जिंदगी अपनी राह पर बढ़ती चली जा रही थी।
न जाने , वह कहां और किधर जा रही थी ?
न मंजिल का था पता, न ही कोई राह सूझती थी।
जिंदगी बस आगे ही आगे, बढ़ती जा रही थी।
मंजिल की तलाश में, मैं भी उस राह पर बढ़े जा रही थी।
बहुत चलने पर, ढूंढने पर भी, मंजिल नजर नहीं आ रही थी।
परिश्रम मैंने भी किया , परिश्रम उतना ही उसने भी किया।
फिर वो क्यूँ कर आगे निकल गया ? यही प्रश्न ख़ुद से किया ?
क्या यह मेरी किस्मत का दोष है?जिंदगी समझ नहीं आ रही थी।
पहुंचना मुझे भी मंजिल तक था,पर किस्मत झटके खा रही थी।
जीवन में एक यू टर्न आया, यू टर्न आते ही किस्मत पलट गई।
जिस मंजिल तक था पहुंचना, सामने ही वो मंजिल दिख गई।
तब जीवन में यह सीखना यार, जब भी जीवन में यू टर्न आया।
एक नई दिशा पर बढ़ते कदमों से , मंजिल को हमने पाया।
सुकूं तो यही है ,शुरुआत भले ही, दोबारा करनी पड़ जाए।
कभी तो किसी मुकाम पर मनचाही मंजिल हमें मिल जाए।
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