Badh rahi umr

 आजकल एक समस्या सामने आ रही है ,वो है ,शादी के लिए बच्चों की बढ़ती'' उम्र '',पहले समय में ,घर के बड़े -बूढ़े आपसदारी में ही, रिश्ता तय कर देते थे क्योंकि उन्हें परिवार ख़ानदान का पता होता था ,नहीं भी होता था ,रिश्तेदारियों में ही आपस में जानकारी भी मिल ही जाती थी , क्योंकि उन बड़े -बूढ़ों की स्मरणशक्ति इतनी तेज होती थी कि उन्हें न जाने कितने ख़ानदान- रिश्तेदारियाँ ज़बानी स्मरण  होती  थीं, किन्तु उस समय लड़कियों को इतना पढ़ाया नहीं जाता था ,हद से हद पाँचवी या छट्टी पास।  हमारी नानी -दादी इसी केटेगिरी के अंदर आती थीं,वो भी इसीलिए ,ताकि वो चिट्ठी -पत्री लिख -पढ़ सकें , किन्तु समय के साथ जमाना बदला ,सोच बदली ,लोग कहने लगे -बेटियों को कम से कम बाहरवीं या स्नातक तो करवाया जाये ताकि समय आने पर ,घर के कार्यभार को संभालने में वो भी अपना सहयोग दे सकें। किन्तु उस समय भी ,महिलाओं के हिस्से गृहणी का कार्य भी आता था।लड़की घर -बाहर दोनों ज़िम्मेदारियाँ संभालने के लिए तत्पर रहती , लड़का भी घर की सभी ज़िम्मेदारी संभालता था।



  लोग उससे भी अधिक जागरूक हुए और चाहने लगे कि लड़की विवाह से पहले ही पढ़ी -लिखी और अपने पैरों पर खड़ी हो ,इसमें क्या बुराई है ?चूल्हा -चौका तो एक नौकर भी संभाल सकता है। बुराई तो किसी भी चीज में नहीं है किन्तु इसके जो दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं ,वो विचारणीय हैं ,माता -पिता अपने काबिल बेटे के लिए एक लड़की तलाश करते हैं किसी को भी आज के समय में ख़ानदान -परिवार की इतनी जानकारी भी नहीं क्योंकि अधिकतर लोग कमाने के लिए बाहर जो निकल गए। फिर भी प्रयत्न करते ही हैं ,अब फोन पर ही बायोडाटा मिल जाते हैं ,ये तो अच्छा ही हुआ ,घर बैठे रिश्ता मिल जायेगा किन्तु बायोडाटा खंगालते कई बरस बीत गए किन्तु योग्य वधु या वर नहीं मिला। लड़की या लड़का देखने के लिए ,पहले अपने गोत्र का तो नहीं ,कितनी उम्र है ?कितना पैकेज है ?देखने में केेसा लग रहा है ?इत्यादि बातों के पश्चात ,जन्मपत्री मिलाई तो लड़का मंगली निकला या फिर उसने अपनी उम्र कम लिख रखी है ,वो तो ज्यादा उम्र का है। बहुत मुश्किलों के पश्चात देखने दिखाने तक बात पहुंचती भी है ,तब पता चलता है ,बेटी ने कह दिया ये कोई लड़का है ,अंकल लग रहा है। चौबीस -पच्चीस तक तो प्रतीक्षा की लड़का क़ाबिल हो जाये ,अच्छे पैसे कमाने लगे। बेटे का फोटो चार वर्ष पहले डाला था जो आज गंजा हो गया है। या फिर लड़की को इंकार कर दिया जाता है ,ये लड़की मोटी है ,आंटी लग रही है। 

यही हाल लड़की वालों का भी है ,लड़की पढ़ाई करके चार पैसे कमा सके, इस योग्य बनाई ,उम्र तो किसी का इंतजार नहीं करती। जब लड़की कम पैसे कमा रही थी तब लड़के वाले भी लड़की का पैकेज पूछते और चुप हो जाते ,अब लड़की स्वयं पंद्रह -बीस का पैकेज़ ले रही है ,तब उसे भी लड़का चालीस -पचास वाला चाहिए। अब स्वयं इतना कमा लेती है ,कि अपने साथ -साथ दूसरे का भी भरण -पोषण कर सकती है ,तब वो क्यों झुकेगी ?उसकी भी इच्छाएं और मांग है। पहले वो एक बेल थी ,जो किसी का सहरा ले सकती थी ,और अब वो दरख़्त हो गयी ,उसकी जड़ें मजबूत हैं ,दूसरी जगह अपनी जड़ें जमाने में उसे समय लगेगा हो सकता है , न भी जमाये। अब वो इतनी सक्षम है ,अपनी इच्छानुसार जीती है ,उसे किसी की परवाह नहीं। जो लड़की कम्पनियों में काम करती है ,रात -दिन बाहरी लोगों से बिंदास बातें करती है ,आज वो तीस या पैंतीस की उम्र में है ,उससे कैसे एक संस्कारी बहु  की उम्मीद रखी जा सकती है ?तब वो विवाह से ही इंकार कर देते हैं। विवाह का अर्थ है ,ज़िम्मेदारियों का बढ़ना ,जिसके लिए वो तैयार नहीं होना चाहते। 

कभी लड़के को लड़की पसंद नहीं ,कभी लड़की को लड़का पसंद नहीं ,कभी दोनों के विचार नहीं मिले ,तिस पर भी लड़के एक उम्मीद के साथ अकेले में बैठकर लड़की को अपनी महिला दोस्तों के विषय में वार्तालाप करते हैं और उम्मीद करते हैं कि लड़की छह -सात साल से नौकरी कर रही हो ,उसका कोई लड़का दोस्त न हो। जो लड़के स्वयं बीस -तीस हजार रूपये महीना ले रहे हैं वो बिना दहेज की शादी का दावा भरते हैं क्योकि उनके पास कोई च्वॉइस ही नहीं ,जो लड़के स्वयं बीस -तीस या उससे अधिक का पैकेज़ ले रहे हैं। उन्हें लड़की पढ़ी -लिखी होने  के साथ -साथ उन्हीं  के टक्कर की नौकरी वाली भी चाहिए। जब लड़का स्वयं  ही इतना कमा रहा है ,तब लड़की अच्छी पढ़ी -लिखी हो ,संस्कारी हो ,कम पैकेज भी मिल रहा है तो क्या करना है ?लड़की को तो घर -परिवार के लिए कई बार नौकरी छोड़नी भी पड़ जाती है। बच्चे होंगे ,उन्हें सम्भलना ,यदि आया के ऊपर नहीं छोड़ना है तो..... तुम इतने सक्षम हो तो ,तुम स्वयं भी उसे आगे बढ़ने में प्रोत्साहित कर सकते हो ,ताकि उसकी नजरों में तुम्हारा सम्मान बना रहे।  पढ़ी -लिखी तो है ,अभी लता है ,दरख़्त बन गयी तो उसकी जड़ें मजबूत हो जाएँगी और शायद वो तुम्हारे घर में ,अपनी जड़ें न जमा सके। 

तालमेल बैठना मुश्किल हो ,नतीज़ा एक या डेढ़ बरस में ही तलाक ,अभी मैंने एक किस्सा सुना -एक माह पश्चात ही लड़की अपने घर चली गयी। तब इसे आप क्या कहेंगे ? इसी परेशानी में एक लड़की की उम्र चालीस हो गयी तब उसने अंतर्जातीय विवाह कर अपने माता -पिता के सर से ये बोझ उतारा। इसी तरह लड़के भी बढ़ती उम्र के कारण न ही जन्म पत्री ,न ही गोत्र इत्यादि की चिंता अंतर्जातीय विवाह कर विदेश में बस गया । सबसे बड़ा प्रश्न ये है ,कि गलती हमारे बच्चों की है या हमारी ,हम क्या चाहते हैं ?एक सभ्य ,संस्कारी ,पढ़ी -लिखी बहु या फिर एक पैसे कमाने वाली या दहेज़ में मोटा पैसा लाने वाली ,अपनी मनमर्ज़ी चलाने वाली किसी अच्छी कम्पनी की डॉयरेक्टर बहु। कुछ लोगों को इस बात से क्रोध भी आ सकता है कि क्या वो बेटियां  ,सभ्य -संस्कारी नहीं होतीं ,जरूरी नहीं हर लड़की संस्कारी ही निकले ये तो मानव प्रवृति है किन्तु आज के समय को देखते हुए ,अनेक लेख आपको ऐसे ही मिल जायेंगे। जहाँ बहुएं सास या ससुर को एक कप चाय भी नहीं पूछतीं और ससुराल आकर वो नौकरी भी छोड़ दी। तब इसे आप क्या कहेंगे ? इस लेख को लिखने का मेरा उद्देश्य यही था। बेटा हो या बेटी दोनों के ही माता -पिता परेशान हैं।जो उम्र पोता -पोती खिलाने की है ,उस उम्र में ,अभी बहु -दामाद ढूंढ़ रहे हैं। उसके पश्चात भी उन्हें भी एक -दूसरे को समझने के लिए समय चाहिए। 


 सब चीज देख लेने के पश्चात फिर बात अपने बेटे -बेटी पर छोड़ देते हैं। सकारात्मकता लाइए ,कुछ समय पश्चात ऐसा समय होगा ,हम तो समय निकालकर रिश्ते ढूँढ भी रहे हैं ,आगे जब दोनों ही पति -पत्नी को समय ही नहीं होगा ,न ही बच्चे बनाने और पालने का ,रिश्ते  और रिश्तेदारी समझना तो दूर की बात है। वोअपने आप ही विवाह करके आ जायेंगे या फिर ''लिव इन ''तो बढ़ ही रहा है ,आज के वातावरण को देखते हुए, तो लगता है ,इसका ही बोलबाला होगा। या फिर किसी को भी किसी के ख़ानदान का पता ही नहीं चल पायेगा। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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