Bevafa sanam [ part 25 ]

पारस ,चंद्रिका को अपनी बातों में उलझाकर आ गया। चंद्रिका के मन में कई प्रश्न छोड़ आया ,वो चाहता भी यही था। चंद्रिका उसके विषय में सोचे और वो उसके प्रेम में पड़ जाये या उस पर इतना  विश्वास हो जाये ,कि जब वो कुछ भी कहे ,तो उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाये। चंद्रिका काफी देर तक उसके विषय में सोचती रही ,इस लड़के को किससे  प्रेम हुआ होगा ?



अगले दिन प्रातःकाल से ही ,चंद्रिका उसके आने की प्रतीक्षा करने लगी। पिताजी महाराज ने पूछा भी, कि तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हारा दोस्त क्यों नहीं आया ? 

  चंद्रिका बताना तो  चाहती थी कि वो रात्रि में आया था किन्तु उसे लगा ,शायद पिताजी महाराज इस बात से नाराज हो सकते हैं कि वो इस महल के अंदर ,वो भी चंद्रिका के कमरे में कैसे आया ? यही सोचकर बोली - हमें  लगता है ,वो ग़रीब है ,महल में शायद कोई उसका  अपमान करे इसीलिए नहीं आया होगा। चंद्रिका सारा दिन उसकी प्रतीक्षा करती रही किन्तु वो नहीं आया। अब तो चंद्रिका को क्रोध आने लगा। अगले दिन भी एक उम्मीद के साथ चंद्रिका का दिन निकला। राजा के सिपाही भी ,राजा के आदेशानुसार सतर्क थे।

 शाम को पारस  आया ,चंद्रिका ख़ुशी से खिल उठी किन्तु उसे देखकर बुरा सा मुँह बनाकर बैठ गयी। 

अभी  तो मैंने देखा, तुम खुश थीं ,अब मुँह क्यों बना लिया ?

तुम्हें देखकर ,कल भी नहीं आये ,मैं प्रतीक्षा करती रही। 

ओह ! कल मैं किसी कार्य में  फंस गया था। 

 संदेशा भी तो भिजवा सकते थे ,चंद्रिका क्रोध करते हुए बोली। 

उसकी बात सुनकर  पारस हंसा और बोला -राजकुमारी जी !मैं कोई राजकुमार नहीं ,एक गरीब लड़का हूँ किसके हाथ संदेशा भिजवाता ?कहकर उसने भी राजकुमारी की तरफ से पीठ कर  ली। मैं तो आपके लिए , उपहार लाया था ,इसीलिए किसी साहूकार के यहाँ रात -दिन कार्य करता रहा ,तब जाकर ये उपहार ला पाया। उपहार का नाम सुनते ही ,चंद्रिका ने पलटकर देखा। पारस के हाथ में ,एक सुंदर सा हाथ में पहनने के लिए कड़ा था ,जो फूलों और नगों से सजा था। चंद्रिका उसे देखकर बहुत ही प्रसन्न हुई और पारस से पूछा -क्या ,ये तुम मेरे लिए लाये हो ?

नहीं ,यहाँ कोई और भी है जिसका परसों जन्मदिन था। उसे तब मैं कोई उपहार नहीं दे पाया किन्तु आज इतनी मेहनत से ये उपहार लाया था।अब उसे मैं ये नहीं दे पाउँगा। 

क्यों नहीं दे पाओगे ?चंद्रिका उसके सामने आकर बोली। 

क्योकि वो तो मुझसे रूठी हुई है ,और फिर इस गरीब का ये उपहार क्यों पसंद करेगी ?वो तो कीमती आभूषण पहनती है ,वो भी असली नगों से जड़े और ये मेरा उपहार नकली नगों से बना है। 

लाओ !इसे मुझे दो कहकर चंद्रिका ने ,उसके हाथ से ले लिया और अपने हाथ में पहन लिया। उसके पहनते ही उस कड़े में आग लग गयी , चंद्रिका चीखने लगी। तभी कुछ दास -दासी इकट्ठा हो गए। 

क्या हुआ ? राजकुमारी जी ! उन्हें बताने से पहले चंद्रिका ने नजरें उठकर देखा ,तो पारस वहां नहीं था। अब वो किसी से क्या कहे ? ये सब कैसे हुआ ?वो स्वयं ही नहीं जान पाई किन्तु पारस जानता था ,वो अपनी शक्तियों से उस कवच का तोड़ लाया था किन्तु हुआ ,इसके विपरीत। वो वहीँ पर खड़े -खड़े सबकी दृष्टि से ओझल हो गया किन्तु चंद्रिका के जेहन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे। ये अचानक कहाँ चला जाता है ? इसका दिया कड़ा हाथ में पहनते ही क्यों जल उठा ?

ये बात राजा साहब तक भी पहुंच गयी और उन्होंने अपनी बिटिया से इसका कारण जानना चाहा किन्तु राजकुमारी कुछ भी बताने में असमर्थ रही।

 ये बात  रानी साहिबा ने भी सुनी तब उन्होंने अपनी बेटी से प्यार से पूछा -क्या हुआ था ?क्या तुमने किसी ऐसी चीज का स्पर्श किया था  ?जो तुम्हें छूनी नहीं चाहिए थी। तुम जानती हो न...... किसी भी नकारात्मक शक्ति के छूते ही वो नष्ट हो जाएगी ,जो भी तुम्हें नुकसान पहुंचाना चाहता है ,वो भी भस्म हो जायेगा। ये सन्यासी बाबा का तुम्हे आशीर्वाद है। तब उन्होंने अपनी बेटी को समझाया -ये तावीज़ तुम्हारी सुरक्षा के लिए है , अब ये बताओ !ऐसा क्या हुआ था ?

चंद्रिका ,माँ से ज्यादा देर छुपा नहीं सकती थी ,बोली - बगीचे में एक रत्न पड़ा था ,मुझे अच्छा लगा और पहन लिया उसके पहनते ही ,मेरे हाथ में जलन होने लगी। 

नहीं ,ये जलन तुम्हारे हाथ में नहीं ,वरन उस आभूषण के जलने पर ,इसका एहसास तुम्हें भी हुआ। तभी उनकी इंद्री ने उन्हें सतर्क भी किया कि बगीचे में ऐसा आभूषण कौन ला सकता है ?ये बात महाराज से भी बताई गयी। तब महाराज को भी ,उनकी बात उचित लगी। अवश्य ही कोई तो है ,जो राजकुमारी को क्षति पहुंचाना चाहता  है। वो सोच में पड़  गए। 

राजकुमारी के उपचार के लिए ,वैद्य को बुलाया गया ,उन्होंने बताया राजकुमारी को कुछ ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है क्योंकि उसी आभूषण के भस्म होने के कारण ही ,थोड़ी जलन है। 

एकांत में चंद्रिका सोच में पड़ गयी ,पारस मेरे लिए ऐसा आभूषण क्यों लायेगा ?अवश्य ही उससे कोई त्रुटि हुई है। वो अभी भी उसकी प्रतीक्षा कर रही थी।शाम का धूंधलका था ,दिन अभी पूरी तरह छिपा नहीं था। आकाश में सूर्य देव तो विश्राम के लिए जा चुके थे किन्तु चंद्रदेव के आने में अभी समय था। दूर क्षितिज में उनका प्रतिबिम्ब नजर आ रहा था जिसमें अभी चमक नहीं थी। चंद्रिका अपने  झरोखे से बाहर देख रही थी। तभी अचानक उसे अपने पीछे किसी का एहसास हुआ।



चंद्रिका ने तुरंत  पीछे घूमकर देखा ,पारस ही था। तुम कौन हो ?क्या कोई जादूगर ?या फिर गरीब लड़के !

मैं न ही जादूगर हूँ ,न ही कोई गरीब ,इस समय मैं आपका अपराधी हूँ  ,जिसके कारण आपको कष्ट झेलना पड़ा। कहकर उसने अपनी गर्दन झुका ली। 

चंद्रिका को उस पर दया आई और बोली - गलती तुम्हारी नहीं ,उस दुकानदार की है जिसने भी ऐसा आभूषण बनाया ,कहते हुए उसे क्रोध आया और बोली -तुम हमें उसका नाम पता बता दो ,बाक़ी हम  देख लेंगे।    


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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