Jadui patthar

नमस्कार बहनों और दोस्तों  ! रास्ते का पत्थर  ,मील का पत्थर ,और तो और अक्ल पर पत्थर पड़ना ,दिल पर पत्थर रखना जैसे पत्थरों पर मुहावरे भी बने हैं। रास्ते और मील के पत्थर की तरह ही एक पत्थर और भी है ,वो है ,''जादुई पत्थर ''


 क्या किसी ने वो पत्थर देखा है ? हाँ ,सुना अवश्य है ,दादी माँ की कहानियों में या फिर'' पारस पत्थर'' जि सके छूते  ही कोई भी चीज सोना बन जाती थी। वैसे हमने तो वो पत्थर भी नहीं देखा ,बस सुना है। यहाँ बात आती है ,''जादुई पत्थर ''की ,काश !की कोई ऐसा जादुई पत्थर होता ,जिसके छूते  ही ,'हम असीमित शक्तियों के मालिक बन सकते। किसी दूसरे लोक का भृमण कर पाते। ऐसा पत्थर जिसकी जो भी  इच्छा होती ,पूर्ण कर देता। उसी पत्थर में हम भगवान को खोजते हैं ,क्या वो सबको मिल पाता है ?किन्तु फिर भी हम उसे पूजते हैं।

काश !कि हमें कोई ऐसी वस्तु मिल जाये जो हमारी इच्छाओं को पूर्ण करे ,नंदिता बोली। 

ऐसी चीजें हमारे आस -पास ही होती हैं ,ऐसे बहुत से चमत्कार हमारी ज़िंदगी में होते रहते हैं इसी के ऊपर एक कहानी सुनाती हूँ -ऐसा जादुई पत्थर कहाँ है ? जो मेरी तमन्नाओं को पूर्ण करे ,मेरी गरीबी को दूर करे। यही सोचते वो ,घर से बाहर आ गया। उसे अपनी ज़िंदगी पर क्रोध तो था ही ,बस चलता चला गया। राह में थककर ,एक पेड़ की छाँव में बैठ गया। तभी उसकी दृष्टि एक पत्थर पर गयी ,उसे कुछ देर यूँ ही निहारता रहा ,न जाने उसे क्या सूझा ?उस पर एक आकृति उकेर दी ,अपनी कलाकृति को देखकर , उसके मन को थोड़ी तसल्ली हुई और वो चला गया। तभी एक व्यक्ति आया जो बेरोजगार था, किन्तु था वो भी ,'कलाकार' उसने जब उस पत्थर पर उस कलाकृति को देखा ,उसे अच्छी लगी और उसे अपने छैनी -हथौड़े से तराश दिया। ख़ाली था ,कोई विशेष कार्य भी नहीं था ,उस पर अच्छी मेहनत की और एक सुंदर आकृति उभर कर आई। अपनी कला से संतुष्ट होकर ,काम की तलाश में वो ,तो आगे बढ़ गया। कुछ समय पश्चात ,एक व्यक्ति वहां से गुजरा ,वो धार्मिक था ,उस मूर्ति में उसे अपने प्रभु दिखलाई दिए और उसने बड़े प्रेम से उस मूर्ति पर फूल और फ़ल चढ़ा दिए। 

एक अन्य व्यक्ति ने देखा ,तो उसने कुछ पैसे भी चढ़ा दिए ,धीरे -धीरे लोगों को पता चलने लगा- कि उस पेड़ के नीचे अचानक ही ,न जाने कहाँ से एक मूर्ति आ गयी है ?वो बहुत ही चमत्कारी है ,सबकी मनोकामना पूर्ण होती है। ऐसी सूचना फैलते ही लोगों का ताँता लग गया। अब तो पूजा -पाठ कराने और पुजापे का सामान का ध्यान रखने और उस मूर्ति की सेवा के लिए वहां एक पुजारी भी आ गया ,चढ़ावा भी खूब आने लगा और धीरे -धीरे उस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण होने लगा। कुछ दिनों पश्चात ,वो ही व्यक्ति  उधर से निकला  और उस मंदिर में अपनी बनाई मूर्ति की पूजा होते देख ,उसे  बहुत आश्चर्य हुआ। उसने पंडित जी से पूछा। 

तब पंडित जी ने बताया ,ये मूर्ति बड़ी चमत्कारी है , न जाने कहाँ से प्रकट हो गयी ?

तब उस व्यक्ति ने बताया ,ये मूर्ति तो मैंने ही तो बनाई है ,एक कलाकृति देखकर उसे सांचे में ढाल दिया। इसमें इसका चमत्कार क्या है ?ये तो पेड़ के नीचे पड़ा ,एक पत्थर था। 

तब उन पंडितजी ने बताया ,यही तो इस पत्थर का चमत्कार  है ,तुम परेशान थे ,फिर भी इसने तुम्हें उसे मूर्ति के रूप में ढालने पर मजबूर कर दिया।जिससे तुम्हारी परेशानी कुछ कम हुई ,धन्यवाद ! उस व्यक्ति का ,जिसे इसमें भगवान दिखलाई दिए और उसने पूजा की। धन्यवाद !उस व्यक्ति का ,जिसने अपने धन से इस मंदिर का निर्माण करने की सोची। मुझे भी इनकी सेवा करने का मौका मिला। और अब तुम्हें भी इस मंदिर की अन्य मूर्तियों  को  बनाने का काम मिल गया। उसकी लीला अपरम्पार है ,ये उसी'' जादुई पत्थर'' का चमत्कार ही तो है। जिसने किसी को उस पर आकृति उकेरने पर मजबूर कर दिया ,तुमने  उस आकृति को नया रूप दिया। इसी के जादू ने ,अपनी पूजा पर बल दिया ,उसे प्रभु दिखे।  भगवान पत्थर में नहीं भक्त की भावनाओं में ,उसके विश्वास और श्रद्धा में विराजमान होते हैं। और इसी के जादू से आज एक मंदिर का निर्माण हुआ लोग इसके दर्शन करने आते हैं और अपनी इच्छाएँ पूर्ण करने के लिए ,आज इसी पत्थर के चरणों में माथा टेकते हैं। लोगों की भावनाओं ,उनके विश्वास उनकी श्रद्धा ने इसे चमत्कारी बना दिया।

हम जैसे बेरोजगारों को कार्य मिल गया ,वो सब सोचे बैठा है ,किसको किस समय पर क्या और कैसे मिलना है ?उसका जादू किस रूप में होता है ?आज तक कोई नहीं समझ पाया कहकर पल्ल्वी चुप हो गयी। 

बहुत अच्छी कहानी सुनाई आपने ,हम तो जैसे इसके जादू में खो गए। यही तो जादू है ,जो अपने आप को भुला ,नई दुनिया के दर्शन  करा दे। आपकी कहानी सुनकर लगा जैसे कोई न कोई तो है ,जो हमें चला रहा है ,समय पर समय पर साथ  भी देता है और परीक्षा भी लेता है। किन्तु उन चमत्कारों को हम समझ नहीं पाते और  किसी अलग ही चमत्कार की कल्पना कर बैठते हैं। चमत्कार तो वो करता है ,कभी पत्थर द्वारा ,कभी सेवा द्वारा , कभी अनजान राही बनकर ,कभी दोस्त बनकर और कभी -कभी तो दुश्मनी निभाकर भी चमत्कार कर जाता है जो हमारी समझ से परे है।अब यहीं पर अपनी जादुई दुनिया की नोकझोंक को पूर्ण करते हैं ,फिर मिलेंगे ,धन्यवाद ! 

    

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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