कीर्ति को वो आदमी ,एक कमरे में बंद कर चला गया। कीर्ति उसके कहने पर ,उसकी बातों का अर्थ निका लने का प्रयत्न कर रही थी।वैसे तो उसने 'जुडो' सीखा हुआ है और आज उसकी परीक्षा का समय है किन्तु वो बिना सोचे -समझे परीक्षा देने के लिए तैयार नहीं है।जब बुद्धि से सरलता और समझदारी से कार्य हो सकता है। तब हाथ -पैर चलाने की क्या आवश्यकता ? उसने कमरे का मुआयना किया ,उसमें कुछ विशेष नहीं था। दो कुर्सियां और पानी पीने के लिए ,एक मटका था। कोने में एक पलंग भी पड़ा था। दाईं तरफ़ एक खिड़की थी। वो दौड़कर उस खिड़की तरफ जाती है। खिड़की से देखने पर पता चलता है कि उस इमारत के दूसरी तरफ एक मैदान है। उसे देखकर लगता है ,ये स्थान देखा हुआ नहीं है ,यहाँ तो इससे पहले नहीं आई ,ये जगह भी न कितनी बड़ी है ?आदमी इस भूल -भूलैया में खो जाये। तब वो दरवाजे की तरफ गयी ,कि कहीं खुल जाये तो वो बाहर निकल सके किन्तु वो बाहर से बंद था। उदास हो ,वापस खिड़की में आ गयी।एक उम्मीद से...... ताकि उसके दोस्तों में से ही कोई दिख जाये।
मनु ,श्याम ,रोहित और तन्मय कीर्ति की तलाश में ,भटक रहे थे। मनु ने एकांत देख अपनी अंगुली की अंगूठी को घुमाया ,उसमें से एक तेज़ चमक निकली जो एक किरण के रूप में बदल गयी। वो जानती थी ,ये उसके पिछले जन्म के माता -पिता ही, उसकी किसी न किसी तरह सहायता कर रहे हैं। अभी तक तो वो स्वयं ही सब संभाल रही है ,आवश्यकता पड़ने पर वे स्वयं भी आ सकते हैं। मनु उस किरण के पीछे -पीछे चल दी।
तन्मय ने देखा और पूछा भी ,कहाँ जा रही हो ?
सोच रही हूँ ,इधर हम लोग नहीं गए ,इधर जाकर देखते हैं।
नहीं ,वो यहाँ कैसे आई होगी ?हम उसी दीवार के आस -पास जाकर देखते हैं ,यदि वो सही सलामत है ,तो अवश्य ही उसी के आस -पास होगी।
ये तुम क्या कह रहे हो ? वो वहां कैसे हो सकती है ?वो तो पहले से ही डरी हुई होगी ,तब वो उस स्थान पर कैसे रुक सकती है ?
हाँ ,ये बात भी सही है ,चलो ! मैं भी तुम्हारे संग ही चलता हूँ।
पहले तुम उन दोनों को भी बुला लाओ ! तभी एक साथ ही चलते हैं। वो किरण आगे बढ़ती जा रही थी किन्तु तन्मय उसे नहीं देख पाया। तुम उन्हें साथ लेकर मेरे पीछे आओ !
तन्मय ,श्याम और रोहित को लेकर आता है ,तब तक मनु काफी आगे निकल गयी थी। ये लड़की भी न.... अपनी चलाती है ,देखो ! हमसे पहले ही कितनी आगे निकल गयी, श्याम कुढ़ते हुए बोला। अब वो अपने घर जाना चाहता था। उसे इस रहस्य को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं रह गयी थी। पहले चम्पा और अब ये कीर्ति !वो अपने घर की आराम की ज़िंदगी के लिए तरस रहा था। किन्तु वो स्वयं ही नहीं जानता ,कि इस वक्त कहाँ है ? कैसे वो लोग बाहर निकलेंगे ?
किरण के पीछे -पीछे मनु चले जा रही थी ,तब रोहित ने नोटिस किया ,ये किसी का पीछा कर रही है ,इस तरह तो कोई राह दिखा रहा हो तभी चलते हैं। वो उसके करीब आया और बोला -क्या तुम्हें कुछ दिख रहा है।
नहीं तो ,कहते हुए चलती रही ,उसे डर था , कहीं वो भटक न जाये इसीलिए उससे नजर नहीं हटा रही थी ,रोहित ने भी उसकी नज़रों का पीछा किया किन्तु एक किरण के सिवा उसे कुछ नहीं दिखा। उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई किरण इस तरह राह भी दिखा सकती है। वो तो ये सोच रहा था ,किसी चमकीली चीज पर रौशनी पड़ने के कारण वो दिख रही होगी। उन्हें चलते हुए ,लगभग आधा घंटा हो गया तब जाकर एक खुले मैदान में आकर रुके।
ये क्या ? यहाँ तो कुछ भी नहीं है ,तीनो एक साथ बोले। मनु ने भी एक गहरी साँस ली और इधर -उधर देखा ,उस मैदान के एक तरफ दीवार थी ,दूसरी तरफ एक कमरे की खिड़की उन्हें नजर आई।
यहाँ तो कुछ भी ऐसा नहीं है ,जो हमें कीर्ति के होने का एहसास हो ,श्याम झल्लाकर बोला।
अब मनु को भी अपनी गलती का एहसास हो रहा था ,शायद ,उसने इन्हें यहां लेकर कोई गलती कर दी हो।किन्तु जो भी उसे संकेत दिया गया वो झूठ तो नहीं हो सकता। फिर इसका क्या राज है ?मनु ने खिड़की की तरफ देखा ,उसे तो जैसे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ और वो चिल्ला दी -वो देखो !अपनी अंगुली के इशारे से उन्हें दिखाया। कीर्ति !
सभी ने उसकी अंगुली का अनुसरण किया ,देखा कीर्ति उस खिड़की के पास आई है किन्तु उन उन्हें नहीं देखा। सभी ने एक साथ आवाज लगाई -कीर्ति...... !
अबकी बार कीर्ति को लगा जैसे किसी ने उसे पुकारा ,वो वापस खिड़की की तरफ लौटी और बाहर झाँका।अपने दोस्तों को देखकर वो बहुत प्रसन्न हुई और हाथ के इशारे से उन्हें बताया कि वो यहाँ है ,और उसे बाहर निकालें। वो खिड़की ऊंचाई पर थी ,उस स्थान से देखने पर लग रहा था जैसे कीर्ति किसी दोमंजिले मकान में बंद है। उसके एक तरफ दीवार थी ,वो लोग उस इमारत के पीछे गए किन्तु आगे जाने का रास्ता समझ नहीं आया कि किस तरह आगे जाकर कीर्ति को छुड़ाया जाये ?पहले तो सबने मिलकर तय किया कि पीछे के पाइप से चढ़कर ,छत पर जाकर उससे नीचे कूदकर ,दरवाजा खोला जाये। तब ये बात किसी को भी ठीक नहीं लगी क्योकि कीर्ति वापस कैसे आएगी ? तब वो उस दीवार के सहारे आगे बढ़ते गए कि कहीं तो कुछ 'क्लू 'मिले ताकि इसके अंदर जा सकें।
तब मनु ने देखा ,उसी दीवार में एक जगह से कुछ ईंटें हटाकर ,एक बड़ा सा 'होल 'बनाया हुआ है।तब मनु ने तरकीब सुझाई इस रास्ते से पार जा सकते हैं।
तब सभी ने निर्णय लिया ,पहले एक उस तरफ जायेगा उसके पश्चात ,वो इशारा करेगा और बारी -बारी से सभी निकलेंगे। तब सबसे पहले रोहित उस तरफ गया। रास्ता साफ देखकर ,उसने कहा -तुम लोग नाहक़ ही परेशान हो रहे हो ,मैं ही जाकर उसे ले आता हूँ तुम लोग यहीं पर मेरी प्रतीक्षा करो।
तन्मय बोला -मैं भी आता हूँ।
नहीं ,मैं संभाल लूंगा कहकर वो चला गया। उसे गए ,जब आधा घंटा हो गया उधर से कोई भी नहीं आया ,न ही कीर्ति ,न ही रोहित तब तन्मय बोला -मैंने पहले ही कहा था ,एक से भले दो। मैं जाता हूँ और उसे लेकर आता हूँ।
अभी तुमने ही कहा -एक से भले दो ,अबकि बार मैं भी चलूँगा किन्तु तुम्हारे संग नहीं तुमसे पीछे रहूंगा।
मैं ही अकेली यहाँ क्या करूंगी ?मैं भी चलती हूँ ,अकेली तो और भी ज्यादा परेशान हो जाउंगी कहकर मनु भी साथ हो ली।
तन्मय आगे चल रहा था ,आगे जाकर उसे एक इमारत दिखी ,बाहर एक सिपाही था। रोहित तो कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा था। इस तरह अकेला इधर से निकलेगा तो अवश्य ही उस गार्ड की नजर में आ जायेगा ,अब वो क्या करे ?यही सोच रहा था। एक खम्बे के पीछे श्याम और मनु भी खड़े थे। तब तन्मय को एक तरक़ीब सूझी

