Asi bhi zindgi [part 47 ]

नया घर ,नया वातावरण ,नई जगह सब कुछ तो अच्छा लग रहा है किसी की टोका -टाकी भी नहीं ,अपनी  दोनों बच्चियों के साथ नीलिमा प्रसन्न थी। सारा दिन तो सामान लगाने और सजाने में चला गया। शाम तक थककर चूर हो गयी थी। आज तो धीरेन्द्र भी प्रसन्न है ,बाहर से ही ,अपना पीने का साधन लेकर आया था। साथ में मछली के कोफ़्ते भी। अब तो किसी की रोक -टोक नहीं ,कौन रोकेगा ?नीलिमा तो पहले से ही जानती है ,धीरेन्द्र ने तो कई बार ,चादरें गंदी की हैं ,नीलिमा ने ही तो उसे संभाला है। मन किया ,नीलिमा को भी थोड़ी सी पिलाई जाये ,सोचकर तो वो घर में इसलिए घुसा था और नीलिमा को अपने पास बुलाया किन्तु नीलिमा ने इंकार कर दिया। तुम्हें जो भी जितनी भी ,पीनी है ,अलग कमरे में पी सकते हो ,मेरी बेटियों को पता न चले। 


बड़ी आई ,बेटी वाली सारा मूड़ खराब कर दिया किन्तु मन ही मन बुदबुदाकर रह गया किन्तु नीलिमा के साथ रात जरूर रंगीन हो गयी। बैंगनी रंग के  बारीक़ वस्त्रों में नीलिमा ने शाम बना दी। उसे आज अपनी बेहद खूबसूरत शाम लग रही थी। सच में ,ज़िंदगी में ऐसा सुकून भी मिल  सकता है ,ये तो उन दोनों ने सोचा ही नहीं था। अगले दिन अपनी शाम को और भी खूबसूरत बनाने के  लिए ,धीरेन्द्र दोस्तों को भी ले आया। चिकन की खूब दावत हुई ,नए घर में आने की दावत थी। भाभीजी ,यानि नीलिमा भी बहुत प्रसन्न थी। दोस्तों की बीवियां भी आईं थी किन्तु नीलिमा का रहन -सहन देखकर उससे चिढ़ गयीं। नीलिमा अपनी ख़ुशी में इतना भी अंतर् नहीं कर पाई और न ही उन लोगों की फ़ितरत ही समझ पाई। पहले तो पिता की छत्रछाया में रही उसके पश्चा त ,सास -ससुर के साथ ,वो ये नहीं जान पाई कि इन लोगों के साथ रहकर ,उन लोगों के कुछ भी न कर पाने के बावज़ूद ,बाहरी हवाओं के तेज़ झोंकों से बची हुई थी। उसने तो अब तक ,सैर -सपाटा और व्यय करना ही सीखा है। जिसे वो ज़िंदगी की सरलता समझ बैठी , किन्तु आज वो अपने बड़ों की  छत्रछाया से बाहर निकल कर खुले मैदान में आ गयी है। 

उसका समाज से और समाज के लोगों से तो अब वास्ता पड़ने वाला है ,उनकी सोच ,उनके रहन सहन क़ायदे -कानूनों का तो ,अब उसकी ज़िंदगी पर असर पड़ने वाला है। दुनियादारी समझना अभी बाक़ी था ,जिससे अभी वो वाकिफ़ नहीं थी ,अपने जैसा ही सबको समझती थी ,इस नई दुनिया में आज वो बहुत खुश थी किन्तु ये दुनिया इतनी सरल भी नहीं ,जितना हम समझ लेते हैं , किन्तु जब खुशियां दिखलाई पड़ती हैं तो हम कुछ नकारात्मकता को देखकर भी नजरअंदाज कर जाते हैं। हम अपनी खुशियों में बाधा डालना नहीं चाहते।हर सिक्के के दो पहलू होते हैं ,एक पहलू को हम देखते  हैं ,जो हमे दिखलाई पड़  रहा है ,उसी पर ध्यान केंद्रित कर लेते हैं। किन्तु उसके दूसरे पहलू को देखना भी नहीं चाहते। इसी तरह आज भी धीरेन्द्र के  नए घर में आने की दावत है ,उसके पश्चात सभी चले जाते हैं। ये दोनों अपनी खुशियों को एक साथ मनाते हैं। 

घर बदला नहीं कि जैसे खुशियों ने उनके घर में डेरा जमा लिया और नीलिमा फिर से माँ बनने की खुशखबरी धीरेन्द्र को सुनाती है ,किन्तु अबकि बार वो अपने को रोक नहीं पाया और बोला -अबकि बार तो बेटा ही होना चाहिए। अब तो नीलिमा की भी इच्छा है ,दो बेटियों की माँ वो बन चुकी है ,एक बेटे की माँ वो स्वयं भी बनना चाहती है। कम्पनी का मकान पुराना सा ही था ,उसकी मरम्मत करवाने में पैसा लगा ,अब तो एक बेटी का  ,''प्ले स्कूल ''में दाखिला भी करवाया। नीलिमा की सहायता के लिए दो नौकर भी रखे गए सब ,कुछ तो अच्छा चला रहा था ,धीरेन्द्र जो भी कमाता खर्चा कर देता ,घूमने में ,दोस्तों में ,अब तो बड़ी सी गाड़ी भी ले ली ,उसकी किस्तें भी जाने लगीं। 

सुरेंद्र यार..... विवाह भी एक मुसीबत ही है ,खर्चे बढ़ते ही जा रहे  हैं।कुछ पैसों की आवश्यकता है ,तेरे पास हों तो....... 

तू अपने खर्चों पर अब पाबंदी लगा ,आये दिन ,तो पार्टी करता रहता  है ,ये परेशानी तेरे विवाह से नहीं ,तेरे अपने खर्चों के कारण है ,तूने ही इतने महंगे शौक पाल रखे हैं।

तू मुझे भाषण दे रहा है ,तुम लोगों के लिए ही तो करता हूँ ,तेरे पास पैसे हों तो बता !वरना भाषण मत दे। 

ये सब मैं तेरे लिए ही और तेरे लाभ के लिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं तेरा दोस्त हूँ। उस घर में तो ,तेरे मम्मी -पापा भी साथ थे ,वे भी तेरे कुछ खर्चे संभाल लेते थे ,शायद उन्होंने तेरी इन्हीं बातों से तंग आकर तुझे अलग किया हो। अब तो मैं तेरी सहायता कर दूंगा फिर कैसे चुकायेगा ?

मैं बेरोज़गार थोड़े ही हूँ ,अगले माह मेरी तनख्वाह आ जाएगी। 

तू उसे भी इसी तरह उड़ा देगा ,और पूरे महीने के ख़र्चे का उधार भी तुझे ही चुकाना है। 

क्या मैंने कभी तेरी सहायता नहीं की ?अब मुझे पहचान हुई ,साले...... मेरे घर आते हो ,खाते हो ,अब मुझे कुछ पैसों की  आवश्यकता क्या पड़ गयी ?सहायता तो कर नहीं रहा ,भाषण दे रहा  है।



देख..... ये तू बेफ़ालतू की बातें मत कर ,हम तुझसे नहीं कहते कि तू आये दिन दावतों में पैसा उड़ा ,महंगी से महंगी शराब पी ,हम भी बाल -बच्चे वाले आदमी हैं। तेरे और तेरी बीवी के रहन -सहन को देखकर हमारे घर में भी 

क्लेश होता है। इससे पहले भी मैं दो बार तेरी सहायता कर चुका ,मेरी भी तो तनख़्वाह ही आती है ,मेरे भी खर्चे ही हैं ,मेरा भी परिवार है। तू क्या चाहता हैं ? मैं अपने बच्चों को नजरअंदाज कर ,तुझे देता रहूं।

प्रतीक और तपन भी इंकार कर चुके थे ,तब धीरेन्द्र को लगा -सब दुनिया मतलबी है ,कोई अपना नहीं ,आवश्यकता पड़ने पर कोई साथ नहीं देता। 

नीलिमा का भी आठवां महीना चल रहा है ,धीरेन्द्र उसे किसी भी प्रकार की कोई परेशानी में डालना नहीं चाहता था। वो तो बच्चे होने के पश्चात ,छोटी बेटी को भी स्कूल में डालना चाहती है। वो मन ही मन सोचकर झुंझला गया ,और बुदबुदाने लगा -क्या मैंने उससे कहा था ?कि दो -दो बेटियों को बनाकर ''मेरे सीने  पर मूँग दलवाना ''किसी तरह महीना पकड़ा वेतन भी मिला अबकि बार संभलकर चलना है धीरेन्द्र ने पहले ही सोच लिया था।

पंद्रह दिनों पश्चात ,नीलिमा को दर्द  उठने लगे ,मानसिक रूप से धीरेन्द्र पहले से ही तैयार था किन्तु नीलिमा की इस तरह हालत देखकर घबरा गया और उसे शीघ्र ही किसी महंगे से महंगे अस्पताल में भर्ती करवाया।     

   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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