Sanyam

नमस्कार बहनों और दोस्तों ! आज हम ''संयम ''पर  बातें  करेंगे ,न...  न.... ये कोई, किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं ,वरन ये वो ''संयम ''है जो मानव के अंदर गुण और अवगुण दोनों ही रूप में समाहित है।  मानव गुणों में एक गुण  संयम भी है ,ये एक गुण भी है और अवगुण भी। जिस प्रकार काम -क्रोध ,लोभ -मोह इत्यादि गुण  हैं किन्तु एक सीमा के पश्चात अवगुणों  में परिवर्तित हो जाते हैं। इसी तरह ही संयम है  किन्तु संयम से  काम न लिया जाये और मानव ''असंयमित ''हो जाता है तब ये अवगुण ही बन जाता है। संयम की आवश्यकता हर उम्र में पड़ती है ,चाहे वो बच्चा हो, युवा हो या फिर वृद्ध ही क्यों न हो ? व्यक्ति समाज से या  फिर आध्यात्म से जुड़ा हो। संयमित व्यक्ति समाज में तो उन्नति पाता ही है और आध्यात्मिक उन्नति भी कर  लेता है। 


 मानव तन में जो चौदह इन्द्रियां होती है ,उन इन्द्रियों को संयम द्वारा ही नियंत्रित किया जा सकता है। हमारी ज्ञानेंद्री कहती है -कि संयम से कार्य करना चाहिए ,किन्तु हमारे चक्षु ,नासिका ,कर्ण , जिव्ह्या और त्वचा जो महसूस करते हैं ,देखते है उसको अन्य इन्द्रियों यानि कार्मेन्द्रियों तक संदेश  पहुंचा देते हैं ,जैसे- चक्षु सुंदरता देखकर ,ह्रदय तक अपनी सूचना पहुंचाकर निश्चिन्त हो जाते हैं किन्तु ह्रदय असंयमित हो जाता है और अन्य कार्मेन्द्रियाँ भी जागरूक हो जाती हैं। इसे इस तरह भी कह सकते हैं ,हमारी ये पांचों ज्ञानेन्द्रियाँ हमसे छल करती हैं या फिर समय -समय पर हमारे ''संयम ''की परीक्षा लेती हैं।  

इसका तो सबसे बड़ा उदाहरण ,मेनका और ऋषि विश्वामित्र ही हैं। जिन्होंने वर्षों तक तपस्या की ,जिससे इंद्र का भी सिंहासन डोल गया। तब इंद्र ने उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिए ,मेनका को भेजा। मेनका की सुंदरता के कारण ऋषि विश्वामित्र की संयम से की गयी वर्षों की तपस्या, मेनका की सुंदरता ने, भंग कर दी। तृप्ति बोली। 

ये ''काम ''नामक दुर्गुण जब मानव पर हावी होता है ,तब उसका संयमित जीवन कलंकित हो जाता  है ,जिसके कारण उसके चरित्र पर भी लांछन लग जाता है। ये बहुत ही कठिन कार्य है ,जो इसे जी गया ,समझो जीत गया, रेनू बोली।

संयम एक उम्र में ही नहीं ,वरन संयम की उम्र के हर पड़ाव में इसकी आवश्यकता पड़ती है। बचपन से ही हमें संयमित रहना  सिखलाया जाता है। क्योंकि ज्यादा उच्चश्रंखलता शिक्षा में भी व्यवधान डालती है ,संयम से रहना मन को आत्मकेंद्रित ,आत्मनियंत्रित करने के लिए ,हर उम्र में टोका और रोका जाता  है।

जब बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाता है ,तब उस पर विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि उसका संयम बना रहे। कई बार अपने  विद्यार्थी जीवन से परेशान होकर व्यक्ति जब कमाने लगता है ,बड़ों का दबाब कम हो जाता है ,तब कुछ लोग अपनी मनमानी करते हैं। अरे छोडो यार !ये भी कोई ज़िंदगी है ,खुलकर जियो ,मजे करो !किन्तु कुछ समय पश्चात उन्हें भी अपनी गलतियों का एहसास होने लगता है। कुछ लोगो को तो ,संयम में रहने की आदत ही बन जाती है किन्तु हमारी जो ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं ,बहुत ही चंचल हैं ,पता नहीं ,कब परीक्षा ले लें ?

आत्मज्ञान की खोज में निकले व्यक्ति को भी आत्मकेंद्रित बनना पड़ता है ,इसमें उम्र की कोई सीमा नहीं ,कभी -कभी तो जिन बुजुर्गों को संयम के लिए जाना जाता है ,या जो अपनी आने वाली पीढ़ी को इसकी शिक्षा देना चाहते हैं ,स्वयं असंयमित हो जाते हैं इसीलिए संयम में रहना बहुत ही कठिन कार्य है। ये पुरुषों पर ही लागू नहीं होता ,महिलाएं भी इससे बच नहीं सकतीं। 

जिसने भी संयम से  कार्य लिया ,उसका ही जीवन मोती की तरह चमक उठता है ,संयम का ही एक भाई भी कह सकते हैं ,वो है ,धैर्य। दोनों की ही समय -समय पर आवश्यकता पड़ती है ये मनुष्य के ऊपर निर्भर करता है कि किस परिस्थिति में कब और कैसे उनका उपयोग करना है ?

चलिए !आज की चर्चा को अब यही समाप्त करते हैं ,फिर मिलेंगे धन्यवाद ! उससे पहले एक कविता सुनाते हैं ,जरा ध्यान से सुनिए -

                                                                संयम और असंयम दो भाई ,

                                                           इन्होने मानव जीवन की लंका लगाई। 

                                                            संयमित जीवन जीया ,तो क्या जीया ?

                                                            ज़िंदगी तो सारी ,डर -डरकर जीया। 

                                                           असंयमित जीवन ने जीवन बर्बाद किया। 

                                                 इस जीवन पर ,क्यों और किसने इतनी बंदिशें लगाईं ?

    

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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