Badli ka chand [part 97]

सिम्मी , शब्बो के पास आकर उससे मिलती है ,शब्बो कहती है -''तुम तो बहुत बहादुर हो।''

 सिम्मी उससे पूछती है, कि आपको कैसे मालूम ?मैं तो आपका कैमरा भी नहीं ला पाई ,अब उनके विरुद्ध  सबूत कैसे मिलेगा ?


अरे पगली !जब मैंने तुम्हें भरोसा दिलाया था ,तो क्या ,मैंने कुछ भी नहीं किया होगा ?तुम्हें सच में बताऊं ,तो मैं इतना कुछ भी नहीं कर पाई, जितना मेरे और तेरे पति ने किया। 

मतलब !

ये सब उनकी चाल थी ,उन लोगों  को उनके बिल से निकालने के लिए ,किन्तु मैंने जब तुम्हें उस टोनी से लड़ते देखा तो पता चला तुम भी किसी शेरनी से कम नहीं। 

अपनी प्रशंसा सुनकर सिम्मी मुस्कुराई और बोली -हमें स्कूल में ही लड़कों से अपने को बचाने के कुछ ग़ुर सिखाये गए  थे। आज बस वो ही काम आये। 

आज मैं तुमसे नाराज हूँ शब्बो ने झूठमूठ ही रूठने का अभिनय करते हुए कहा। 

क्यों ,क्या हुआ ?दीदी !

तुमने मुझे ये क्यों नहीं बताया ?कि तुम्हारा पति भी पुलिस में है। 

बताकर क्या करती ?उसका कायर रूप देखकर ,मैं तो शर्मिंदा थी ही ,आपके सामने और बेइज़्जती नहीं करा सकती थी। आपने देखा नहीं ,कैसे वो उस टोनी से मिल मेरा सौदा कर रहा था। ये सब  आपने ही तो मुझे बताया था।  ऐसे में यदि मैं आपको बताती ,-पुलिस में ऐसे कायर भी भर्ती हैं ,अपमान के सिवा क्या मिलना था ?इसीलिए मैंने उसे आपके कमरे की तरफ धकेला था ताकि आप उसे समझाओ ! और उसे अपनी गलती का एहसास हो। 

नहीं ,तू उसे गलत समझी। इन लोगों में  भी कोई न कोई हुनर छिपा है ,जैसे तेरे पति में अभिनय का कीड़ा छुपा हुआ था और ऐसे समय में बाहर आया। ये समझो ,मेरे पति और तुम्हारे पति की गुप्त योजना थी। जिसका इन्हों ने हमें भी पता नहीं होने दिया। हम भी कुछ कम नहीं ,हमने भी तो चुपचाप ये योजना बनाई थी। अच्छा एक बात बताओ !तुम मेरे एक बार कहने पर ही इस कार्य को करने के लिए तैयार हो गयीं ,तुमने मुझ पर कैसे विश्वास किया ?

वो तो दीदी !जब आपने बताया  था 'कि आपके पति भी पुलिस में बड़े अफसर हैं ,तब मुझे भी अपना हुनर दिखाने का मौका मिला। 

क्यों ,तुम्हें मैक पर भरोसा नहीं था ?

नहीं ,उसके काम को देखकर ही मैंने सोच लिया था ,उसे मैं दिखाकर रहूंगी कि महिलायें भी किसी से कम नहीं जो कार्य वो पुलिस में रहकर न सोच सका ,न ही कर सका ,मैं उसे करके दिखलाऊँगी ,तब उस पर लानत भेजूंगी। 

किन्तु वो तो ,तुम्हें इस तरह उन बदमाशों से लड़ते देखकर ,बड़ा ही गौरवान्वित हो रहा था। मैं तो उसे जानती ही नहीं थी ,जब तुमने उसे इधर भेजा ,मैं तो एक पल को ड़र गयी ,जब तुम्हारे साथ देखा था एक ही झलक देखी थी इसीलिए पहचान नहीं पाई और मैं ड़र गयी। जब करतार ने देखा और पहचाना तब मुझे पता चला ,इन लोगों की अलग ही खिचड़ी पक रही है। इन लोगों की ये चाल थी ,शिकार को  बिल में से बाहर निकालने की।हमारे पतिदेव भी कम नहीं।

नहीं दीदी ,मैं तो उसे [ मैक के लिए ] माफ़ नहीं करूंगी , आप नहीं जानतीं ,उसके इस व्यवहार से मैं कितनी परेशान हुई हूँ। ये बात वो मुझसे आराम से,पहले भी बता सकता था। 

वो मैं समझ सकती हुँ  ,तूने भी तो उसे कितना परेशान किया ?उसकी हाँ में हाँ मिलाकर ,तुमने भी तो उसे एकदम से हाँ कह दी और उसकी हालत देखतीं , मेरी  तो कल्पना  करके ही हँसी छूट रही थी। 

हाँ ,वो तो है ,उस आदमी के आने से पहले कैसे गिड़गिड़ा रहा था ?कहकर सिम्मी भी हंस दी। 

अब तो दोनों का हिसाब बराबर हुआ। 

नहीं जी ,ऐसे कैसे ?मेरा सारा हनीमून उसकी वजह से खराब हो गया। यहाँ क्या वो अपने काम से आया था? या  मेरे साथ घूमने ,अब मैं भी उसे घुमाकर छोडूंगी। 

यानि तुम उसे परेशान किये बग़ैर मानने वाली नहीं ,इसमें मैं भी तुम्हारी सहायता करूंगी और इनसे कहकर उसकी छुट्टी बढ़वा दूंगी। आओ ! पहले ये तो देख लें ,उन शैतानों  क्या हाल है ?

वो दोनों उस कमरे में जाती हैं , वहां और भी पुलिस आ  गयी थी। मैक को शायद पैर में थोड़ी चोट लगी थी,उसके हाथ में पट्टी बंधी थी ,वो लड़खड़ा भी रहा था  ,टोनी और खन्ना हाथ में हथकड़ी लगी थीं। 

लो तुम्हारी बातों में , तुम्हारे और मेरे  पतिदेव की बहादुरी न देख सके ,चलो जो भी हुआ ठीक  ही हुआ ,ऐसे शैतान पकड़े जाने चाहिए ,न जाने कितनों की ज़िंदगी से खेले होंगे ? ऐसे हनीमून मनाने आते होंगे ,ज़िंदगी की नई शुरुआत करने ,बदले में लालच में, ज़िंदगी भर का दर्द लेकर जाते होंगे। वैसे अब तुम्हारा क्या ख्याल है ?

किस विषय में ?

यही कि पतिदेव को क्षमा करना है या...... कहकर शब्बो हँस दी। 

आप भी न  दीदी ! उसे माफ़ी दिलवाकर ही मानेंगी। ऐसा भी तो हो सकता है ,वही मुझसे नाराज हो। 

नहीं ,वो तुमसे नाराज नहीं हो सकता। वो तो जब तुम्हें टोनी से झगड़ते देख रहा था तो...... 

 तो क्या ?मज़े  ले रहा होगा ,मुझे गुंडों में फंसाकर !

नहीं ,वो  गौरवान्वित महसूस कर रहा था , कह  रहा था - मेरी पत्नी क्या ?शेरनी है शेरनी ,अब मुझे भी नहीं छोड़ेगी। 


मुझे लगता है ,शायद उसे बहुत  ज्यादा चोट लगी है ,मेरी ही बद्दुआ लगी होगी  उसे कहकर सिम्मी का मन उदास हो गया। 

अभी तो तू से सजा देने वाली थी ,अब देखो ! कैसा चेहरा उतर  गया ? आओ चलो !उसी कमरे में चलते हैं ,अब तो वो लोग भी  गए। अपने पतियों को सताते हैं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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