Breakup

                                           ''दिल पर पत्थर रखकर ,मैंने मेकअप कर लिया ,

                                                  मेरे सईयां से आज मैंने ,ब्रेकअप कर लिया। ''


नमस्कार दोस्तों और बहनों ! अब आप ये सोच रहे होंगे ,कि ये आज लक्ष्मी जी ने क्या कर दिया ?अपने घर की बात हमारे बीच ले आईं।   जी नहीं ,ऐसा आप गलत सोच रहे हैं ,ज्यादा प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं। ये तो मैं आज के विषय में वार्तालाप पर अपने कुछ विचार प्रस्तुत करना चाहूंगी। अब ये शब्द ''ब्रेअकप ''ही ऐसा बना है कि शब्द पर गम के बादल नहीं वरन आदमी गुनगुनाने लगता है। जैसे ये कोई ''ब्रेकअप ''न होकर किसी ने चुटकुला सुना दिया हो। अब समय इतना परिवर्तित हो गया है। एक ऐसा गंभीर शब्द है ,जिसके ज़िंदगी में आने से ,सपने हवा में तिनकों की तरह बिखर सकते हैं ,इसी शब्द से ज़िंदगी में भूचाल आ सकता है। किन्तु आज का मानव तो जैसे -

                             '' बर्बादियों का शोक मनाना फ़िजूल था ,बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया। ''

आज मनुष्य इतना व्यस्त है ,उसके पास बर्बादियों पर रोने का भी समय नहीं है ,और अपनी बर्बादी के शब्द पर ही उसने गाना बना डाला। आज की पीढ़ी के लिए तो जैसे ये खेल की बात हो गयी। अब जरा गंभीरता से सोचा जाये -क्या इस तरह रिश्ते बनते और निभाए जाते हैं।'' प्यार ''शब्द कितना प्यारा है ?जिसकी मिसाल राधा -कृष्ण का प्रेम ,हीर रांझा का प्रेम ,प्रेम की कोई सीमा नहीं राम -सीता का प्रेम ,मरने के पश्चात भी ,अपने प्रेम को दर्शाने के लिए ,ताजमहल बनवा देना ये सभी प्रेम के उदाहरण ही तो हैं। किन्तु आज के समय में 'ब्रेकअप ''प्रेम पर भारी पड़ रहा है। प्रेम होता है या नहीं ,ये एक अलग विषय है किन्तु ''ब्रेकअप ''अवश्य हो जाता  है। 

प्रेम में पहले करुणा थी ,दया थी ,त्याग था किन्तु आज के प्रेम में पहले दोस्ती होती है ,यानि की प्रेम को अब दोस्ती की बैसाखी की आवश्यकता पड़ने लगी। या ये कहें ,प्रेम को स्वीकारने के लिए उसे दोस्ती के कंधे की आवश्यकता पड़ती है। सभी कार्य तो दोस्ती की आड़ में ही हो जाते हैं ,तब प्रेम की गहराई में क्यों जाना ? और फिर मतलब अथवा कार्य सिद्ध न होने पर ''ब्रेकअप ''तो बैठा ही है। इसमें न किसी के आंसू आते हैं न ही दुःख का एहसास होता है ,न ही एक रिश्ता टूटने की गलती वरन जैसे कोई पहले से तुम्हारी प्रतीक्षा में था। अब तो लाइन साफ है और आगे रास्ता खुल जाता है ,एक नहीं ,कई काँधे ,उस कुछ देर के दुःख को दूर करने के लिए सामने आ जाते हैं ,क्योकिं उनमें प्रेम तो था ही नहीं बस उसने जो भी उपहार दिलवाये थे ,वे सभी वापस मांग लिए। राम -राम क्या हो गया है ?आज की पीढ़ी को !अब ये बात बनती भी है जिस बाप की मेहनत की कमाई वो उस पर लुटा रहा था ,हाथ -पल्ले तो  कुछ नहीं आया ,कम से कम उस कमाई का आधा तो वापस आये।

 ब्रेकअप न हुआ ,जैसे गुड्डा -गुड्डी का खेल हो गया ,अब तो ब्रेअकप होने पर बड़े शान से कहा जाता है -यार..... मेरा तो उससे ''ब्रेकअप ''हो गया नमिता बोली -परसों ही तो मेरी बेटी की सहेली ,मेरी बेटी के पास आई और बोली -तू कोई सस्ता सा उपहार मुझे बता ,अपने दोस्त को देना है और अपनी एक डिजाइनर ड्रेस दे दे।  सस्ता भी ,क्या चार सौ -पांच सौ तो यूँ ही उठ जाते हैं। हमारे जमाने में तो किसी ने एक ग्रीटिंग कार्ड ही दे दिया तो उसी में खुश हो जाते थे। पहली बात तो ,किसी का इतना साहस ही नहीं कि किसी लड़के से  बात भी करे दोस्ती करना तो दूर...... की बात है,तभी नमिता की बात बीच में काटते हए ,तमन्ना बोली।  

ऐसी कोई बात भी हो तो ,किसी के बगीचे में से तोड़कर एक फूल दे दिया किन्तु फूल देकर फ़ूल नहीं बना ता था और वही  फूल बरसों तक क़िताबों में स्मृति के तौर पर दबा रहता था। परिवार वालों से ,उन पलों को छिपाये ,कई बार विवाह किसी दूसरे से हो जाता था। 

क्या बात है ?तमन्नाजी !आज तो बहुत ही रोमांटिक हो रही हैं।

 नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं किन्तु अपने समय की मधुर स्मृतियाँ सोच रही हूँ जो आज भी एक सुखद एहसास दे जाती  हैं। माता -पिता को तो कब हमारी -दोस्ती हुई कब दिल दुखा ?शायद ही भनक लगती थी लगती भी थी तो घर में इज्जत के नाम पर तूफान आ जाता था। और आज के समय में हमने अपने बच्चों को इतनी छूट दे रखी है ,तब भी उन्हें उन रिश्तों की क़द्र ही नहीं। रिश्तों को उपहार ,आधुनिक आवश्यकताओं से जोड़ते हैं। आजकल तो माता -पिता के सामने ही दोस्ती बनती है और टूट भी जाती है और कई बार तो माता -पिता को भी पता ही नहीं चल पाता कि दोस्ती हुई तो कितनी गहरी है ?कितनों से है ?किस हद तक है ? 

अच्छा जी चलिए ,अब इस बात को यहीं समाप्त करते हैं। आज के समय को देखते हुए ,बच्चे रिश्ते तो बनाते हैं किन्तु उनकी गहराई नहीं समझ पाते ,उनके लिए तो दोस्ती करना ,वो भी एक लड़की से ,जैसे शान की बात हो गयी। कुछ बच्चे हैं ,जो रिश्तों को लेकर गंभीर हो भी जाते हैं किन्तु वही फिर धोखा भी खा जाते हैं। कभी -कभी लगता है ,बच्चे हमसे ज्यादा समझदार और व्यवहारिक हैं ,आज के समय में किसी के पास इतना समय ही कहाँ है ?जो किसी के लिए ,घंटों बैठकर ऑंसू बहाये।'' ज़िंदगी की उलझनों को सुलझाने के लिए वक़्त से समझौता कर आगे बढ़ जाते हैं ,इसीलिए ''ब्रेकअप ''जैसी भावना पर भी वो गीत गुनगुनाते  हुए ,आगे बढ़ जाते हैं।  


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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