नमस्कार बहनों और दोस्तों ! प्राचीन समय में ,लोग कर्मों के आधार पर वर्णों में बँटे थे। ये सही भी है ,हर आदमी का कार्य निश्चित था। जिस प्रकार ,शरीर के सभी अंग अपना -अपना कार्य करते हैं ,उसी प्रकार सभी अपने -अपने कार्यों का निर्वहन करते थे। ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र इन्हीं वर्णों के आधार पर शरीर की भांति ही ,समाज का निर्माण हुआ।शरीर का एक भी अंग यदि कार्य करना बंद कर दे तो ,भुगतना सम्पूर्ण शरीर को ही पड़ता है। मुख यानि ब्राह्मण ,क्षत्रिय यानि भुजाएँ ,वैश्य यानि अमाशय ,शूद्र यानि सम्पूर्ण शरीर का स्तम्भ पैर। पैर कार्य न करें तो शरीर उठेगा ही नहीं ,पेट कार्य करना बंद कर दे तो ,तन में शक्ति का संचार नहीं होगा। हाथ कार्य न करें तो सुरक्षा कैसे होगी ?अपने तन की ही नहीं वरन बा हरी ताकतों से भी सुरक्षा प्रदान करता है।
बुद्धि यानि ब्राह्मण ,इन सभी का सही से संचालन करने का कार्य करता है। समय बदला लोग बदले और धीरे -धीरे समाज जातियों में विभाजित होने लगा। एक जाति दूसरी जाति को नीचा दिखाने लगी। हर कोई अपने को श्रेष्ठ समझने लगा। कुछ लोग जाति के दम पर ,मनमानी करने लगे ,छूत -अछूत की भावना घर कर गयी।सबसे अधिक तो अमीर अपने से छोटो को नीचा दिखाने लगे ,फिर चाहे वो किसी भी जाति का ही क्यों न हो ?अमीर या रईस ख़ानदान होने के कारण उनके अंदर अहंकार की भावना घर कर गयी। जो किसी को भी और कहीं भी नीचे दिखाने से परहेज़ नहीं करते किन्तु सभी ऐसे नहीं थे।
उच्च वर्ग के ही कुछ ज्ञानीजनों को ,ये व्यवहार उत्तम नहीं लगा ,उन्होंने ही शूद्र वर्ण के लोगों के लिए अपनी आवाज बुलंद की। बहुत से ऐसे समाज -सुधारक भी हुए ,जो हमारे समाज की विसंगतियों को लेकर जागरूक हुए और उसके विरुद्ध आवाज भी उठाई किन्तु समय के साथ -साथ हमारा समाज जाति के दम पर टुकड़ों में बंटता चला गया। हर व्यक्ति अपने को दूसरी जाति से ऊँचा समझने लगा। एक -दूसरे का साथ नहीं ,वरन एक -दूसरे को अपने से छोटा मानने लगे। अच्छा एक बात बताइये ! ''जातिवाद ''क्या है ?
यही कि अपनी जाति को श्रेष्ठ समझना ,उसे ही बढ़ावा देना ,सहयोगात्मक नजरिए का समाप्त हो जाना ,जबकि धर्म सभी का एक है ,'हिन्दू धर्म ' किन्तु जन्म के आधार पर ही जातियों का निर्माण होता है। अन्य जातियों की अपेक्षा ,अपनी जाति को श्रेष्ठ समझना ही' जातिवाद ' है , रेनू बोली।
दीदी !ये बात तो है ही ,किन्तु अपनी ही ,जाति में भी, कुछ लोग ऊंच -नीच को मानते हैं ,इसमें भी हमारा' गोत्र' बड़ा है या फिर पैसे के आधार पर भी अपने से छोटो को, वो सम्मान नहीं देते। एक -दूसरे को कहते रहते हैं ,किन्तु अपने आप पर ध्यान नहीं जाता।जो व्यक्ति किसी दूसरे से हताहत है ,वो स्वयं अपने से नीचे वाले को वो सम्मान नहीं दे पाता ,काव्या बोली।
जातिवाद सिर्फ़ बड़ी जातियों की ही बिमारी नहीं है ,छोटी जातियों में भी ,मैंने इस बिमारी को देखा है। हमारी ही जाति के कुछ श्रेष्ठजन उन्हें आगे बढ़ने का मौका देना चाहते हैं और देते भी हैं किन्तु इन लोगों का 'टारगेट 'फिर भी उच्च जाति ही होती है। जैसे उनसे पैदाइशी दुश्मनी हो। हमारे ससुर ने ही कई गरीब बच्चों को पढ़ाया ,उनकी सहायता भी की ,उसका तो नाम कहीं नहीं दिखता। इसका सबसे बड़ा लाभ राजनीतिज्ञ उठाते हैं। अपनी वोट बटोरने के लिए ,'जातिवाद' को मुद्दा बना देते हैं। समाज को टुकड़ों में बाँटना चाहते हैं ,ताकि उनको इसका लाभ मिले। ''आरक्षण ''इसी बात का एक उदाहरण है। क्या उच्चकुल में गरीब नहीं होते ,क्या सभी 'मुँह में सोने की चम्मच लेकर' पैदा होते हैं ?इसका एक उदाहरण तो -भगवान कृष्ण के समय का ही है ,सुदामा ब्राह्मण होते हुए भी गरीब था और कृष्ण यदु वंशी ,ग्वाले होकर भी राजा थे। अब आप ही बताओ !इसमें 'जातिवाद 'कहाँ से आ गया ?
आप ही के कहे अनुसार ,कल को यदि मुँह कहे कि मैं बोलूंगा नहीं या फिर खाना नहीं खाऊंगा तब सम्पूर्ण शरीर पर इसका असर होगा कि नहीं ,हाथ कार्य करना बंद कर दें तो क्या इस शरीर रूपी समाज का कार्य रुकेगा या नहीं ?अथवा पेट खाना पचाने का कार्य रोककर कहने लगे ,मुझे कोई और कार्य करना है , या पैर कहें कि हम चलना नहीं चाहते हैं ,क्या पैर खाने का कार्य कर सकते हैं ? शरीर का सम्पूर्ण ढांचा बिगड़ जायेगा। यही हालत हमारे समाज की हो रही है।' जातिवाद 'के नाम पर कुछ स्वार्थी लोग हमारे समाज के ज़िम्मेदार नागरिकों को भड़काते रहते हैं। इससे उनका 'राजनीतिक 'और 'सामाजिक 'स्वार्थ सिद्ध होता है और कुछ नहीं श्रीमती निर्मला बोलीं।
निर्मला जी की भी बात सही है ,दलित ,दलित कहकर उन लोगों को भड़काते रहते हैं ,क्या हमारे देश में मायावती दलित नहीं थीं ?आज के समय में करोड़ों की मालकिन हैं ,क्या उन्होंने अपने लोगों को बढ़ाया नहीं ,सभी का सहयोग था ,इसमें सभी ने अपने वोट द्वारा उन्हें आगे बढ़ाया ,लोगों का उद्देश्य जातिवाद को बढ़ावा देना नहीं ,वरन क़ाबिलियत और एक अच्छी सोच को आगे लाना है , रेनू ने समझाया।जो क़ाबिल होगा ,जिसमें कुछ हुनर होगा ,उसे किसी सहारे की आवश्यकता नहीं ,न ही ''आरक्षण ''की बैसाखियों की। फिर भी 'जातिवाद 'का डंका बजता रहता है। वो भी उच्च जातियों को लेकर ,क्या ये सही है ?
दीदी ! मैंने तो देखा है ,मेरे पड़ोस में ही ,एक दलित परिवार रहता है ,उनके परिवार के सभी सदस्यों को सरकारी नौकरी मिली है ,''आरक्षण ''के दम पर ,वे लोग भी अपनी ही जाति के लोगों से सम्पर्क नहीं रखना चाहते ,अब इसे आप क्या कहेंगी ?'पूंजीवाद ''कृति की ये बात सुनकर सभी हंस दीं। उसने आगे कहना जारी रखा -'एक दलित अपनी बेटी या बेटे का विवाह किसी ब्राह्मण परिवार या फिर किसी भी ऊँची जाति में करना चाहते हैं किन्तु कभी आपने ये सुना-' किसी दलित ने अपनी बेटी का विवाह अनुसूचित जनजाति के लोगों में किया या फिर किसी जमादार के घर किया ,नहीं किया क्योंकि वहां भी तो ''जातिवाद ''ही पनप रहा है। किसी हरिजन की बेटी या बेटा कुर्मी ,भील ,कुम्हार ,धींवर इत्यादि जनजातियों में क्यों नहीं करते ?क्योंकि वहां भी' जातिवाद 'ही पनप रहा है किन्तु बदनाम तो उच्च वर्ग के लोग ही हैं। उन्हें ही निशाने पर लाकर राजनैतिक खेल खेला जाता है। वैसे आजकल की ये पढ़ी -लिखी पीढ़ी ''जातिवाद ''को न ही समझती है ,न ही समझना चाहती है। बहुत बदलाव आये हैं और आगे भी होते रहेंगे।
चलिए ,आज आप सभी के विचार सुने ,और मन में छिपी भड़ास भी देखी ,इससे पता चलता है' जातिवाद' के नाम पर समाज में गंदा खेल खेला जाता है ,इसके आधार पर समाज को बाँटने का प्रयास भी किया जाता है ,समाज के इस भेदभाव का राष्ट्र भी असर होता है ,जो कि सही नहीं है ,''इसी कारण इसे एक सामाजिक बुराई भी कह सकते हैं ''जिस कारण समाज की एकता को समाप्त करता है।सबसे पहले हमें ये नहीं भूल जाना चाहिये -''कुछ भी होने से पहले, हम हिंदुस्तानी हैं ,हिन्दू हैं '' जब ये सोच होगी ,तब दुश्मन की अथवा विरोधी की आधी हार तो निश्चित है। '' एक -दूसरे का साथ सहयोग ही हमारे समाज और देश को मजबूत बनाने में सहायक होगा। सभी का अपना -अपना महत्व है ,कुछ लोग पर्दे के पीछे कार्य करते हैं ,कुछ लोग पर्दे के सामने ,सभी का समान रूप से सहयोग होने पर ही एक सुंदर ''चलचित्र ''का निर्माण होता है। धन्यवाद ! फिर मिलेंगे।