Parivar

                                             ''मानो तो मैं गंगा माँ हूँ ,न मानो तो बहता पानी। '' 

नमस्कार बहनों और दोस्तों ! अब आप ये सोचेंगे - ये गाना मैं आपको क्यों बता रही हूँ ? क्योंकि हमारे देश में सबसे पवित्र जल 'गंगा 'का  ही माना जाता है। और हम भी सभी ,उस जल से पूजा,अर्चना के साथ -साथ घर को पवित्र करने के लिए भी ,उसी जल का उपयोग करते हैं। धार्मिक कार्यों में भी उसी जल से शुद्धि करते  हैं। उस जल में स्नान करने के पश्चात ,उसे बोतलों में भरकर ,घर में भी लाते हैं। जब मनुष्य का अंतिम समय होता है ,तब उसके मुख में भी ,यही जल डाला जाता है। मरणोपरांत उसकी अस्थियाँ भी उसी जल में प्रवाहित की जाती हैं। क्यों ???? क्योंकि उस जल को जन्म से लेकर मृत्यु तक, अपने बड़ों से यही सुनते हुए आये हैं कि ये पवित्र जल है ,एक तरह से कहा जाये तो ,ये पृथ्वी के लोगों के लिए 'अमृत 'के समान है।



क्योंकि इससे हमारी भावनाएँ जुडी है ,इस पर हमें विश्वास और श्रद्धा है। ये जल तो......  कोई भी हो अमीर हो या गरीब ,छोटा -बड़ा नहीं देखता ,सभी के लिए समान है। न ही ये जाति देखता है न ही धर्म ,न ही किसी से कहने जाता है -''कि मेरा इस्तेमाल करो , माँ मानो।'' ये तो लोगो की अपार श्रद्धा और विश्वास है जिनके लिए ये पूजनीय है वरना देखने में तो ये साधारण पानी ही है ,अन्य नदियों की तरह ही ,ये भी एक नदी है।

 किन्तु दीदी...... !

अब आप सोच रहे होंगे ,' मेरा परिवार 'विषय पर लिखने से पहले मैं ,गंगा के विषय में क्यों बता रही हूँ ?इससे इस बात का क्या संबंध है ?

हाँ वही  तो..... 

''मेरा परिवार ''ये शब्द ऐसा है ,जहाँ जाकर व्यक्ति ध्यान, एक जगह ही केंद्रित हो जाता है। यानि कि उसकी 'छोटी सी दुनिया' जिसमें  उसके माता -पिता ,भाई -बहन ,ताऊ -चाचा ,दादा -दादी ,नाना -नानी ,जैसे रिश्ते नजर आते हैं। ये भी कह सकते हैं ,खून के रिश्ते या उनसे जुड़े रिश्ते ही नजर आते हैं। तब एक व्यक्ति का सोचने का दायरा सीमित हो जाता है। किन्तु देखा जाये तो ,''ईश्वर ने इतना बड़ा संसार एक परिवार के रूप में ही रचा है।''

किन्तु अपना परिवार तो अपना ही  होता है ,हाथों के इशारे से तृषा को शांत करते हुए ,वो बोलती रही।  

जिस तरह एक परिवार में ,अलग -अलग रिश्ते होते हैं ,अलग -अलग सभी की सोच होती है। कुछ रिश्ते दूर के भी होते हैं ,जिनसे हम बरसों तक नहीं मिलते। कुछ रिश्ते स्वार्थी ,मतलबी ,फ़रेबी ,भी होते हैं। कुछ को हम शीघ्र ही पहचान जाते हैं किन्तु कुछ रिश्तों को पहचानने में समय लगता है। जब पहचान हो भी जाती है ,तब भी ,समाज के ड़र से ,या फिर लिहाज़ के कारण भी ,हम उन रिश्तों से जुड़े रहते हैं। न ही निगलते बनता है ,न ही  उगलते। कई बार इन रिश्तों से दर्द मिलता है ,हम रोते भी हैं किन्तु अपना समझ , कई बार क्षमा भी कर देते हैं ,और कई बार क्षमा करने का दिल नहीं करता ,कुछ कहना चाहकर भी कुछ नहीं क हते , क्योंकि हम उस रिश्ते से जुड़े रहना चाहते हैं। कुछ रिश्ते इतने क़रीबी होते हैं ,हम दर्द सहते हैं किन्तु एक आशा या उम्मीद में ,उससे उलझे रहते हैं। जैसे -पति -पत्नी का रिश्ता ,कभी अपने बच्चों की ख़ातिर ,कभी अपने घर के लोगों की ख़ातिर ,कभी संस्कारों की ख़ातिर उस रिश्ते की उलझनों को ताउम्र सुलझाते रहते हैं। इस रिश्ते में ,अंत तक एक उम्मीद बंधी रहती है ,आगे से सब ठीक हो जाये।

नहीं जी ,ऐसा नहीं है ,अब तो आजकल के बच्चे फौरन ही रिश्तों की घुटन से दूर रहने के लिए तलाक ले लेते हैं। अब कोईं नहीं झेलता नीता बोली। 

झेलते भी हैं ,अभी कुछ परिवार बचे हैं ,परिवारों में थोड़ी ऊंच -नीच तो हो ही जाती है इसका अर्थ ,ये तो नहीं कि तलाक ले लो। क्या हम नहीं थे ?हमने सास की भी सुनी ,रिश्तों को बनाकर भी चले ,हर चीज हल तोडना ही नहीं ,जब तुम्हारी ही ऐसी सोच है , तब आनेवाली पीढ़ी को क्या सीख़ दे पाओगे ?पूनम बोली।    

कुछ लोग अपना ही सोचकर ,एक झटके में इस रिश्ते की घुटन से अलग हो जाते हैं ,तब वो परिवार कहाँ रहा ? कभी -कभी जिस औलाद को हम पाल -पोसकर बड़ा करते हैं ,वो भी उम्र के एक पड़ाव पर आकर साथ छोड़ जाते हैं। तब वो परिवार कहाँ रहा ? जब भाई ही भाई का खून कर देता है ,सम्पत्ति के लिए षडयंन्त्र करता है , तब वो परिवार कहाँ जाता है ? तब ईश्वरीय परिवार के सदस्य ही, न जाने कौन ,कहाँ से आकर उन लोगों की सहायता करते हैं?' वृद्ध आश्रमों 'में 'मेरे परिवार 'के लोग नहीं आते वरन वो ऊपरवाला ही सद्बुद्धि देकर मदद के लिए भेजता है। तब हम किस परिवार के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं ? जिसका अंजाम हमें मालूम है ,छल ही मिलना है। किन्तु कहते हैं ,खून के रिश्ते ही अपने होते हैं ,लहु -लहु  को पुकारता है। तब विशेष परिस्थितियों में लहु की पुकार कहाँ चली जाती है ?

ये तो आप सही कह रही हैं ,किन्तु......  

किन्तु क्या ? इसीलिए तो कहती हूँ -''ये सम्पूर्ण संसार ही अपना' परिवार 'है '',जिसमें कुछ लोग ऐसे मिलते हैं जिनसे हम अपने दिल का हाल बता सकें। कुछ लोग छली -कपटी भी हो सकते हैं ,उनसे बचकर ही रहना है। कुछ को तो हम जानते ही नहीं ,दूर के रिश्तों की तरह ,कुछ रिश्ते दर्द भी दे जाते हैं ,कितना भी बच लो ?किन्तु जीवन में एक न एक व्यक्ति ऐसा मिल ही जाता है ,जिसे हम झेलते हैं ,कई बार बॉस भी ऐसा मिल जाता है जिसे झेलना हमारी मजबूरी बन जाता है। किन्तु पत्नी की तरह ही ,न वो उगलते बनता है न ही निगलते। क्योंकि ''पापी पेट का सवाल ''जो है।

उनकी बात सुनकर सभी हंसने लगती हैं ,वाह ! पत्नी की तुलना बॉस से ,पत्नी न हुई बॉस हो गयी किन्तु सभी बॉस कड़क नहीं होते रेनू ने अपना सुझाव दिया। 

अच्छा चलिए !अब इस चर्चा को यहीं समाप्त करते हुए ,कहती हूँ , मेरी ऊपर की पंक्तियों का यही आशय है ,''मानो तो सभी अपने हैं ,न मानों तो कोई भी अपना नहीं।'' सभी एक परिवार ही तो हैं ,अब हमें ही देख लो ! रेनुजी ,पूनम जी ,मीनाक्षी जी  सभी अलग -अलग जगहों से आती हैं किन्तु यहाँ आकर कुछ देर के लिए ही सही ,''हमदर्द ''बन एक परिवार हो जाते हैं ,जो कभी -कभी सुख -दुःख में भी साथ निभा जाती हैं। धन्यवाद !फिर मिलेंगे। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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