Asi bhi zindgi [part 96]

चम्पा रात्रि में, किसी अनजान पर पत्थर फेंककर मारती है ,वो इतनी डरी हुई थी ,उसने ये भी जानना नहीं चाहा ,कि वो कौन था ? उसका हितैषी या फिर कोई दुश्मन। हो भी क्यों न ?इस तरह अँधेरे में झाड़ियों में से कोई निकलेगा ,तो कोई भी ड़र सकता है। जिसमें कि वो अकेली थी ,रात्रि में शिकारी कुत्ते और इंसान में कोई फ़र्क ही कहाँ रह जाता है ? दोनों में फ़र्क सिर्फ़ इतना है ,कुत्ते के लिए इंसान ,इंसान है किन्तु पुरुष नारी की गंध की ओर खींचता है। रात्रि और एकांत दोनों ही एक नारी के लिए , ख़तरनाक साबित हो सकते हैं। समय तो कोई भी अनुकूल नहीं होता ,जब बुरा वक्त आता है ,तब बुद्धि स्वयं ही भ्र्ष्ट हो जाती है। जैसे चम्पा की हो गयी थी। उस समय धीरेन्द्र का  बुरा समय चल रहा था और चम्पा की बुद्धि भ्र्ष्ट हो गयी थी ,तभी तो दोनों ने ही ,अपनी सीमाओं का बांध तोड़ दिया। चम्पा ने अवश्य ही अपनी सीमाओं को लाँघा किन्तु वो चरित्रहीन नहीं थी, कि कोई भी ,कहीं  भी, उससे ,संबंध बना ले।


 

इसीलिए तो वो अंधेरे के डाकुओं से बचती है ,अपने घर में आकर अपने बिस्तर में लेट तो गयी किन्तु अब वो परेशान हो गयी। वो सोच रही थी -यदि माँ की बात, सच हुई तो वो, क्या करेगी ? अपने मन को समझाया ,यदि उसे ये पत्थर लगा भी होगा तो ज्यादा चोट नहीं आई होगी। छोटा सा पत्थर ही तो था ,बड़ी ईंट थोड़े ही थी। यही सोचकर, उसने अपने मन को सांत्वना दिया और सो गयी। 

अगले दिन सुबह नीलिमा के घर जाने से पहले ,वो उस तरफ गयी ,वहां न ही ,कोई आदमी था, न ही खून का कोई निशान ,हाँ ,वहां कीचड़ अवश्य हो रही थी ,मोटरसाइकिल के निशान अवश्य थे। हो सकता है ,यहाँ कोई आदमी आया हो और इस जगह आकर फंस गया हो ,वो तो स्वयं ही परेशान था। शायद किसी सहायता की उम्मीद से मेरी तरफ आ रहा होगा और मैंने भी न.... ''रस्सी को साँप समझ लिया।'' अब यहाँ ठहरने का कोई लाभ भी नहीं था ,उसे देरी हो जाती।

प्रभा का अगले दिन , सुबह ही फोन आ गया -गुड़ मॉर्निग ''इंस्पेक्टर साहब !कैसे हैं ?रात्रि को नींद तो अच्छी आई। 

हाँ -हाँ ,'गुड़ मॉर्निग ' मैं तो आते ही, थककर सो गया। हमें तो सुबह उठकर ,अपने काम पर  जाना होता है। आपकी तरह.... नहीं ,किन्तु उसे ध्यान आया, ये भी तो एक अध्यापिका है। आज तो इसे अपने स्कूल में होना चाहिए। बात का लहज़ा बदलते हुए बोला -आज इस समय कैसे याद किया ? क्या अध्यापिका साहिबा अपने स्कूल नहीं गयीं ,आप तो हमसे पहले  ही निकल जाती हैं। रात को नींद तो ठीक से आई ,शादी में से कब आये ? 

हाँ ,वो तो  है किन्तु वापस आने में हमें ,दो बज गए थे। सुबह नींद नहीं खुली ,लेट हो गयी ,वरना इस समय मैं स्कूल में ही होती। जब देरी हो ही गयी तो सोचा -इंस्पेक्टर साहब की खोज -खबर ली जाये। 

हम क्या अपने दिल के मालिक हैं ?जब चाहो ,छुट्टी ले लो ! हमें तो अपनी डयूटी बजानी ही पड़ती है। विकास ने व्यंग्य किया 

क्या कहा ?वो स्कूल मेरे पापा का नहीं है ,मैंने तो रात्रि में ही ,अपनी छुट्टी की अर्जी भेज दी थी किन्तु आज भी आधे दिन के बाद तो ,जाना ही है। आपकी तरह नहीं हूँ ,गैरज़िम्मेदार !

ये शब्द विकास को चुभा ,और बोला -गैरज़िम्मेदार ,ये तुम मुझे कैसे कह सकती हो ?मैंने ऐसी कौनसी गैरज़िम्मेदाराना हरक़त की ?

गैरज़िम्मेदार नहीं तो और क्या हो ? आपने एक बार भी फोन करके पूछा -प्रभा जी ,आप कैसी हैं , कभी -कभी ,'गुड़ मार्निग ' ही कर लें। वो तो मैंने ही, आज फोन कर लिया वरना आप कहाँ पूछने वाले थे ? 

प्रभा की बात पर इंस्पेक्टर को हंसी भी आई फिर बोला - अच्छा तो  बताइये ! लेखिका साहिबा !आप कैसी हैं ?आपकी क्या ख़िदमत कर सकता हूँ ? 

हाँ ,अब सही ,कहते हुए प्रभा ने घड़ी देखी ,अरे आप तो लेट हो जायेंगे ,आपको तो जाना चाहिए आपको  तैयार हो जाना चाहिए ,चलिए ,अब फोन रखती हूँ।

 नहीं -नहीं ,अब कोई फ़ायदा  नहीं है ,मैं हमेशा स्मार्ट वर्क करता हूँ ,तुमसे बातें करते -करते ही ,तैयार हो रहा था। 

''डेट्स लाइक ए गुड़ बॉय ''

थैंक यू ,मैम ! कहकर वो हंसने लगा। 

बाबू ,ने नाश्ता किया ,

जी मैम ! दोनों हंसने लगे, फिर मिलने का वायदा कर फोन रख दिया। घर से बाहर निकलते हुए विकास के चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी। उधर प्रभा भी ,मुस्कुराते हुए ,अपने दीवान पर जा बैठी।

चम्पा , थोड़ा आगे ही बढ़ी थी ,तभी उसे इंस्पेक्टर साहब ! नजर आ गए ,उनके माथे पर एक पट्टी लगी थी। कल तक तो ये ठीक थे ,आज इन्हें क्या हुआ ? किन्तु वो उनसे नजरें चुराकर जाने लगी।

अब कहाँ जा रही हो ?तुम्हारे खिलाफ़ रिपोर्ट दर्ज़ है ,तुमने कल किसी का सिर फोड़ दिया। 

इंस्पेक्टर की बात सुनते ही ,चम्पा रोने लगी और बोली -साहब ! मैं ड़र गयी थी, इसीलिए उस पर पत्थर मारा। इतना बड़ा पत्थर भी नहीं था ,जो सर ही फोड़ दे। मैं उससे माफ़ी माँग लूंगी ,चलिए ! मैं  आपके साथ चलती हूँ। 

कहीं जाने की जरूरत नहीं ,तुम अभी भी माफ़ी मांग सकती हो ,जिसका तुमने सिर फोड़ा वो तुम्हारे सामने है। 

वो आप थे ,आश्चर्य से बोली। मुझे नहीं पता था - कि आप हो ! पता होता ,तो सिर नहीं फोड़ती।

 किन्तु किसी को ट्रेन के आगे धक्का देकर  मार सकती हो। कल मैं तुमसे ही मिलने आ रहा था , वो पीछे जो इतना बड़ा गड्ढा है ,वहां मेरा बेलेंस बिगड़ गया और मैं सीधा झाड़ियों में गया ,वहाँ भी पानी था ,ऊपर से तुमने पत्थर फ़ेंक कर मारा। जब तुम मेरा सिर फोड़ सकती हो ,वो तो शुक्र है ,भगवान का ! कि मैं बच गया ,किन्तु धीरेन्द्र को तो तुमने सीधे ऊपर ही पहुंचा दिया। 

ये आप क्या कह रहे हैं ?

क्यों ? तुमने धीरेन्द्र को ट्रेन के आगे धक्का नहीं दिया। 

साहब !आप ये क्या कह रहे हैं ? भला मैं क्यों धक्का देने लगी ,मेरी उनसे क्या दुश्मनी थी ? वो तो मुझे पसंद करते थे ,तभी वो रुकी और बोली -आप ये इल्ज़ाम ,मेरे ऊपर किस वजह  से लगा रहे हैं ? आपके पास क्या सबूत है ?


सबूत तो तुम पहने खड़ी हो ? तुम्हारे ये कपड़े ,उस दिन इन्हीं कपड़ों में वो लड़की थी जिसने उस रात्रि को धीरेन्द्र को धक्का दिया। 

चम्पा ने अपने कपड़ों पर ध्यान दिया ,और बोली -ये कपड़े..... ये तो कल ही दीदी ने ,मुझे होली की ख़ुशी दिए ,कह रहीं थीं -बहुत दिनों से ,ये यूँ ही पड़े हैं ,तू ही पहन लेना। 

ओह ! तब तुम ये बात तो मानोगी ,झूठ मत बोलना ,वरना इस केस में तुम भी फंस सकती हो। विकास ने बात बताने से पहले ही उसे डरा दिया। फोन तो तुम्हीं करती हो न...... 

क्या चम्पा ये बात स्वीकार कर पायेगी ?,या फिर कोई और पुलिस स्टेशन में फोन करता है ?कौन है वो !जानने के लिए पढ़िए -''ऐसी भी जिंदगी ''

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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