चंद्रिका से मिलने पारस आता है और वो उसे ये दर्शाता है ,कि उसके कारण राजकुमारी को कष्ट हुआ ,वो उसका अपराधी है किन्तु चंद्रिका ने उसकी गलती मानी ही नहीं वरन वो तो उस दुकानदार की गलती मान रही थी जिसने वो आभूषण पारस को बेचा। तभी चंद्रिका की दृष्टि अपने कमरे के आईने पर गयी तब उसने ऐसा कुछ देखा और उसकी चीख़ निकल गयी। वो अपने मन को समझा रही थी -ऐसा कैसे हो सकता है ?किन्तु वो एक राजकुमारी थी , कमजोर नहीं पड़ सकती थी। उसने धैर्य के काम लिया और अपनी आँखें बंद कर लीं।
पारस उसके समीप आया और बोला -क्या हुआ ?आप इस तरह चीख़ी क्यों ?वो चंद्रिका से एक दूरी बनाकर रखता था।
कुछ नहीं ,मुझे अचानक ऐसे लगा जैसे मैंने कोई डरावना सपना देखा हो।
क्या ?आप ,जागते हुए भी ,सपने देखती हैं ,कहकर वो हंसने लगा।
कुछ सपने ऐसे होते हैं जो हमें जगा देते हैं ,उस सपने में होने वाले अहित से बचा लेते हैं।अच्छा, ये बताओ !ये आभूषण तुम्हें किसने बेचा ?हम पिताजी महाराज से कहकर उसकी चमड़ी खिँचवा देंगे।
अब रहने भी दीजिये ,आपकी जान तो बच गयी ,यही शुक्र मनाना चाहिए।
किन्तु हम ,ये नहीं समझ पाए ,ऐसा उस आभूषण में क्या था ?जो हमारे साथ ऐसा हुआ।
मन ही मन पारस ने सोचा ,अब आई सही बात पर और बोला -मुझे तो लगता है ,ये आपका तावीज़ ही इसका कारण हो सकता है ,अब मैं असली आभूषण तो ला नहीं सकता था इसीलिए नकली ले आया। हो सकता है ,ये तावीज़ नकली आभूषणों का यही हाल करता हो।
चंद्रिका मन ही मन सोच रही थी ,नकली आभूषण ही नहीं ,ये नकली इंसानों को भी परख़ लेता है।
अच्छा ,अब मैं चलता हूँ।
अच्छा सुनो !क्या तुम ऐसा एक और कड़ा ला सकते हो ?
पारस को आश्चर्य हुआ और सोचने लगा -ये ऐसा क्यों कह रही है ?
क्यों ? राजकुमारी जी !
मैं अबकि बार इस तावीज़ को उतारकर ,उस आभूषण को पहनकर देखूंगी।
अपनी प्रसन्नता को छुपाते हुए ,पारस बोला - ये आप क्या कह रही हैं ?आप इसे भला क्यों उतारेंगी ?
क्यों ? उतार नहीं सकती ,आखिर तुम मेरे दोस्त हो ,अपने दोस्त के लिए इतना तो कर ही सकती हूँ।
जो कार्य उसकी विद्या न कर सकी ,वो कार्य उसकी छोटी सी क्षमा याचना ने कर दिया ,प्रसन्न होते हुए वो अगले दिन बग़ीचे में मिलने के लिए कहकर चला गया। तब उसने किसी दासी से पूछा -क्या अभी कोई लड़का इधर से गया ?दासी ने' नहीं 'में सर हिला दिया।
अगले दिन चंद्रिका पारस की प्रतीक्षा में ,बगीचे में टहल रही थी ,पारस आया और एक कड़ा पहले जैसा ही लेकर आया। चंद्रिका ने उसे विश्वास दिलवाया कि तावीज़ उसके हाथ में नहीं है। पारस मन ही मन प्रसन्न हुआ और उसने सोचा -बाक़ी का कार्य उसका कड़ा कर देगा। तुरंत ही वो कड़ा चंद्रिका ने पहन लिया। उसके पहनते ही चंद्रिका वहीं किसी स्थान पर बैठ गयी।
आप ठीक हैं ,चंद्रिका ने आँखें मूँद लीं ,पारस को लगा ,ये उसके उस कड़े का असर है जो वो लेकर आया है। उसे तो उम्मीद ही नहीं थी ,सब कुछ इतनी शीघ्रता से हो जायेगा। अब वो प्रसन्न था ,वो चंद्रिका का नाम फिर से पुकारता हैं। कहीं उसे भ्र्म तो नहीं हुआ। उसने अपने आस -पास देखा, किन्तु किसी का भी उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं था। उसे अपनी विद्या पर पूर्ण विश्वास था वो स्वयं भी तो अदृश्य था। तब वो अपने असली रूप में आया ,उसे यकीन था ,चंद्रिका उसका दिया कड़ा पहनकर ,उसके इशारों पर चलेगी किन्तु चंद्रिका पर तो जैसे मूर्छा सी छा गयी। ख़ैर ! जो भी हुआ ,अच्छा ही हुआ , किशोरावस्था में रहने के कारण उसकी शक्ति भी क्षीण हो गयी थी ,अब अपने असली रूप में था। फिर से उसने अपने आस -पास देखा और राजकुमारी को अपनी गोद में उठाकर आगे बढ़ जाता है। महल की आख़िरी दीवार के पास कोई उसकी प्रतीक्षा में था। तभी पारस की चीख़ पूरे शांत वातावरण को चीरती चली गयी।
पहरेदार उस चीख़ की तरफ दौड़े ,वो चीख़ बगीचे से आ रही थी। उन्होंने देखा ,राजकुमारी किसी वृद्ध के पास बैठी थी और वो तड़प रहा था ,तब तक पूरे महल में तो क्या ? महल से बाहर भी ये ख़बर आग की तरह फैल गयी। राजा साहब भी आ चुके थे और अपनी बेटी को शाबाशी दे रहे थे -हमारी बेटी बहुत ही समझदार और बहादुर है ,आज हमारी बेटी ने हमारा नाम रौशन कर दिया।
तब राजा साहब,उस वृद्ध की तरफ झुकते हुए ,उससे बोले - तुम जो कोई भी हो ,तुम्हारा हमारी बेटी की ज़िंदगी में आने का क्या उद्देश्य था ? हमारी बेटी तो तुम्हें कल ही पहचान गयी थी किन्तु उसने भी तुम्हें अच्छे से सबक़ सिखाने का निर्णय लिया था। बताओ !तुम एक वृद्ध होकर इस तरह बालक बनकर क्यों मिल रहे थे ?तुम कौन हो ?
मैं....... एक तांत्रिक हूँ..... मैं..... बरसों से...... इनकी प्रतीक्षा कर रहा था ,अब और कुछ नहीं बता पाउँगा ,अपनी अवस्था बदलने के कारण, मेरी शक्तियाँ कम हो गयीं हैं ,मेरा उद्देश्य राजकुमारी से विवाह करना था ताकि और...... शक्ति...... प्राप्त कर सकूं ,इससे पहले ही ,चंद्रिका ने उसके सीने पर अपना तावीज़ रख दिया। जिसके कारण उसके प्राण -पखेरू उड़ गए और कुछ देर पश्चात ही वो राख के ढेर में बदल गया। तब राजा को एहसास हुआ। वो सन्यासी इसी कारण ये तावीज़ चंद्रिका की सुरक्षा के लिए दे गए होंगे।
महल में चलकर ,राजा साहब आज की घटना को सोचकर ही सिंहर गए ,यदि समय रहते हमने उचित योजना न बनाई होती तो न जाने क्या होता ?ये तो अच्छा हुआ ,कल रात्रि को ही राजकुमारी ने हमसे बात की। चंद्रिका भी सोच रही थी ,जब वो उससे मिलने आया था तभी उसकी दृष्टि आईने पर पड़ी जिसमें उसे तांत्रिक का असली रूप दिख गया था ,वो चीखी भी थी किन्तु उसने बात को संभाल लिया इसी कारण से वो तांत्रिक कोई चालाकी नहीं कर पाया। जब उसने दासी से पूछा कि क्या किसी लड़के को जाते देखा है ?उसके इंकार करने पर उसे पूरा विश्वास हो गया कि कोई तो है ,जो उसे इस रूप में छल रहा है। तब पिताजी महाराज से कहकर पंडितजी को बुलवा भेजा और सम्पूर्ण जानकारी उन्हें दी।
तब उन्होंने बताया ,ये आपके पीछे कई जन्मों से है और अब इसका अंत आ रहा है किन्तु यदि ये अपनी योजना में सफल हो गया, तो ये अनंत शक्तियों का मालिक हो जायेगा। अब आप ही उसका अंत कर सकती हैं। तावीज उतारकर किसी ऐसी जगह रखना ताकि वो निश्चिन्त रहे और आप उसे पुनः उठा सकें। उसकी कोई क्रिया आप पर कार्य न करे इसके लिए आपको एक द्रव्य दे देता हूँ उसे पीने पर आप पर कोई असर नहीं होगा , किन्तु अभिनय तो ऐसा ही करना होगा ,जैसे आप उसके सम्मोहन में हो। चंद्रिका जब तो जोश में सब कर गयी किन्तु अब सोचकर ही उसे ड़र लग रहा है ,यदि वो कामयाब हो जाता तो हमारा क्या होता ?
तब तो ,उसी जन्म में ,उस तांत्रिक का अंत हो गया ,अब तो कोई परेशानी नहीं होगी मनु ने कहा।
होगी क्यों नहीं ?क्योंकि अब उसने भी तुम्हारी तरह ही ,इस पृथ्वी पर पुनः जन्म ले लिया है।
क्या.....? मनु आश्चर्यचकित होते हुए बोली।
हाँ पुत्री ! इसी कारण तो ये जंगल तुम्हें अपनी ओर आकर्षित कर रहा था ताकि जो ये तुम्हारी धरोहर है ,उसे हम तुम्हें सौंप सकें और आनेवाले खतरों से आगाह कर सकें।
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