मोहब्बत ! इक प्यारा एहसास होती है ,
न कम न ज़्यादा ,वो तो' बेहिसाब' होती है।
मोहब्बत के मारो को 'दिलजले 'भी कहते हैं ,
वे तो मोहब्बत में फ़ना ,उसी के हो रहते हैं।
ऐसी मोहब्बत, दिखती ही कहाँ है ?इस जहाँ में ,
''बेहिसाब मोहब्बत ''तो ''उससे ''भी नहीं होती।
लैला -मजनू ही नहीं ,हर किसी को मोहब्बत होती है ,
वो विशेष मोहब्बत ,हर किसी के लिए नहीं होती ।
मोहब्बत शक़्ल -सूरत ,जज़्बातों में ही नहीं सिमटती ,
शिद्द्त से प्यार करने वालों में, रूह से भी मोहब्बत होती है।
उसे याद करते हैं ,जहाँ वाले ! मतलबी हैं ,
बेमतलब तो'' उससे ''भी बात नहीं होती ।
मोहब्बत को न तोल ,इश्क़ के तराज़ू में ,
इश्क़ की किसी से भी, बराबरी नहीं होती ।
किसी का भी अंतर्मन ,पाक़ हो ,उसे हर किसी से मोहब्बत होती है।
मोह्ब्बत में मर -मिटनेवालों में ,हर किसी की पहचान नहीं होती ।
