जब कहानी लिखनी है तो कहानी ही लिखूंगी ,कोई कविता या शायरी तो नहीं ,तो लीजिये ,कहानी प्रस्तुत है -
तेरा -मेरा मिलना ,संयोग तो नहीं ,कुदरत का ही इशारा था।
जब मिले' हम दोनों 'मैं भी' कुंवारी' थी ,तू भी' कुंवारा 'था।
तेरा -मेरा मिलन गाड़ी के दो पहिये ,जैसा मिलन हमारा था।
एक तेज दौड़ता दूर जाता था ,दूजा तालमेल बिठाता था।
कभी हिस्से में दर्द आया ,कभी मिला सुख का साया था।
सुख आता ,पल भर को ,चला जाता ,ग़म तो साथ निभाता था।
सुख -दुःख ,की आंधी -बारिश ,धूप -छाँव में' हम 'साथ निभाते थे।
कुछ भी रहा ,आया -गया ,लड़ते -झगड़ते फिर भी साथ ही रहते थे।
वक्त के साथ ,हम भी चलते रहे ,वो नहीं ठहरा ,हम भी नहीं ,
थपेड़ो को झेला ,आगे बढ़ते गए , मन में अब कोई आस नहीं।
ठहर कर देखती हूँ ,कुछ 'अधूरे 'तुम थे ,कुछ 'अधूरे ' मैं थी।
कुछ कमी तुझमें थी ,कुछ मुझमें थी ,दोनों मिले तू और मैं 'तुम' हो गए।
अपूर्ण थे ,पूर्ण हो गए ,कहानी तेरी -मेरी ,अब'' हमारी'' हो गयी।
