Bevafa sanam [part 23]

मनु का जन्म ,किसी रियासत  की राजकुमारी के रूप में होता है ,जिसका ,तांत्रिक वर्षों से प्रतीक्षा कर रहा था। तभी एक सन्यासी ने आकर उस राजकुमारी को एक सुरक्षा कवच दिया और कुछ हिदायतें भी दीं । सन्यासी तो चला गया किन्तु तांत्रिक राजकुमारी को खोजते हुए ,उन्हीं की रियासत में पहुंच गया। राजकुमारी तब तेरह -चौदह बरस की रही होगी। तांत्रिक , उसकी तीन जन्मों से प्रतीक्षा कर रहा था। वो मनु का तीसरा जन्म था अभी वो बच्ची ही थी किन्तु तांत्रिक अपनी उम्र के आख़िरी पड़ाव पर था किन्तु उसमें असीम शक्तियां थीं उन्हीं शक्तियों से उसने अपनी उम्र को रोका हुआ था। राजकुमारी को देखकर ,वो परेशान हो उठा ,वो अभी राजकुमारी के बड़े   होने की प्रतीक्षा नहीं कर सकता था। अब उसने फिर से अपनी शक्तियों का प्रयोग किया और वो अपनी उम्र से बहुत  छोटा हो गया। 


मेरा नाम 'पारस ' है ,तुम्हारा !

मेरा नाम चंद्रिका है , तुम कहाँ रहते हो ?

मैं इसी रियासत में ही रहता हूँ किन्तु मेरे पिता गरीब हैं।

तुम कहाँ रहती हो ?

ये रियासत मेरे पिता की ही है। 

ओह..... ! कहकर पारस चल देता है। 

सुनो !तुम कहाँ जा रहे हो ? मेरे साथ नहीं खेलोगे। 

तुम राजकुमारी और मैं ग़रीब लड़का ,तुम्हारे पहरेदारों ने देख लिया तो मुझे मारेंगे या भगा देंगे। 

कोई नहीं ,भगायेगा ,आओ !छुपी -छुपाई खेलते हैं ,इसी कारण से मेरा कोई दोस्त नहीं बनता और न ही मेरे साथ कोई खेलता है। 

ठीक है ,मैं तुम्हारा दोस्त बनूँगा किन्तु मेरे बारे में, किसी को भी पता नहीं चलना चाहिए। 

ठीक है ,कहकर पारस और चंद्रिका दोनों साथ -साथ खेलते हैं , उनको मिलते हुए ,एक बरस हो गया एक दिन पारस  जैसे ही उसके नज़दीक आता है ,तभी उसे एक झटका सा  लगता है ,तब वो चंद्रिका से अगले दिन मिलने के लिए कहकर चला जाता है।

तब वो अपने असली रूप में आकर ,ध्यान लगाता है ,तब उसे पता चल जाता है कि  चंद्रिका के हाथ में सन्यासी का दिया तावीज़ दिख जाता है। अगले दिन वो चंद्रिका से उस तावीज़ के विषय में पूछता है। तब चंद्रिका उसे सब बताती है। 

क्या तुम मुझे अपना सबसे अच्छा दोस्त मानती हो ?उसने प्रश्न किया। 

हाँ...... 

तब तुम अपना ये तावीज़ उतार दो। 

इसे ऐसे ही रहने दो ,क्या फ़र्क पड़ता है ?पिताजी महाराज को पता चल गया तो...... नाराज़ होंगे। पारस  कुछ नहीं कह सका ,वो अधिक से अधिक समय चंद्रिका के साथ रहना चाहता था और अपने सम्मोहन में बांध लेना चाहता था ,वैसे तो वो अपनी विद्या द्वारा भी उसे अपने वशीभूत कर सकता था किन्तु उस तावीज़ के रहते ,उस पर कोई विद्या असर नहीं कर रही थी। अब राजकुमारी बहुत खुश रहती  ,ये बात राजा साहब से भी नहीं छुपी। 

आज तो हमारी बिटिया बहुत खुश है , क्या कोई दोस्त बना ?उन्होंने इतने प्यार से पूछा ,चंद्रिका ने महाराज को सब बता दिया। पारस से किया ,वायदा भी भूल गयी। 

हाँ पिता जी महाराज ! एक दोस्त मिला है किन्तु वो गरीब है ,वो तो आपसे ड़र रहा था किन्तु हमने उसे समझाया -ऐसा कुछ भी नहीं है। 

ठीक  है ,कहकर महाराज ने पहरेदार से कह दिया हमारी राजकुमारी के साथ जो भी बच्चा खेलने आये ,उसे आने देना। 

किन्तु महाराज ,उन सन्यासी का कथन....... 

हमें सब स्मरण है किन्तु वो एक बच्चा है। 

जी महाराज ! कहकर वो तो चला गया किन्तु महाराज कुछ सोचने पर मज़बूर हो गए और दासी को बुलाया। 

जी महाराज ! 

जब कोई चंद्रिका से मिलने आता है खेलता है , तुम हमारी बेटी का ख़्याल रखना किन्तु दूर से ही ,चंद्रिका को पता नहीं चलना चाहिए कि उनके पिता महाराज ने समझाते हुए कहा।  

जी महाराज ! कहकर दासी चली जाती है ,कुछ देर पश्चात ,अचंभित सी वापस आती है। महाराज ! ऐसा लगता है -राजकुमारी जी ,किसी के साथ खेल रही हैं किन्तु जिसके साथ खेल रही हैं ,वो नहीं दिख रहा या फिर उनकी मानसिक हालत सही नहीं है। 

ये सब तुम ,क्या कह रही हो ? ऐसा कैसे हो सकता है ?राजकुमारी तो बहुत  दिनों से उसके संग खेल रही है ,चलो ! हम तुम्हारे संग चलते हैं। बगीचे में ,राजकुमारी खेल रही थी किन्तु किसके साथ ? कोई नहीं दिख रहा था। महाराज ने  चंद्रिका को बुलाया और बोले -पुत्री क्या तुम्हारा मित्र चला गया ? राजकुमारी ने अपने होठों पर अँगुली रखते हुए कहा -श....... श...... पिताजी महाराज !वो सुन लेगा। उसने हमसे वायदा लिया था कि हम किसी को भी उसके विषय में नहीं बतायेंगे वरना वो चला जायेगा।

किन्तु पुत्री ,आप किसके साथ खेल रहीं हैं ?हमें तो कोई नहीं दिख रहा। तब तक पारस ने भी महाराज को देख लिया था और वो चंद्रिका की नजरों से भी गायब हो गया। 

पिताजी महाराज हमने आपसे पहले ही बता दिया था कि वो आपसे घबराता है ,शायद चला गया। 

नहीं  पुत्री ! हम तो उसे उपहार देंगे जो हमारी पुत्री का दोस्त है ,कल उसे लेकर हमारे समीप आना कहकर महाराज चले गए और सोचने लगे  -ऐसा कैसे हो सकता है ?वो हमे न ही आते हुए दिखा ,न ही जाते हुए। शायद कुछ गलत तो नहीं हो रहा ,सोचकर उन्होंने पहरेदार को सचेत रहने के लिए कहा।



 

अगले दिन ,सम्पूर्ण महल में ,बहुत सारी तैयारियाँ हो रही थीं क्योकि आज राजकुमारी के जन्म की सौलहवीं वर्ष गांठ है। पिताजी महाराज ने चंद्रिका से अपने उस दोस्त को भी बुलवाने के लिए कहा किन्तु चंद्रिका तो जानती ही नहीं थी कि वो कहाँ रहता है ?

कोई बात नहीं ,जब भी वो आये तब उसे हमारे पास ले आना। चंद्रिका सारा दिन उसकी प्रतीक्षा करती रही किन्तु वो नहीं आया। सभी मेहमान आये और राजकुमारी को उनके जन्मदिन पर बधाई दी किन्तु राजकुमारी खुश नहीं थी क्योकि उसका दोस्त नहीं आया था। राजकुमारी आज उसे अपने पिताजी महाराज से मिलाना था पता नहीं क्यों नहीं आया ? 

 




 


 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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