त्रिदेव ,त्रिवेणी ,त्रिमूर्ति ,
सभी सराहनीय ,वंदनीय हैं।
प्यार की परिधि नहीं ,
'त्रिकोणीय प्रेम ', निंदनीय है ?
प्यार के हिस्से में ,खींचतान है ?
पत्नी प्रेम ,माता -पिता के लिए सबब ,
बच्चे ,अन्य रिश्ते बराबर नहीं।
सब चलता है ,उलझता है।
घरवाली ,बाहरवाली ये ट्रैंगल ,
बनता नहीं ,बिगड़ता है।
एक सिरा पकड़ा ,तो दूसरा छूटता है।
जो करते हैं ,'ट्रैंगल प्रेम 'पछताते हैं।
जीवन से लड़ जाते हैं ,न इधर के ,
न ही उधर के रह पाते हैं।
कुछ पाते हैं ,तो बहुत कुछ खो जाते हैं।
