Bevafa sanam [part 35]

गाड़ी अपनी तेज गति से ,अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी। गाड़ी खड्डों से होती हुई ,सड़क पर कभी कच्चे रास्ते से घूमती हुयी ,  जाती है। सभी दोस्त   देख रहे थे ,कि हम कहाँ जा रहे हैं ?किन्तु   साफ -सुथरी सड़क उन्हें दिखलाई पड़ती है। उन्हें आश्चर्य  होता है यहाँ ऐसा भी कुछ हो सकता है।

 ये हम कहाँ जा रहे हैं ?बाहर की तरफ आँखे फाड़कर देखते हुए ,तन्मय पूछता है।

 चुप बैठे रहो ! उस व्यक्ति  ने डपटते हुए कहा। 


हम तो जब से चुप ही बैठे थे किन्तु ये स्थान बिल्कुल ही अनजाना लग रहा है ,सबसे बड़ी बात ,जिस स्थान को हम जंगल सोचकर ही यहाँ आये थे ,वहाँ ऐसा भी कुछ हो सकता है ,विश्वास नहीं होता। 

यहाँ पर बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो तुम पहली बार देखोगे ,उसने डींगे मारते हुए कहा। 

हाँ ,हाँ वही तो हम जानना चाहते हैं। 

अभी स्थानों का नाम या नंबर नहीं है ,इनका रास्ता भी अलग है। 

यानि उन गाँवों की तरफ से ,ये रास्ता नहीं जायेगा। 

कोई मतलब ही नहीं  उठता , उस तरफ तो दीवार होगी। 

अच्छा एक बात बताओ !ये जो बात सुनने में आती है कि इस तरफ कोई आया वापस नहीं जाता या जिन्दा नहीं बचता। इस बात में कितनी सच्चाई है ?

उस व्यक्ति ने उन्हें घूरकर देखा और पूछा -तुम लोग कौन हो ?और यहाँ क्यों आये हो ?

हम तो साधारण छात्र हैं ,किन्तु घूमने के उद्देश्य  से  यहाँ  आ गए।अच्छा !ये बताओ !तुम हमें कहाँ लेजाकर छोड़ोगे ?इतना तो बता ही सकते हो। 

मुझे तो बस ,वो दूर....  सामने  जो जगह दिख रही है ,वहीं जाकर छोड़ना है ,आगे तुम जानो फिर वहीं एक आदमी मिलेगा आगे वो ले जायेगा। 

ठीक है ,कहकर सब शांत बैठ गए ,अचानक रोहित उठा और उस ड्राइवर का गला दबाने लगा ,गाड़ी भी डगमगाने लगी। 

छोडो !इसे ,ये क्या कर रहे हो ? श्याम चिल्लाया ,इस तरह तो दुर्घटना हो सकती है। 

यही तो मैं चाहता हूँ ,हमारे पास यहाँ से भागने का यही समय है ,वहां पता नहीं ,कितने लोग हैं ?जो हमारी प्रतीक्षा में हैं। हमारे साथ दो लड़कियां हैं ,पता नहीं ,उनके साथ कैसा व्यवहार करें ?इसीलिए इसको यहीं बेहोश कर हमें भागना होगा। 

सही तो कह रहा है ,इसको ऐसे नहीं ,इस तरह बेहोश करो कहकर तन्मय ने अपना  हाथ उसे बेहोश करने के लिए उठाया ही था। 

तभी उस  ड्राइवर ने कुछ कहने का प्रयत्न किया ,किन्तु उन्होंने उस ओर ध्यान नहीं दिया। 

आख़िरी उम्मीद से वो वाहन चालक आखिरी बार जोर लगाकर बोला -तुम्हारी दोस्त भी वहीं है। 

इतना सुनते ही ,रोहित की पकड़ उसके गले से ढीली पड़ गयी  और बोला -तुम कैसे जानते हो ?तुम्हें कैसे मालूम ? वो हमारी ही दोस्त है। 

तुम्हारी ही दोस्त होगी ,वो दो दिनों से हमारे बॉस की कैद में थी। वो कार्ड्स देखती है ,न.... 

उसने उनके अविश्वास को विश्वास में बदलने के लिए बताया ,अब तो उन लोगों को उसकी बातों पर  विश्वास करना पड़ा। 

क्या नाम है उसका ?

ये तो नहीं मालूम ,किन्तु मैं ही आज उस लड़की को लेकर आया ,बेचारी बहुत अच्छी है ,चुपचाप तैयार हो गयी। 

अब तो वे सभी शांत होकर बैठ गए ,जो होगा देखा जायेगा समय पर सब छोड़ दिया। 

सभी उस गाड़ी से उतरे और एक व्यक्ति उन्हें लेने आया और उन्हें लेकर वो आगे बढ़ा और नीचे की तरफ घूमती हुई सीढ़ियों से नीचे ले गया वहाँ तो जैसे किसी भव्य समारोह का आयोजन किया गया था। वो लोग नजरें चुराते हुए से आगे बढ़े ,उन्हें लेजाकर एक कमरे में बिठा दिए गए। जब वो व्यक्ति जाने लगा तब श्याम ने उससे पूछा -क्या यहां हमसे भीअलग  कोई लड़की  है ? 

वो घूमा और बोला -जी... किन्तु हमें बताने की कोई इजाजत नहीं है। 

वो हमारी ही दोस्त है ,हमसे बिछुड़ गयी थी।

 जी.... किन्तु बिना साहब की इजाजत के हम कुछ नहीं कह सकते ,न ही कर सकते। 

तुम्हारा साहब ,यानि बॉस कौन है ?हमें उससे मिलना है। 

वो मुस्कुराया और बोला -वो किसी से नहीं मिलते ,आज तक तो हमने भी उन्हें नहीं देखा। 

फिर वो किससे मिलता है ,कैसे ,अपनी बात तुम लोगों तक पहुंचाता है ?

हमें तो हमसे ऊपर जो कार्य करते हैं ,वो ही समझाते हैं ,हम तो उनके अनुसार ही कार्य करते हैं। अब मैं चलता हूँ ,हमें इतनी देर तक बात करने की भी इजाजत नहीं है। 


यहाँ आकर कैसे फंस गए ?अब चारु को कहाँ ढूंढें ? ये जगह भी न देखो ! कैसी बनी है ?क्या तुम जानते हो ?ये इमारत ऊपर से ज्यादा नीचे बनी है। ये बॉस पता नहीं ,क्या चाहता  है ?

कुछ देर पश्चात ,उन दोनों लड़कियों को बुलाया जाता है किन्तु उनके साथ वो तीनों भी जाते हैं। वो उन तीनो को मना करता है किन्तु तन्मय ,रोहित और श्याम भी साथ ही चलते हैं। वे लोग एक बड़े हॉल जैसे स्थान में पहुंचते हैं। वहीं उन्हें चारु भी दिख जाती है ,वो सीधे पहले चारु के समीप जाने का प्रयत्न किन्तु एक तगड़ा सा आदमी आगे आकर रोक देता है। वे लोग हाथ के इशारे से चारु को अपनी उपस्थिति बतलाते हैं।

उन पांचों को लग रहा था ,जैसे कोई उन्हें घूर रहा है। इतने सारे लोगों में ,वे तीन लड़कियां ही दिख  रही थीं। तन्मय तो आश्चर्य से बोला -दिन में तो कोई नहीं दिख रहा था ,अब इस समय इतने लोग कहाँ से आ गए ?उस समय तो उनके आश्चर्य की सीमा न रही। चारु !जो कुछ देर पहले उनसे डरी सहमी  सी लग रही थी ,वो अचानक बेहद उम्दा वस्त्रों में ,एक' मास्क 'पहने आदमी के साथ खड़ी दिखाई दे रही थी ।  

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post