Dur rhakar bhi......

दूर  रहकर भी ,तेरा प्यार बुलाता है ,मुझे,

तेरे दूर जाने पर ,ये ज़माना क्यों आजमाता है ?मुझे !

दूर रहकर भी ,तू क़रीब लगता है ,

तेरा ये यक़ीन ,मुझमें नूर भरता है। 

दूर रहकर भी ,तुम आस -पास नजर आते हो ,

मेरी तन्हाईयों में आ ,रूह में समा जाते हो।

दूर रहकर भी ,लगता है ,हाथ थामा है मेरा ,

अपने ही दिल से पूछ बैठती हूँ ,क्या लगता है ?तेरा !

अगर तुम साथ हो !


तू ही तू है,हर कहीं नजर आता है ,मैं तेरी पनाहों में ,

मुझे झुका सकता, ये जमाना नहीं ,'अगर तुम साथ हो.'' 

महकी  हूँ ,तेरी यादों से   ,उलझी हूँ तेरे वादों से   ,

लड़ जाऊँ  ,तेरे लिए इस दुनिया से ,''अगर तुम साथ हो।''   

अँखियों की खिड़की से ,दिल के आईने में तुझे निहारती हूँ। 

सब कुछ इस दुनिया का , तुझ पर वारती  हूँ ,''अगर तुम साथ हो।''   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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