर पत्थर फेंका था ,वो और कोई नहीं ,इंस्पेक्टर विकास ही था ,जो उसी से मिलने आया था, किन्तु अँधेरे में, किसी गड्ढे के कारण उसकी बाइक का बेलेंस बिगड़ गया और वो पानी के गडढे में गिर गया। चम्पा ने उसे ही ,कोई बदमाश समझ ,उस पर ही पत्थर फेंककर मारा और भाग गयी। सुबह जब विकास उससे मिला ,तब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। तब विकास ने उस पर धीरेन्द्र के खून का भी इल्ज़ाम लगा दिया। किन्तु वो बुरी तरह घबरा गयी और उसने इंकार किया। किन्तु वो अपनी घबराहट में एक बात अवश्य बोल गयी ,वो तो मुझे पसंद करते थे। तब विकास के मन में विचार कौंधा -कहीं ये ,जलन का मामला ही न हो या उनका रिश्ता ,इससे कहीं आगे जा रहा हो ? इसी कारण ,से ये हत्या हुई हो। वो चम्पा के साथ -साथ ही आगे बढ़ने लगा और पूछा -तुम्हारे साहब ,तुम्हें कितना पसंद करते थे ?
जी मैं ,कुछ समझी नहीं !
अब तुम इतनी बच्ची भी नहीं ,जो समझ न सको। तुम उस घर की नौकरानी थीं और तुम्हारे कपड़े इतने अच्छे ,और तुम्हारे हिसाब से महंगे भी हैं ,क्या तुम्हें अलग से पैसे मिलते थे ?
चम्पा का चेहरा सफेद पड़ गया ,अब वो क्या कहे ? कुछ समझ नहीं आया घबराहट के कारण बोली -मुझे देरी हो रही है , कहकर वो आगे बढ़ी।
विकास ने उससे पूछा -वो फोन भी ,तुम्हीं करती हो न.... उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा और चली गयी।
अभी मुझे ,टीना से भी मिलना है ,एक बार पहले भी मिला था किन्तु ज्यादा कुछ नहीं ,अब तो इस केस को बरसों हो गए ,अब इसे समाप्त करना ही होगा।
आज थाने में ,एक अलग ही केस आया था , उसी में सारा दिन लग गया ,समय ही नहीं मिला , अब होली भी आ रही है ,भीड़ भी ज़्यादा बढ़ रही है।लोग छुट्टियों में ,अपने घरों में ,अपने परिवार के पास वापस लौट रहे हैं। शराब के ठेकों पर भी बहुत भीड़ है ,शराब भी,खूब बिक रही है। इसी कारण ,विकास की ड्यूटी भी बढ़ गयी है। शाम को थक हारकर जब अपने घर पहुंचा ,तो गर्मागर्म खाना जोरावर ले आया। खाना बहुत ही स्वाद था ,खाना खाते ही विकास सो गया।
चम्पा अबकी बार गुझिया थोड़ी ज्यादा बनाना ,अबकि बार संस्था में बच्चे कुछ ज्यादा हो गए हैं। हम होली उन्हीं के संग मनाएंगे। दही -बड़े भी बना लेना।
जी दीदी ! मैं अकेली इतना सब कैसे बनाऊँगी ?
अरे तू चिंता क्यों करती है ?हम दोंनो माँ -बेटी हैं ,न.... हम तेरी सहायता करेंगी और अब तो अथर्व भी बड़ा हो गया। वो भी गुझिया खायेगा।
खायेगा ,कि बनवाएगा। कहकर चम्पा ने उसकी तरफ देखा ,बस वो मुस्कुराता रहा।
तू क्या सोचे बैठी थी ?बनवायेगा !वो तो हमारा राजा बेटा है ,खाना जानता है ,कहने के साथ ही नीलिमा ने उसे गले लगाते हुए उसके बालों पर हाथ फेरा। फिर उससे पूछा -बनवायेगा ,वो बस मुस्कुराता रहा।
शाम को नीलिमा ,और उसकी बेटी कल्पना ,होली के सामान की खरीददारी करने बाजार जातीं हैं। बाजार में बहुत ही भीड़ है। उसे तो कुछ निश्चित दुकानों पर ही जाना होता है। बहुत पहले से उन्हीं से खरीददारी करती आ रही है।
मम्मी ! ये आप कहाँ ले आईं ,यहाँ इतनी भीड़ है ,कौन खड़ा रहेगा ? बेटे ,ये दुकानदार पहचान का है , ठीक दामों में ,सही सामान देता है। तभी भीड़ का लाभ उठाकर ,एक तरह -चौदह बरस का लड़का ,नीलिमा का पर्स छीनकर भागने लगता है ,तभी उसकी बेटी भी उसके पीछे दौड़ती है।
नीलिमा भी पीछे से चिल्लाती है ,पकड़ो उसे पकड़ो !
आखिर वो लड़का पकड़ा ही गया ,और भीड़ उसके ऊपर चढ़ गयी ,नीलिमा भी भागती हुई आई और उस भीड़ को चीरकर, उस लड़के के पास जा पहुंची। उसने देखा ,वो कमजोर सा बच्चा ,बिना किसी रहम के भीड़ उस पर टूट रही है। नीलिमा उस बच्चे को बचाने के लिए, आगे बढ़ती है ,इस बीच -बचाव में एक -दो हाथ उसे भी पड़ जाते हैं। तभी वो तेजी से चिल्लाती है ,बस करो ,बस करो ! धीरे -धीरे लोग पीछे हटने लगते हैं। नीलिमा ने देखा वो दुबला -पतला ,सूखा सा लड़का ,उसका होंठ फट गया था ,भीड़ जब मारती है ,तो देखती भी नहीं ,कि चोट कहाँ लग रही है। थोड़ी ही देर में उसे किसी जानवर की तरह धुन दिया था। वो लड़का खड़ा काँप रहा था ,उसकी पहले से ही फटी हुई कमीज और भी ज्यादा फट गयी थी।
तभी एक आदमी की आवाज आई ,आजकल तो भलाई का जमाना ही नहीं ,जब तो चिल्ला रहीं थी कि उसे पकड़ो !और अब यही इसकी ढ़ाल बनी खड़ी हैं।
हाँ ,उसे पकड़ने के लिए ,कहा था ,मारने के लिए नहीं ,मेरा पर्स लेकर भागा है ,तो दण्ड भी तो मैं ही दूंगी। लोग उन्हें छोड़कर एक - एक कर जाने लगे।
क्या मम्मी ! अब इसके पास क्यों खड़ी हो ?
बेटा ! तुम देख नहीं रही हो ,इसका होंठ फट गया है ,इसे हमारी सहायता की आवश्यकता है। इसके कपड़े भी फट गए हैं ।
अब इससे पर्स तो पूछो ! बता हमारा पर्स कहाँ है ? कल्पना उसे डांटते हुए बोली।
वो तो भीड़ में से ही, किसी ने मेरे हाथ में से खींच लिया ,उस लड़के ने सुबकते हुए कहा।
देखा ,भीड़ में इनका ही कोई आदमी होगा ,उसे पकड़ा दिया होगा ,इनका तो पूरा गैंग चलता है। एक पकड़ा जाये तो दूसरा संभाल ले ,कल्पना ने अपनी माँ को समझाया।
चलो ,जो भी हुआ ,तुम जानते हो ,मैं ज्यादा पैसा साथ लेकर नहीं चलती ,तुमने चंद रुपयों के लिए ,कितनी मार खाई है ? तुम्हारे साथ कौन है ? तभी पुलिस के दो आदमी गस्त लगाते हुए उधर आये । उस बच्चे की ऐसी स्थिति देखकर बोले -क्या हुआ ? इसे !
जी कुछ भी नहीं, इसने किसी कारणवश मेरा पर्स चुरा लिया ,जिसका दण्ड साथ के साथ ,इसे यहीं मिल गया।
आप इनको नहीं जानतीं ,इनकी चमड़ी मोटी होती है ,इन्हें तो इतना दर्द सहने की आदत होती है। आपका पर्स तो मिल गया न....
जी नहीं ,भीड़ में से ही कोई ,इसकी पिटाई का फायदा उठाते हुए ,इससे वो पर्स छीनकर ले गया होगा।
इन लोगों का समूह होता है ,एक पकड़ा जाये तो दूसरा लेकर भाग जाता है।
नहीं साहब !मेरा कोई साथी नहीं ,मैं तो अपने पिता का हाथ बंटाना चाहता था।
किस चीज़ में ?चोरी में !
नहीं साहब ! मैं पढ़ना चाहता था ,और स्कूल गया भी ,किन्तु इस बार पिता काम पर नहीं जा पाये ,घर में खाने को भी नहीं ,न ही फ़ीस के पैसे हैं ,तब मैंने एक लड़के को ऐसे ही करते देखा तो मैंने भी करना चाहा किन्तु मैं पकड़ा गया।
अब इंस्पेक्टर साहब !पैसे न इसके पास हैं ,न ही मेरे पास ,अब आप उस चोर को ढूंढिए ,उस लड़के से बोली -तुम यहीं रुको !मैं जरा दुकानदार से बात करके आती हूँ कहकर नीलिमा उस लड़के और कल्पना को वहीँ छोड़कर दुकान पर जाती है।
मैडम !आपके पैसे मिल गए !
नहीं भैया !अब पैसे भी नहीं हैं ,अब सामान बाद में ले जाऊंगी।
नहीं ,मैडम आप कैसी बातें करती हैं ,पैसे भागे थोड़े ही जा रहे हैं ,आप सामान ले जाइये ,पैसे आते रहेंगे। थोड़ी नानुकुर के पश्चात नीलिमा सामान लेकर और लड़के को साथ लेकर चली जाती है।

