Jadui dava

नमस्कार दोस्तों और बहनों ! एक साहूकार  का बेटा बहुत बिमार हुआ, उसने अच्छे से अच्छे डॉक्टर ,वैद्य ,हकीम बुलवाये, किन्तु कोई उसे ठीक न कर सका। लड़का दिन ब दिन कमजोर होता जा रहा था। उसके बेटे की ''प्रतिरोधक क्षमता ''कमजोर होती जा रही थी। तभी एक सन्यासी उस नगर से होकर निकला ,जब उसने सुना कि किसी साहूकार का बेटा बिमार तब वो उसके पास गया और बोला -मुझे अपने बेटे को दिखाओ ! शायद मैं उसे ठीक कर सकूं।

 पहले तो साहूकार को  विश्वास ही नहीं हुआ, कि ये सन्यासी क्या ठीक करेगा ?जब इतने बड़े -बड़े वैद्य -हक़ीम ,डॉक्टर कुछ न कर सके ,तो इसके पास कौन सी ऐसी ''जादू की पुड़िया ''होगी ?जिससे ये मेरे बेटे को स्वस्थ कर सके। 
किन्तु उसकी पत्नी ने समझाया -जब इतने लोगों को दिखाया है ,तो ये और सही ,शायद कोई चमत्कार ही हो जाये। हुआ भी ऐसा ही ,चमत्कार तो हो ही गया ,एक ख़ुराक में ही लड़के ने आँखें खोल दीं ,दूसरी ख़ुराक में उठ बैठा और तीसरी में तो दौड़ने लगा। साहूकार के लिए तो, जैसे ये चमत्कार हो  गया ,उसने सन्यासी को कोटि -कोटि प्रणाम किया और कहा -आप तो मेरे बेटे के लिए भगवान बनकर आये हैं ,हमने तो उम्मीद ही छोड़ दी थी। 
बाबा ने उन्हें आशीर्वाद दिया और बोले -हम तो सन्यासी हैं ,हमारा कोई ठिकाना नहीं ,इधर से गुजर रहे थे तो आ गए। तुम्हारी किस्मत अच्छी थी ,अब हम चलते हैं। साहूकार ने उन्हें धन -दौलत देना चाही किन्तु वे मुस्कुराकर बोले -जो दोेलत मेरे पास है ,उसके बराबर तेरे पास कोई धन नहीं , तू क्या इस दौलत से अपने बच्चे की ज़िंदगी बचा सकता था ? नहीं न ,ये मेरे लिए ये सब व्यर्थ है ,कहकर वो बाबा चले गए। ये बात दूर -दूर तक फैल गयी ,जिसे कोई ठीक न कर सका एक सन्यासी बाबा ने ठीक कर दिया। उनके पास कोई ''जादूई दवा ''थी। उससे ही वो ठीक हुआ था। 

ये तो आप सही कह रही  हैं ,पहले ऋषि -मुनियों के पास ऐसी दवाइयां होती थीं ,जिनसे चमत्कारिक  लाभ होते थे। आजकल तो कोई -कोई ही ऐसी दवाई जानता होगा और जानता भी होगा तो सोचेगा ,अब इस साहूकार की मजबूरी है ,इलाज कराना, कितना भी पैसा ऐंठ सकता हूँ ?विद्या बोली। 

ऐसे लोगों की दवाइयों का ही ''जादुई असर ''होता था ,जो निस्वार्थ भाव से सेवा करते  थे।उस समय तो नब्ज़ पकड़कर ही ,बिमारी पकड़ में आ जाती थी ,आज के समय में ,पचासों टैस्ट बता देंगे तब भी बिमारी का पता नहीं चलता। अब तो मरीज़ की जान ''रामभरोसे ''ही समझो।  

 ये तो रेनू जी आपने सही कहा ,किन्तु पुराने समय के लोग बहुत से तो ऐसे हैं ,जो अपने नुस्ख़े किसी को बताते नहीं थे ,अपने साथ ही अपने रहस्यों को लेकर चले जाते थे। 

हाँ ,आपने ये तो सही कहा। मेरी इस कहानी में भी कुछ ऐसा ही हुआ ,जब एक लड़के ने इस बात को सुना तो वो साहूकार के पास आया और उससे पूछा वो सन्यासी बाबा कहाँ गए ?

साहूकार ने जबाब दिया -वो तो चले गए ,वो लड़का जिसका नाम ''रामभरोसे ''ही था ,वो मुस्कुराते हुए बोलीं ,वो बाबा को ढूंढने निकल पड़ा ,बड़ी मुश्किलों से वो बाबा मिले ,तब उस लड़के ने कहा -बाबा मैं आपकी शरण में हूँ ,मुझे भी वो ज्ञान दीजिये ताकि मैं भी ,अन्य लोगों की इसी तरह सेवा कर सकूँ। 

तब बाबा बोले -ये दीक्षा हम किसी को नहीं देते ,इंसान स्वार्थी और लोभी है ,धन कमाने के लिए इसका दुरूपयोग ही करेगा। हमने उसके बच्चे को ठीक किया किन्तु कुछ बीमारियाँ तो मनुष्य अपने आप पालता  है ,साहूकार का बेटा कोई कार्य नहीं करता था। सभी कार्य नौकर -चाकर  करते ,न ही प्रातःकाल की ताज़ी हवा गृहण करता ,साहूकार उसे कुछ ही चुनिंदा जगहों पर जाने देता जिसके कारण उसके दोस्त भी नहीं थे। खेलता तो उसकी सुरक्षा में तीन -चार आदमी खड़े रहते। तब बताओ !वो बिमार होता या नहीं ,बच्चे के लिए खेलना -कूदना जरूरी है ,दोस्त भी  बनाने जरूरी हैं ,वो अकेला, तन से ज्यादा मन से बीमार था। ईश्वर  ने जब हमें बनाया है तो हमारे साथ ही ये प्रकृति भी बनाई है। इसी से हमारा इलाज भी है ,ये वनस्पति !जिनको  जानकारी हो तो इनसे ही इलाज भी है। अपने आपको नियम -संयम में रखो तो कम ही बिमार पड़ोगे ,कहकर वो बाबा चले गए। 

आजकल के डॉक्टरों को लोग कोसते हैं ,किन्तु ये नहीं जानते, किस -किस तरह से पढ़ाई करते हैं ?आजकल की पढ़ाई कितनी महंगी हो गयी है ,पढ़ाते -पढ़ाते माता -पिता का दिवाला निकल जाये और बच्चे का पढ़ते -पढ़ते ,तब जाकर वो डॉक्टर बनता है। तब जाकर वो डॉक्टर बनता है ,उसके पश्चात लोग उम्मीद रखते हैं ,ये सेवा करे ,उसके माता -पिता को भी तो उससे कुछ उम्मीदें होंगी कि नहीं ,उसका अपना परिवार ,उसके बच्चे उनकी शिक्षा , वो सब कौन करेगा ?कभी सोचा है !

दीप्ती जी !क्यों ,आपके यहाँ  कोई डॉक्टर है ?जो आप ऐसा कह और सोच रही हैं। 

जी ,मेरी बहन का बेटा ! कितनी मुश्किलों से उसे पढ़ाया ?पढ़ाई में बहुत खर्चा आया। उसने भी अपनी पढ़ाई में ,माता -पिता के अरमान पूरे करने में , रात -दिन एक कर दिया अब वो फ़ीस  लेता है ,लोग इलाज़ कराने तो आते हैं और ठीक होकर भी जाते हैं किन्तु पैसे देते समय मुँह भी बनाते हैं। 

उसने फ़ीस इतनी ज्यादा रखी होगी ,जो लोगों की बजट से बाहर होगी। उससे कहो ! फ़ीस भी ले ,किन्तु इतनी कि लोग ख़ुशी से दे सकें , मरीज़ को  भी ख़ाली फ़ीस ही भरनी नहीं होती ,दवाई भी लेनी होती है ,मरीज को क्या देना है ,क्या नहीं ?ये भी उसी आदमी की जेब से जाता है ,रेनुजी हंसकर बोली -वैसे ये बात हंसी की नहीं है किन्तु मरीज के साथ अन्य लोग भी मरीज ही हो जाते हैं ,ऊपर से बड़े -बड़े बिल !हालत खस्ता हो जाती है। 


ये बहस लम्बी चली तो ,न जाने कहाँ जाकर थमेगी ?अभी ये चर्चा हम यहीं समाप्त करते हैं ,कुदरत ने हमें हमारी प्रकृति के अनुरूप ही बहुत कुछ दिया है। हमारा  इलाज़ भी प्रकृति के पास ही है। ऑक्सीजन ,जो प्रातःकाल गहरी श्वाँसे लेकर ली जा सकती है ,इसके लिए किसी सिलेंडर की आवश्यकता नहीं। प्रचूर मात्रा में जल ,जो हमारे शरीर की गंदगी को बाहर निकालने में सहायक है ,अधिक से अधिक जल का प्रयोग करें पीने में किन्तु व्यर्थ न बहने दें। जितनी भी वनस्पति हैं ,वो भी हमारे शरीर के लिए उपयोगी हैं।'' सम्पूर्ण पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में ,उस कुदरत का दिया जादू बिखरा पड़ा है। बस उस जादू को पहचानने और समझने की आवश्यकता है।'' फिर मिलेंगे ,एक नई चर्चा का विषय लेकर ,धन्यवाद !
laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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