बाबा की नगरी ,काशी !
बचपन से ही सुनती आई।
गयी नहीं ,मैं उनके पास ,
मेरे मन और विचारों में समाई।
गंगा तीरे , जिसका वास ,
वो हैं ,बाबा विश्वनाथ !
जिस नगरी ,कभी गयी नहीं ,
फिर कैसे बतलायें ?
कैसे ?उनके गुणगान सुनाएँ।
यूँ ही ख्यालों में ,बनारस चले आये।
भोले बाबा की नगरी में ,
चाय ,जलेबी का स्वाद अजब है।
मोक्ष का ये'' धाम '',गज़ब है।
साड़ी का काम ,अजब है।
पान का भी ,स्वाद गजब है।
ये नगरी ही अजब -गज़ब है।
लोगों ने , सचित्र वर्णन किया ,
लगता है.......
मैंने घर में ही ,बाबा का दर्शन किया।
