Asi bhi zindgi [part 54 ]

आज सुबह ही अपने  काम पर जाते हुए ,धीरेन्द्र को वो दिख गया ,जो दिखना नहीं चाहिए। धीरेन्द्र  गाड़ी की आड़ में जाकर खड़ा हो गया और सोचने लगा ,जब ये जाये ,तब मैं यहाँ से निकलूँ। वो तो शायद उसी से मिलने आया था। शायद घर से ही ठानकर आया था ,आज उससे मिले बिना नहीं जायेगा।  बचपन का साथी जो ठहरा। धीरेन्द्र की सभी हरकतों से वाकिफ़ था और घूमकर वो वहीं आ गया जहाँ धीरेन्द्र छिपा था। उसका पीछे से कंधा थपथपाया ,जानते हुए भी ,धीरेन्द्र ड़र गया। समझ नहीं आया ,क्या करे ,या कहे ?



मैंने सोचा ,तुम तो दिखोगे नहीं ,बुलाऊंगा, तो आओगे नहीं ,मुझे देखकर भी नजर अंदाज कर जाते हो। तब मैंने सोचा ,अपना ही दोस्त है ,मैं ही मिल आता हूँ। लो ,अब आ गया ,अब बताओ ! हाल कैसे हैं ? चलो !अंदर चलते हैं या यहीं खड़ा रखोगे। 

क्या तू नहीं जायेगा ?तपन तेरा भी तो काम है ,अभी मैं भी अपने काम पर जा रहा हूँ। शाम को मिलते हैं ,धीरेन्द्र ने जल्दबाज़ी दिखाते हुए कहा।

  तपन तो जैसे लड़ने के मुड़ से ही आया था उसने गाड़ी की चाबी निकाली और बोला -काम पर जाकर भी क्या करना है ? कमाया ,तुझे दिया ,अब मुझे आवश्यकता हूँ तो तेरे पीछे घूम रहा हूँ ,अपने दिए पैसे ऐसे मांग रहा हूँ ,जैसे मैंने तेरी सहायता करके कोई गलती कर दी हो। मेरे पैसों से जो तू ये ऐश कर रहा है ,वो अब बंद कर ,मेरा पैसा दे। 

तू मेरी ऐश से जल रहा है या अपना पैसा मांगने के लिए आया है। 

दोनों ही चीज़ हैं ,मेरे पैसों से ही तो ऐश कर रहा है। 

हाँ ,तू ही तो अब तक मेरा और मेरे बच्चों का पेट भर रहा था ,धीरेन्द्र क्रोध में आकर कह गया। अरे !मैंने तो तुम लोगों पर जो पैसा ख़र्चा किया उसका कभी हिसाब माँगा ही नहीं। और मैंने परेशानी में तेरे से कुछ पैसे क्या ले लिए ?तू तो दोस्ती ,रिश्ता सब भूलकर ,उस पैसे पर ही फ़न फैलाये बैठा है। मिल जायेंगे तेरे पैसे !

हाँ वही  तो पूछ रहा हूँ ,कब मिलेंगे ?छह  महीने से मेरा बेवकूफ़ बना रहा  है। 

देख ,अभी मैं बहुत लेट हो रहा हूँ ,अभी मुझे जाने दे ,फिर बात करते हैं ,ला मेरी गाड़ी की चाबी ला !

तभी अंदर से बाहर नीलिमा किसी कार्य के लिए बाहर आई थी किन्तु धीरेन्द्र को देखकर बोली -अरे !अभी तुम गए नहीं कहते हुए उन दोनों के करीब आई। नमस्कार भाई साहब !कैसे हैं ?

मैं तो ठीक हूँ ,इससे मिलने आया था तो अब ये जा रहा है। तभी उसने चाबी धीरेन्द्र को दी और बोला -भाभीजी !एक कप  चाय नहीं पिलायेंगी। 

हाँ-हाँ  क्यों नहीं ?आ जाइये !

तपन ने  गहरी मुस्कान के साथ धीरेन्द्र को देखा और नीलिमा के पीछे चल दिया ,पहले तो धीरेन्द्र का मन घबराया और मन ही मन बुदबुदाया -साला , कहीं  कुछ बक न दे ,फिर घड़ी में समय देखा और गाड़ी स्टार्ट कर चला गया। 

बैठिये ,भाईसाहब ! चम्पा जरा चाय तो बनाना !

क्या..... चम्पा अभी यहीं है ,तपन ने आश्चर्य से पूछा। 

हाँ...... दो साल से यहीं है ,तीन बच्चों के साथ इसका बहुत सहारा है ,वरना मैं अकेली कैसे सब संभाल पाती ? 

तीन बच्चों के बाद भी ,आप आज भी वैसे की वैसी ही लग रही हैं ,जैसे अपनी शादी में लग रही थीं। कोई कह नहीं सकता कि आपके तीन बच्चे हैं। तभी चम्पा भी ,चाय लेकर आ गयी।उसको घूरकर देखता रहा,उसके जाने के पश्चात बोला - आपकी तो नौकरानी भी ,नौकरानी सी नहीं लगती ,ऐसे रहती है ,जैसे घर की सदस्या ही हो। 

जी..... घर के सदस्य जैसी ही है ,नीलिमा मुस्कुराते हुए बोली। 

नौकर और मालिक में एक दायरा तो होना ही चाहिए ,वरना ये लोग !अपना अधिकार जताने लगते हैं। 

जी, हम भी इसे अपने घर के सदस्य की तरह ही रखते हैं ,हम और बच्चे भी कोई भेदभाव नहीं करते। तपन जिस तरफ इशारा कर रहा था ,उस इशारे को नीलिमा समझ नहीं पाई  किन्तु अपने  प्रति उसकी दृष्टि को समझ गयी और बच्चों का बहाना बना वहां से उठ गयी।

शाम को जब धीरेन्द्र आया ,नीलिमा ने पूछा -तुम्हारा, ये दोस्त क्यों आया था ?

क्यों क्या हुआ ?कुछ कह रहा था क्या ?

नहीं ,अनाप -शनाप बोलता रहता है ,मैंने तो बच्चों का बहाना बनाकर उसे टरकाया। वैसे इतनी सुबह -सुबह उसके आने का क्या मक़सद हो सकता है ?

अरे !कुछ नहीं ,थोड़े  पैसे  माँग रहा था। 

तब तुमने क्या कहा ?

क्या कहता ?मैंने भी कह दिया -देखता हूँ ,इस माह खर्चा भी बहुत हो गया। 

कैसे-कैसे लोग हैं ? सुबह से ही उधार मांगने आ जाते हैं ,अपनी आवश्यकताएं इतनी बढ़ा लेते हैं और फिर मांगने आ जाते हैं ,शर्म भी नहीं आती। वैसे कितने पैसे मांग रहा था ?पचास हज़ार..... 

क्या ?इतने पैसे !इन पैसों का क्या करेगा ?


अब धीरेन्द्र समझ गया कि नीलिमा समझ रही है ,कि वो पैसा उधार मांगने आया था किन्तु अपना ,वो ये नहीं जानती ,सोचकर मन ही मन मुस्कुराकर शौचालय में चला गया ,उसके बाद  बाहर बगीचे में आया ,तभी उसे किसी के पैरों की आहट हुई ,उसने पीछे मुड़कर देखा ,तो चम्पा खड़ी नजर आई ,मुझे पांच सौ रूपये चाहिए। 

 किसलिए ?

जरूरत है। 

वही तो पूछ रहा हूँ ,कहकर झल्लाया।

इस तरह क्यों झल्ला रहे हो ?मैंने कुछ पैसे ही तो मांगे हैं। 

ये कुछ पैसे हैं ,पूरे पाँच सौ रूपये मांग रही हो ,मैं पूछता हूँ ,इतने पैसों का क्या करेगी ?जब देखो !पैसे मांगने लग जाती है। मैंने क्या पैसों का पेड़ लगा रखा है ?

चम्पा क्रोध में बोली -मैं कोई ख़ैरात नहीं मांग रही। 

ये ख़ैरात नहीं तो और क्या  है ,क्या नीलिमा ने तुझे ,तेरा महीने का वेतन नहीं दिया। 

दिया तो है..... किन्तु ,

किन्तु क्या ?तूने अपने खर्चे बहुत बढ़ा लिए हैं ,अब मेरे पास और पैसा नहीं है ,समझी !धीरेन्द्र डपटते हुए बोला। 

धीरेन्द्र की तेज़ आवाज सुनकर नीलिमा बाहर आई ,क्यों क्या हुआ ?किस बात पर चिल्ला रहे हो ?

कुछ नहीं ,जब देखो ,पैसे मांगती रहती है ,तुमने भी न जाने कैसे -कैसे भिखारी पाल रखे हैं ?वो क्रोध में कहता गया ,उसने ये भी नहीं सोचा -इस बात का चम्पा पर क्या असर होगा ? उसके परिणाम  विषय में भी नहीं सोचा।  

हो सकता है ,ये सम्पूर्ण बातें मेरे और इसके बीच हुईं ,कहीं नीलिमा को न बता दे। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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