दीपू के स्कूल में आज मैडम ,ने समझाया ,कल 'पच्चीस दिसंबर' है ,कल ''क्रिसमस ''का त्यौहार है। कल के दिन ''सेंटा ''आता है और बच्चो को 'उपहार भी देता है। कल तो बड़ा मजा आएगा ,हमने अपने घर में ये त्यौहार कैसे मनाया ? इसके ऊपर ''निबंध ''भी लिखना है।सभी अपने घर से निबंध लिखकर लायेंगे। छुट्टी से अगले दिन सभी बच्चे स्कूल गए और सभी से' मैडम 'ने अपने -अपने निबंध को पढ़ने के लिए कहा। सभी बच्चों ने अपना -अपना निबंध पढ़कर सुनाया। मैडम, को उपहार और कार्ड्स भी दिए। जब दीपू की बारी आई ,तब दीपू ने अपना निबंध सुनाना आरम्भ किया।
इन दिनों में ,हमारा देश ,अपने धर्म की रक्षा करते हुए ,गुरु गोविन्द सिंह जी के बच्चों की क़ुरबानी और उनकी माँ की क़ुरबानी को कैसे भूल सकता है ? जिन्होंने अपने धर्म की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी।
ये तुम क्या लिखकर लाये हो ,मैडम ने रोका।
जी ,आज से लगभग तीन सौ साल पहले ,आनंदपुर साहिब में , बीस दिसंबर को' गुरु गोविन्द सिंह जी 'का परिवार उनसे बिछुड़ गया था। तब हम कैसे ख़ुशियाँ मना सकते हैं ?उनके रसोइये ने ही उनके बच्चो और उनकी माँ को ,पैसों के लालच में उन्हें बंदी बनवा दिया।
वो लोग अपने धर्म की रक्षा के लिए झुके नहीं ,उन्होंने इतनी ठंड में अनेक अत्याचार सहे। क्या एक बात आप जानते हैं ?उस समय उनकी उम्र क्या थी ? एक नौ बरस का जोरावर था दूसरा छह बरस का फ़तेह सिंह था। उन्हें उनकी दादी के साथ बिना कंबल के भूखे -प्यासे ,''वज़ीर खान ''ने एक बुर्ज़ में उन्हें कैद कर दिया। उन्हें झुकाने के लिए 'वजीरखान 'ने अपने दरबार का दरवाजा भी छोटा किया किन्तु वे अपनी होशियारी से वहां भी नहीं झुके।
तब उन्हें बहुत डराया धमकाया गया ,धर्म बदलने के लिए कहा गया किन्तु उन्होंने उल्टे अपने पंथ का जयकारा लगाया और उसे अपने धर्म का ज्ञान दिया। परिणामस्वरूप ,'वज़ीरखान' को अपनी बेइज्जती लगी और उसने दोनों बच्चों को जिन्दा ही दीवार में चुनवाने का हुक़्म दिया।
इस तरह एक हफ़्ते में ,गोबिंद सिंह जी का पूरा परिवार देश और धर्म की रक्षा के लिए शहीद हो गया। एक पूरा का पूरा परिवार कुर्बान हो गया। उन लोगों की क़ुरबानी भूलकर हम कैसे कोई ख़ुशी मना सकते हैं ?
रही बात ''सेंटा '' की सेंटा तो हमारे साथ ही हमारे घर में रहता है ,जो हमारे लिए ही सब कुछ करता है ,हमारे घर की छत है , हमारे लिए प्रतिदिन जीता -मरता है ,ठंडी -गर्मी में हमारे लिए मेहनत करता है। हमारी छोटी -छोटी खुशियों का ख्याल रखता है। वो सिर्फ एक दिन ही नहीं वरन हमेशा ही हर दिन हमारे साथ होता है। जानते हैं ,वो सेंटा हर घर में होता है ,हमारे पिता के रूप में।
इतना सुनते ही ,सबने तालियाँ बजाईं ,इतनी अच्छी जानकारी और निबंध के लिए दीपू को मिली बधाई !
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