Khamoshi ki juban

 इस तरह मत जाओ ! रुक जाओ ! थोड़ी सी तो देर हुई है, मैं अभी टिफ़िन लेकर आती हूं। 

तुम्हारा तो रोज का यही नाटक है, कहकर पुनीत तेजी से घर से बाहर निकल गया।

 उदास सीमा वापस आकर अपने कमरे में बैठ गई। आज न जाने क्यों आंख ही नहीं खुली ? रात में देर रात तक नींद ही नहीं आई ,इसीलिए उठने में देरी हो गई, यही सोच कर उसकी आंखों से आंसू बह निकले ।

 सीमा सोच रही थी -हमारे विवाह को दस वर्ष हो गए हैं , जब मैं पहली बार इस घर में आई थी।तब  पुनीत मेरा कितना ख्याल रखता था ? किंतु आज तो उसे, जैसे मेरी परवाह ही नहीं है। कितनी बार मैं , उसके बराबर में लेटी दर्द से कराहती रही हूं , परेशान रही हूं ,कई बार तो नींद भी नहीं आई है , किंतु उसने कभी मेरी तरफ ध्यान ही नहीं दिया। एक बार भी नहीं पूछा -तुम्हें क्या हुआ है ?


 तब भी मैं अक्सर सोच लिया करती थी,' दिन भर का थका है ,सो गया है, इसीलिए इसकी  नींद खराब ना हो, बाहर जाकर कभी दवाई खाती। कभी टहलती, कोशिश यही करती, कि अपनी परेशानियों को, उससे छुपा लूं। पता भी चल जाता तो क्या करता ?झुंझला जाता। तुम कब तक बिमार रहोगी ?आये दिन तुम्हें कोई न कोई बीमारी लगी ही रहती है।

तुम कहना क्या चाहते हो ? मैं जानबूझकर बिमार रहती हूँ ,उसकी बातों को सुनकर सीमा अवसाद से भर गई।  एक बार भी कभी पुनीत ने ,यह नहीं सोचा और नहीं पूछा -सीमा  तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ लग रहा है तुम क्यों परेशान हो, क्या कोई बीमारी या परेशानी है ? तुम्हें मैं डॉक्टर के दिखा कर लाता हूं। 

हमेशा अपनी कमाई और मेहनत का एहसान जतलाता। सीमा को लगता, जैसे उसकी नजर में, मेरी तो कोई कीमत ही नहीं है। हमें फिल्म देखे हुए भी, बरसों बीत गए। विवाह के समय ही, एक दो फिल्में  दिखलाई थी, उसके बाद तो कहने लगा -घर में टेलीविजन पर ही बहुत फिल्में आ जाती हैं ,क्यों बे फालतू में खर्च करना ? यहां पर भी मुझे कौन सा समय मिलता है ? सारा दिन तो काम में लगी रहती हूँ। यह जीवन उबाऊ सा लगने लगा है। बच्चे स्कूल जाते हैं, बच्चों को पढ़ाती हूँ।  सारा दिन घर में ऐसे ही चला जाता है।

 कभी-कभी सीमा की इच्छा होती, पुनीत अचानक से आए और उससे कहे ! आओ ! कहीं घूमने चलते हैं, या फिर आज तुम्हें कोई फिल्म दिखाकर लाता हूं  किंतु वह तो छुट्टी के दिन आराम करता है।  कहता है -पूरा सप्ताह काम करके थक जाता हूं।' किंतु मेरा क्या ? मेरा सप्ताह कब आएगा ? क्या मेरी छुट्टी का कोई दिन नहीं होता बल्कि जिस दिन उसकी और बच्चों की छुट्ठी होती है। उस दिन तो मेरा काम और बढ़ जाता है।

  बच्चों के नंबर कम आये , तो मुझे ही दोष देता है ,'तुम सारा दिन करती ही क्या हो ? तुम बच्चों को ठीक से  पढ़ा भी नहीं सकतीं । अब उसे मैं कैसे बतलाऊं ? उसने कभी मेरी परेशानियों को जानना ही नहीं चाहा। न ही समझना चाहता है , अब तो ऐसे  लगता है, 'जैसे हम इस रिश्ते को झेल रहे हैं। 

लोग कहते हैं -कि ये रिश्ता सात जन्मों का  होता है ? किंतु यह जन्म ही मुझे इतना भारी पड़ रहा है। जिसमें एक दूसरे के लिए समझ ना हो, वो समझना भी  नहीं  चाहता है  सहयोग देना तो दूर की बात है। कहता है ,यदि ये काम भी मैं करूंगा ,तुमसे विवाह किसलिए किया है ? उसने मुझसे विवाह करके अपने माता-पिता के प्रति जैसे अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी। उसकी ज़िंदगी में मेरा क्या महत्व है ?

स्वयं अपने दोस्तों के साथ घूमने चला जाता है ,किंतु कभी मुझसे नहीं पूछा -तुम थक जाती हो ? तुम क्यों बीमार हो ? आओ ! कुछ देर मेरे संग बैठो ! कभी नहीं पूछता, तुम्हारी कुछ खाने की इच्छा है, कुछ लाकर दूं ! अब तो कहने का मन भी नहीं करता। शुरू -शुरू में कह देती थी -आज आते हुए बाजार से कुछ ले आना किन्तु अब....यह जीवन ही व्यर्थ लगने लगा है। मेरे जीवन का तो जैसे कोई मूल्य ही नहीं रह गया है, और उसकी नजर में तो बिल्कुल भी नहीं।

 सीमा कितनी हंसने -बोलने वाली लड़की थी, धीरे-धीरे उदास होती चली गई, अपना दर्द किससे कहे ? किसे सुनाए ,अपने मन की व्यथा ! ससुराल में तो सबका व्यवहार मिला-जुला ही होता है , इसकी मम्मी को तो कुछ भी बताना व्यर्थ है, एक की दो लगाकर बताती है -पूरी नमक -मिर्च लगाकर मसाला तैयार कर देती है। जिसका परिणाम मुझे पुनीत की डांट के रूप में सुनना पड़ता है।

 कभी-कभी जिंदगी को जीने की इच्छा होती , खुश रहने का दिल करता , तो अपेक्षा भी बढ़ जाती ,आज  मेरे लिए कोई उपहार लेकर आए और अचानक से आकर मुझे चौंका दे लेकिन यह सब कल्पना थी । अवसाद बढ़ता जा रहा था, व्यथा इतनी अधिक गहरी हो चुकी थी। अब सीमा का बोलने का मन ही नहीं करता , पहले वह पुनीत को, उसके पीछे भाग -भाग कर उसे खाना खिलाती थी।आज  टिफिन छोड़कर चला गया , इच्छा ही नहीं कि वह दौड़कर उसके पीछे जाए। अब कुछ कहने का दिल ही नहीं करता। धीरे-धीरे शब्दों में कमी आने लगी और वह 'खामोश 'हो गई। वह उसे जब भी डांटता -डपटता , वह खामोश होकर अपने कमरे में आ जाती। 

अंदर ही अंदर उसे घुटन होने लगी थी, ऐसा लग रहा था ,ख़ामोशी उसे धीरे -धीरे निगल रही थी। उसका शरीर जीर्ण हो रहा है , न जाने कौन सी बीमारी उसे घेरे में लिए हुए थी। उसकी घुटन उसे दीमक की तरह चाट रही थी और एक दिन चक्कर खाकर गिर पड़ी।

 घर के काम यूं ही पड़े थे, उसे  इस तरह गिरा देखकर पुनीत को झुंझलाहट हुई , इसको भी अभी गिरना था उसके मन में जैसे कोई उसके प्रति कोई लगाव ही नहीं रह गया था।

 पुनीत ने,सीमा के लिए डॉक्टर को बुलाया, डॉक्टर ने कहा -इन्हें अंदर ही अंदर कमजोरी होती जा रही है, खून भी नहीं बन रहा है क्या ये  अपने खाने- पीने पर ध्यान नहीं देती हैं ? उनके चेहरे को देखकर लगता है उनके चेहरे से खुशी गायब है। 

डॉक्टर साहब ! मैं भी क्या करूं ? कमाने जाऊं या फिर इसके पीछे भागूँ । पुनीत का एक -एक शब्द सीमा को छलनी किये दे रहा था। 

पीछे भागने की कोई आवश्यकता नहीं है , खुशियां तो दे सकते हो, मन में एक उमंग तो जगा सकते हो, प्रेम की ज्योति तो जला सकते हो ? पत्नी को शारीरिक सुख ही नहीं ,मानसिक सुकून भी चाहिए होता है। अपने व्यवहार से अपने शब्दों से ,उसको जीवित कर सकते हो। वो  धीरे-धीरे मर रही है। क्या इसकी ख़ामोशी भी तुम पढ़ न सके ? 

तुमने कभी सोचा है ? जिस घर को यह  चला  रही है, यदि यह नहीं रही , तो क्या होगा ? इसकी खामोशी भी तुम्हें समझ नहीं आई। जब तुम शब्द ही न समझ सके तो खामोशी कैसे समझ लोगे ? इसकी खामोशी ही बहुत कुछ कह रही है यह बहुत बड़े  दर्द को जी रही है। तुम वही नहीं समझ पाए ,कम से कम  तुम्हारे पास इसको देने के लिए टाइम तो होना चाहिए, तुम्हारे पास तो वह भी नहीं है। तुम दोस्तों के लिए समय निकाल लेते हो, इसके लिए समय नहीं है।

 आज डॉक्टर के कहने पर, पुनीत ने सीमा की तरफ देखा, कितनी कमजोर हो गई है? कभी मैंने इस ओर  ध्यान ही नहीं दिया बहुत दिन हो गए, कभी पास बैठकर ठीक से बात भी नहीं की, यह तो हमेशा मेरे साथ समय व्यतीत करना चाहती थी ,मेरा समय चाहती थी। 

तुमने इसको क्या दिया ? घुटन,अकेलापन और खामोशी ! कितनी कमजोर हो गई है ? देख रहे हो ,तुम्हारी लापरवाही ने इसे 'अकेला' कर दिया। तुम्हारे न सुनने की आदत ने इसे' खामोश' कर दिया। 

डॉक्टर के कहने पर पुनीत जैसे नींद से जागा हो। उसने सीमा से बड़ी प्यार से बात की और बोला - मैं मानता हूं मैं तुम्हारे प्रति थोड़ा लापरवाह हो गया था।  तुम मेरे घर को अच्छे से संभाल रही थी किंतु मैंने यह नहीं सोचा कि तुम अपने को कैसे संभालोगी ? तुम्हारी सभी जरूरतें तो मैं पूरी कर देता हूँ  लेकिन मैंने कभी तुम्हारी मौन भाषा को समझना ही नहीं चाहा। मैंने तुम्हें जानने का प्रयास ही नहीं किया ,तुम्हारी भी, मुझसे कुछ अपेक्षाएं होंगी।  मुझसे गलती हो गई मैं तुम्हारा गुनहगार हूं और तुमसे माफी चाहता हूं। इस तरह खामोश मत रहो ! तुम्हारी यह 'खामोशी' मुझे बहुत कष्ट दे रही है। 

सीमा मन ही मन सोच रही थी ,जो बात मैं पुनीत को कहकर न समझा  सकी उसे मेरी ख़ामोशी ने समझा दिया।    

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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