लालच ,काम ,क्रोध ,मोह , अहंकार इत्यादि हमारे अंदर सभी गुण या अवगुण कहें ,होते हैं। अधिकतर ये अवगुणों की श्रेणी में ही माने जाते हैं। मानव के अंदर ये सभी अवगुण पहले से विद्यमान रहते हैं ,समयानुकूल ये सामने आ जाते हैं। इन सबमें एक अवगुण माना जाता है ,लालच ! इसकी बात आते ही लोग -बाग इसके अवगुणों को गिनाने लगते हैं और समझाते हैं ,''लालच बुरी बला है। ''हमें लालच नहीं करना चाहिए। किन्तु मेरा मानना है ,ये कोई अवगुण नहीं ,लालच कौन नहीं करता ? हम सभी लालच में भरे रहते हैं ,कोई कम या कोई ज्यादा करता है। लालच के बिना हम आगे ही नहीं बढ़ पाएंगे। अब आप कहेंगे -ये कैसी विपरीत बात हमें समझा रही हैं। अब आप ही सोचिये ,हम सभी लेखक लालच के वशीभूत होकर ,प्रातःकाल की ठंड में जब लोग अपनी रजाई में हाथ अंदर रखकर बैठने में सुकून महसूस करते हैं। तब हम लिखने बैठ जाते हैं ,ताकि हमारी रचना सर्वश्रष्ठ हो ,ज्यादा से ज्यादा स्टार मिलें ,ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़ें ,हमें और हमारी रचना को सराहें ,ज्यादा लाइक मिलें। हम सर्वश्रेष्ठ लेखक की श्रेणी में आ जायें। ज्यादा से ज्यादा हमें प्रोत्साहन भी मिले। ये हमारा लालच ही तो हमें इसमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।
कुछ लोग कहेंगे ,हम लालची नहीं ,पैसे की चाह, किसको नहीं होती ?आगे बढ़ने की चाह किसको नहीं होती ?हमें लालच नहीं, ये कहकर क्या अपने को धोखा नहीं दे रहे ?आगे बढ़ने की चाह किसको नहीं होती ?इस सब में कहीं न कहीं हमारा लालच ही तो छुपा होता है। फिर भी हम लालच एक अवगुण है कहकर उस पर बड़े -बड़े भाषण लिख और बोल डालते हैं। लालच पर हम बचपन में अनेक कहानियाँ सुनते और पढ़ते थे। ताकि इसके अवगुण को पहचान सकें और इसका अवगुण है इसकी अधिकता का लालच। सीमित मात्रा में लालच का पता ही नहीं चलता जब इसकी अधिकता हो जाती है ,तब ये लालच गुण होकर भी अवगुण में बदल जाता है। मेरा तो मानना है लालच करना चाहिए ,आगे बढ़ने का लालच ,उन्नति का लालच ,एक अच्छी सोच का लालच ,मेहनत का लालच किन्तु इस लालच को गुण ही बने रहने देना चाहिए ,इसकी अधिकता ही इसे अवगुण में बदल देती है ,इसी बात पर मुझे कबीरदास जी का एक दोहा स्मरण हो आया -
अति का भला न बोलना ,अति की भली न चुप।
अति का भला न बरसना ,अति की भली न धूप।
लालच में ,लालची मरे ,
बदलता रंग हज़ार ,
इक लालच, मैं भी करूं ,
बन जाऊँ ,सुपर स्टार !
रचना मेरी ,सब पढ़ें !
समीक्षा दें ,वाही ,वाही करें।
मिले ,खूब स्टार.....
शब्दों का सागर यहां ,
ढूंढ़ लाऊँ ,जीवन की बहार !
डुबूं इसमें ,मोती लाऊँ ,
जो चमके आकाश में ,
हो 'लक्ष्मी ',का चमत्कार !
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