Asi bhi zindgi [part 63 ]

धीरेन्द्र के जाने से ,नीलिमा पर तो जैसे ,मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है किन्तु वो फिर भी ,अंदर से अपने को  मजबूत कर हर आने वाली परेशानी के लिए ,अपने को तैयार कर रही है। जो हो चूका ,उसे तो वापस लाया नहीं जा सकता है ,हाँ ,ये अवश्य है ,जो अब है ,उसे समय रहते संभाला जाये। यही वो अपनी बहन के साथ होने पर कर रही है। बिखरी थी ,अपने को समेटा। अब उसका ध्येय अपने बच्चों को इस क़ाबिल बनाना था ,ताकि वो कल को यदि  विवाह भी हो जाये तो, सहारा न ढूंढकर सहारा बन सकें। इन्हीं परेशानियों के चलते , धीरेन्द्र के दफ्तर जाना , अन्य जिनसे भी कार्य पड़ता उन  लोगों से मिलना उसका फंड वग़ैरहा पूछना , उनके फॉर्म वग़ैरह भरने ,धीरेन्द्र का ''मृत्यु प्रमाण -पत्र बनवाना  ''इत्यादि  कार्य उसने अपनी बहन के साथ जाकर  किये। इन सबमें ,चंद्रिका ने भी अपना पैसा लगाया। छोटी बहन है ,ऊपर से अब उसका सहारा भी गया। जिसके पास  उसने कोई पैसा नहीं छोड़ा।


 चंद्रिका ने पूछा -तुम लोग ऐसे क्या करते थे ? क्या हमारी गृहस्थी नहीं है ,तेरे जीजाजी की कमाई तो उससे कम ही है  ,तब भी हमने कुछ  जोड़ा ही है ,तुम्हारे खाते में ,बस ये ही...... अभी तो मैं अपने पैसे खर्चा कर रही हूँ ,कल को तुझे पैसों की आवश्यकता पड़ी, तो किससे  मांगेगी ?आज चंद्रिका को अपने पति पर प्यार आया ,उन्होंने कम आमदनी में भी मेरा और बच्चों का पूरी तरह से ख़्याल रखा। हालाँकि उन्होंने मुझे ''स्विट्जरलैंड ''नहीं घुमाया ,मैं कभी हवाई जहाज में नहीं बैठी किन्तु आज,अपने बच्चों और पति के साथ अपने घर में तो हूँ। जिस कोठी के कारण ,पापा ने इसका विवाह किया ,जिस पैसे को देखकर ,हमें भी इससे जलन हो गयी थी। इसके रहन -सहन को देखकर ,एक -दो बार तो मैंने पति को भी झिड़क दिया ,आज वो दोनों ही इसके पास नहीं है। समय बदलते देर नहीं लगती ,क्या सोचा था क्या हो गया ? जब एक रात्रि भावुक होकर ,नीलिमा ने चंद्रिका को अपनी ससुराल वालों की बाते बताईं और धीरेन्द्र का व्यवहार ,उसका शराब पीना ,और घर में आकर उलीच देना, चादरें गंदी करना ,सब बताया था। 

तब चंद्रिका सोच रही थी ,इतनी कम उम्र में इसने इतना सब सहा और हमें कभी बताया भी नहीं। आज चंद्रिका को ,आपने आप पर लज्जा आ रही थी ,जो दिख रहा था ,वो सही नहीं था। जो इसके साथ हो रहा था ,वो तो किसी ने महसूस ही नहीं किया ,न ही किसी ने पूछा ,न ही इसने बताया। हममें से ,कोई सोच  भी नहीं सकता ,कि  ये उस घर में इतना सब झेल रही होगी।  आज चंद्रिका चुपचाप बैठी अपनी बहन की तरफ देख रही थी। आज उसे ये कितनी मासूम और प्यारी लग रही है। क्या इसके साथ ही ,ये सब होना था ? अकेली ! ये सब कैसे सहेगी ?आज उसे अपनी बहन पर बहुत प्यार आ रहा था। वो उठी और अपने बेटे के पास बैठी अपनी बहन को अपने गले लगा लिया। कहने को कुछ नहीं रह गया था , उसका गला जो रुंध गया था। 

  इस बीच नीलिमा ने एक स्कूल में अपनी परेशानी बताकर नौकरी पानी चाही ,पहले तो उन्होंने इंकार ही कर दिया। इसी सब में ,तेरह दिन कब बीते ?पता ही नहीं चला। धीरेन्द्र की तेहरवीं पर जिन लोगों को बुलाया गया वे सभी आये ,उसके मायके वाले भी आये ,उन्हीं के साथ चंद्रिका भी चली गयी। आज फिर से नीलिमा का घर सुनसान ख़ाली हो गया था। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कहाँ से कैसे  शुरुआत करे ? 

पुलिस थाने में ,इंस्पेक्टर साहब अभी नहीं आये थे ,सुबह के नौ बजे थे ,हवलदार चेतराम और अन्य सिपाही आकर किसी न किसी कार्य में लगे थे। तभी थाने  के फोन की घंटी बजती है ,एक  सिपाही बोला -सुबह -सुबह किसका फोन आ गया ?

 पता नहीं ,उठायेंगे तभी तो पता चलेगा चेतराम कह रहा था। 

तभी इंस्पेक्टर साहब प्रवेश करते हैं ,जो उनकी बातें सुन लेते हैं ,बोले -फोन उठा क्यों नहीं रहे ? या फिर मेरी प्रतीक्षा में हो ,कि आकर इंस्पेक्टर साहब ही उठायेंगे ,कहते हुए ,उसने फोन उठाया -हैलो ! मैं इंस्पेक्टर विकास खन्ना बोल रहा हूँ। 

उधर से कुछ दबी सी आवाज आई - इंस्पेक्टर साहब ! धीरेन्द्र की हत्या हुई है ,उसने आत्महत्या नहीं की बल्कि उसका खून हुआ है। 

आवाज पतली और बारीक़ थी ,उससे इंस्पेक्टर ने अंदाजा लगाया शायद कोई  लड़की है ,उसी आधार पर उसने पूछा -आप कौन बोल रही हैं और कहाँ से ?

मैं कोई भी हूँ ,इससे आपको कोई मतलब नहीं होना चाहिए ,आप बस धीरेन्द्र के क़ातिल का पता लगाइये ,कहकर उसने फोन काट दिया। 

किसका फोन था ? साहब !

पता नहीं ,किसी लड़की  का फोन था। 


इस उम्र में लड़कियों के ही फोन आएंगे कहकर जोरावर हंसा। 

अपने साहब ,हैं ही इतने स्मार्ट !सुबह से ही फोन आने लग गए ,हालाँकि वो जानते थे ,बात कुछ और ही है किन्तु उन्होंने विकास को चने के झाड़ पर चढ़ाने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ी। ये विकास पर निर्भर करता है कि वो उस झाड़ पर चढ़ता है ,या नहीं। 

ऐसा ही हुआ भी ,जैसा हर बार होता है , किसी ऐसी -वैसी लड़की का नही फोन नहीं  था वरन किसी अनजान लड़की का फोन था ,जो कह रही थी -धीरेन्द्र ने आत्महत्या नहीं की वरन उसकी हत्या हुई है। 

क्या??दोनों ने ,आश्चर्य से एक साथ पूछा। क्या ?ये वो ही केस की बात कर रही है ,जो कुछ दिन पहले रेलवे ट्रैक पर मौत हुई। 

हाँ वही....... लग तो मुझे भी रहा था ,जैसी स्थिति में वो हमें मिला ,लग रहा था वो स्वयं न गिरकर किसी ने उसे धक्का दिया है किन्तु एक नौ से छह की नौकरी करने वाला इंजीनियर ,उसका कौन दुश्मन हो सकता है ?सोचते हुए इंस्पेक्टर अपनी कुर्सी पर बैठा। 

तभी जोरावर दौड़ता हुआ बाहर गया और चेतराम उसके करीब आया ,साहब ! उसकी हत्या का अंदेशा होता तो कोई कुछ तो कहता ,उसके घरवाले ,उसकी पत्नी ,किसी ने भी कोई रिपोर्ट दर्ज़ नहीं कराई। तब ये कौन मैडम हो सकती हैं ? जिसे धीरेन्द्र का  मरना ,आत्महत्या नहीं ,हत्या लग रही है। तब तक जोरावर चाय के साथ ,''ब्रेड पकौड़ा '' भी ले आया था ,उसने दोनों चीजें मेज पर सजा दीं। 

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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