Asi bhi zindgi [ part 57]

धीरेन्द्र अपने बेटे की बीमारी के कारण दुखी था ,किन्तु अपने को संभालने का प्रयत्न कर रहा था। किन्तु मन में ,कहीं  न कहीं ,कोई गांठ बन ही गयी थी। न चाहते हुए भी ,वो उस बात के लिए अपने को समझा नहीं पा  रहा था। अब तो उसके दफ्तर के लोगों को भी इस विषय में जानकारी हो चुकी थी। सभी की सहानुभूति उसके साथ थी। नीलिमा अब निश्चिन्त थी कि धीरेन्द्र ने ये बात ,आसानी से स्वीकार कर ली।  एक दिन धीरेन्द्र नीलिमा से रात्रि में तैयार होने के लिए कहता है -जैसे वो विवाह के बाद तैयार रहती थी। आज भी उसने नीलिमा को इस तरह तैयार  होने के लिए  कहा।

क्यों ,आज क्या कोई ख़ास बात है ?

बस यूँ ही दिल कर रहा था ,नीलिमा को अपने पति की इच्छा का मान रखना था ,इसीलिए वो इसी तरह तैयार हुई ,उसे भी ,स्वयं अच्छा लग रहा था।


 बेटियाँ पूछ रही थी ,मम्मा !कहीं जा रही हो ? 

नहीं बेटा ,तुम लोग अब आराम से सो जाओ और सुंदर -सुंदर सपने देखना !आज मैं भी सुंदर ख्वाब देखूंगी , जब हम कहीं जाते हैं तो खुश मन से जाते हैं ,नए कपड़े पहनते हैं इसीलिए मेरे कपड़े नए तो नहीं हैं किन्तु बहुत दिनों बाद पहने हैं  ,ताकि जब मैं अपने सपनों में जाऊँ ,तो अच्छी लगूँ ,सबसे प्यार से मिलूं।

 तब तो मम्मा हमें भी सुंदर बनकर जाना है ,हम भी नए कपड़े पहनेंगे दोनों बेटियाँ बोल उठीं।  

नीलिमा को लगा जैसे ,उसने अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार ली हो ,वो बेटियों को समझाते हुए बोली -आपके  कपड़े तो सुंदर हैं ,बस अब तो सपनों में जाने की आवश्यकता है। 

नहीं मम्मा !दूसरे कपड़े पहनने हैं ,हम भी सुंदर कपड़े पहनकर ,अपने सपनों में जायेगें ,कल मुझे तो परी भी  मिली थी ,आज आई तो क्या कहेगी ? कल वाली ड्रेस ! कल्पना मुँह बनाते हुए बोली। 

चल झूठी !तुमने दिन में तो नहीं बताया कि तुम्हारे सपने में परी आई थी ,तभी छोटी बोली -नहीं मम्मा !मैंने देखा था ,परी दीदी के सपने में जा रही थी। नीलिमा मन ही मन सोच रही थी ,मैं इन्हें क्या बहकाऊँगी ?ये तो मुझसे भी ज्यादा होशियार हैं ,मेरे ही' कान काट लें 'कपड़े बदलने के लिए ,न जाने क्या -क्या बात मुझे बता देंगी ?उसने सोचा। अब तो उनके लिए ,अलमारी से कपड़े निकालने ही होंगे वरना मुझे यहीं खड़े -खड़े परी दिखा देंगी। तब नीलिमा बोली -मेरी माँ ओं !ला रही हूँ ,तुम्हारे भी कपड़े  ,कहकर अलमारी की तरफ बढ़ी। 

दोनों बहनें अपनी होशियारी पर हंस रही थीं ,कल्पना बोली -देखा !मम्मा  ने मुझे माँ कहा ,अब मैं बड़ी जो हो गयी हूँ। तभी छोटी उसके समीप आकर खड़ी हो गयी और उसके साथ अपने को नापते हुए बोली -मैं भी बड़ी हो रही  हूँ। एक दिन मुझे भी मम्मा माँ कहेगी।

 ये बात नीलिमा ने सुन ली और बोली -दादी न कहने लगूंगी ,देखो दोनों ! अभी मैं तुम दोनों से बड़ी हूँ ,और मैं ही मम्मी रहूंगी। कपड़े बदलो ,और चुपचाप सो जाओ !चलीं हैं मेरी माँ बनने। नीलिमा को इस तरह क्रोधित  होते देख ,दोनों ने चुपचाप कपड़े बदले और बिस्तर पर लेट गयीं। 

नीलिमा ने प्यार से उन्हें झिड़की दी -सारा दिन बातें बनाने में लगी रहतीं हैं ,पढ़ने के नाम से इनकी...... बात को बीच में ही काटकर बोली -सो जाओ !चुपचाप। कहकर वो बाहर आ गयी। 

अपने कमरे में जाते हुए ,उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी ,वो मुस्कुराहट अपनी बेटियों की प्यारी -प्यारी ,भोली -भोली बातों के कारण थी। जब वो कमरे में पहुंची ,धीरेन्द्र बेसब्री से उसकी प्रतीक्षा में था ,उसे देखते ही बोला -इतनी देर लगा दी ,कहाँ थीं ?

तुम्हारी बेटियां ही मुझे बुद्धू बनाने में लगीं थीं ,अभी से इतनी होशियार हो गयीं हैं ,खूब बातें बनाना सीख़ गयीं हैं ,अपनी माँ को ही चलाने चलीं  हैं ,नीलिमा अपनी ही धुन में ,कहे जा रही थी किन्तु उसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि धीरेन्द्र भी उसकी बातों में दिलचस्पी ले रहा है या नहीं।

वो तो उसके ,कपड़े उतारने में जुटा था ,उसका गाउन उतारकर उसे लगभग नग्न अवस्था में ले आया ,तब वो बोला -जिसे बोलना चाहिए ,होशियार होना चाहिए ,वो तो शांत है। 

उसकी बातों का अर्थ समझने का प्रयास करते हुए बोली - क्या कहा ? जो वो समझ रही थी ,उसमें वो धीरेन्द्र के शब्दों की सहमति चाह रही थी।  

किन्तु धीरेन्द्र  किसी भी तरह का तर्क नहीं चाहता था ,उसे लग रहा था ,उसने कुछ भी कहा और ये भाषण देने लग जाएगी। अच्छे-खासे ,मूड़ की ऐसी -तैसी हो जाएगी। कुछ नहीं ,अब समय बर्बाद मत करो ,आ जाओ !कहकर उसने नीलिमा को अपनी बाँहों में भर लिया। कुछ देर के लिए दोनों ,पारिवारिक ,सामाजिक समस्याओं से दूर हो गए ,जिसमें उनके लिए परेशानी और दुःख के सिवा कुछ नजर नहीं आता था। दोनों के  ज़िस्म एक दूजे में समा जाने को आतुर थे ,तभी किसी बच्चे के उठने जैसी कोई आहट सी हुई ,नीलिमा थोड़ी सतर्क भी हुई किन्तु धीरेन्द्र का  सोच शांत रही। पूर्णता को प्राप्त कर ,जैसे ही वो उठकर जाने लगी ,धीरेन्द्र ने रोक दिया ,अभी लेटी रहो ! मैं ,बच्चों को देखकर आता हूँ नीलिमा के जबाब की प्रतीक्षा किये बग़ैर वो उनके कमरे की ओर प्रस्थान कर गया।

धीरेन्द्र की बात ,का आशय वो नहीं समझ पाई ,वो ऐसा क्यों कहकर गया ?कुछ देर पश्चात वो आ भी गया बोला -तुम ख्वामहखवाह परेशान हो रही थीं ,वो सोये हुए हैं , नीलिमा को बैठे देखकर बोला -मैंने मना किया था न.... 

क्यों लेटना है ? क्या तुम ,कुछ और सोच रहे हो ?

हाँ ,मैं एक बेटा और चाहता हूँ। 

ओह !तो तुम्हारे प्यार में ये स्वार्थ छिपा था। 

इसमें स्वार्थ कैसा ?तुम्हारे दो बेटियां हैं ,मैंने कुछ कहा ,अब मैं एक बेटा और चाहता हूँ। 

तुमने क्या मुझे मशीन समझा हुआ है ?दो बेटियां तो एक बेटे की चाह में हुईं ,अब बेटा पहले से ही है ,तब और बेटा..... 

नीलिमा की बात पूर्ण होने से पहले ही धीरेन्द्र बोल उठा ,वो ''अपाहिज़ ''मेरा बेटा ,न ही कुछ बोलता है ,न ही खेलता है ,उसे सारी ज़िंदगी उसे कहाँ तक उठाये ,उसे घूमता रहूंगा ? जबकि मुझे मालूम है कि वो कभी ठीक नहीं होगा। 


ये तुम क्या कह रहे हो ?  वो हमारा बेटा है ,बेटियां भी हमारी ही हैं ,अब और नहीं ,चौथा बच्चा बनाया ,जरूरी तो नहीं ,बेटा ही हो। हो भी गया तो फिर मैं इस पर ध्यान नहीं दे पाऊँगी ,इसका ठीक से इलाज़ भी नहीं करवा पाऊँगी। अभी हमारे पास जो भी है ,उसी में संतुष्ट रहना है। बेटियाँ भी किसी भी तरह से बेटों से कम नही  होतीं ,अभी इन बच्चों के ही कितने खर्चे हो जाते हैं ? मैं इनके कार्यों में ही लगी रहती हूँ ,बस अब और नहीं। 

ये दोनों तो अपनी ससुराल चली जाएँगी ,तब हम दोनों के पास रह जायेगा ,ये ''अपाहिज़ ''धीरेन्द्र क्रोध में बोला। 

अबकि बार नीलिमा उस पर चीखकर पड़ी ,'अपाहिज़ 'नहीं है वो ! शरीर से स्वस्थ है ,ये बिमारी मानसिक होती है। 

कुछ भी हो मुझे एक बेटा चाहिए। 

नहीं ,अब ऐसा नहीं हो सकता कहकर नीलिमा अपने बच्चों के कमरे में चली गयी। अब वो रो रही थी ,दुनिया की परेशानियों से दूर ,वो सुकून की नींद सोना चाहती थी किन्तु धीरेन्द्र के स्वार्थ ने, वो भी ख़राब कर दी। वो अपने को समझा रही थी कोई भी बाप होगा ,वो ऐसा ही सोचेगा किन्तु मैं तो माँ हूँ ,दूसरे बच्चे के चक्कर में मैं, अपने अथर्व के साथ अन्याय नहीं कर सकती। ये भी तो मेरा अपना खून है। बच्चे तो दिखने में तीन ही नजर आते हैं किन्तु धीरेन्द्र की जल्दबाज़ी के कारण ,किसी भी तरह का परहेज न कर पाने के कारण तीन -चार तो ''अबॉर्शन '' करवाने पड़े। वो तो डॉक्टर ने दवाई दे रखी थी ,थोड़ी सी लापरवाही भुगतना मुझे ही पड़ता था। सोचते -सोचते न जाने कितनी रात बीती और कब उसे नींद आई ?पता ही नहीं चला।  

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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