हाथ की लक़ीरें तो हाथ में ही रहती हैं ,जो दिखलाई देती हैं ,कुछ ज्ञानीजन उन्हें पढ़ भी सकते हैं। कुछ लोगों का दावा है ,उन्हें कर्मों द्वारा बदला जा सकता है किन्तु किस्मत की लकीरें तो अदृश्य हैं ,उन्हें न देखा न पढ़ा जा सकता है। कोई जान नहीं पाता ,क्या लिखा है ?उन लकीरों में। जो लिखा है उसे कोई बदल नहीं सकता। जो लिखा है ,वो पहले से ही तय है। आदमी को अहंकार रहता है कि ये'' मैं ''कर रहा हूँ किन्तु ये नहीं जानता कि ''बेमाता '' ने तो पहले से ही उसकी किस्मत ,उसके कर्म तय कर दिए हैं। हाथ ग़र कट भी गए ,तो वे लकीरें मिट जाती हैं या समाप्त हो जाती हैं किन्तु किस्मत तो जन्म से लेकर मृत्यु तक साथ देती है। उसी के अनुरूप उसकी बुद्धि कार्य करती है और उसके अनुरूप ही कर्म होते हैं।
मान लीजिये ,किसी की इच्छा डाक्टर बनने की है ,वो कर्म करता है ,डॉक्टरी की शिक्षा भी ग्रहण करता है ,एकाएक उसे किसी फ़िल्म का या किसी अन्य कार्य का अच्छा सुझाव आया और वो डॉक्टर बनते -बनते कलाकार बन गया। क़िस्मत हमसे खेलती है ,या यूँ कह सकते हैं हमारी परीक्षा लेती है परिस्थितियाँ ऐसी बन जाती हैं ,व्यक्ति बनना कुछ चाहता है ,बन कुछ और जाता है। दूर नहीं जायेंगे ,स्वयं ही अपने आपको टटोलिए आप क्या बनना चाहते थे और आज क्या बने हैं ? मान लीजिये -लेख़क ही बनना चाहते थे किन्तु अभी तक वो मुक़ाम हासिल नहीं कर पाए जिसकी आपको तमन्ना है। ये सब क़िस्मत का ही तो खेल है।
ज्यादा समय न लेते हुए ,एक उदाहरण देना चाहूंगी -एक प्रोफ़ेसर थे ,उनका रिश्ता तय हुआ ,अब उनकी ये जानने की लालसा हुई, कि लड़की कैसी है ?उस समय आजकल की तरह लड़की दिखाते नहीं थे। वो चुपचाप लड़की देखने ,उसके गांव पहुंच गए किन्तु लड़की नहीं देख पाए। तब उन्होंने जानकारी के लिए ऐसे ही किसी गांववाले से , उस जमींदार परिवार की बेटी के विषय में जानकारी जुटानी चाही। उन्हें ये मालूम नहीं था कि वो बंदा उस परिवार से खुश नहीं था। उसने तो खूब जमकर बुराई की।
प्रोफ़ेसर साहब अपने घर वापस आये और रिश्ते के लिए मना कर दिया ,अब उस लड़की का विवाह उन्हीं के एक विद्यार्थी से हो गया। एक दिन बातो ही बातों में पता चला कि इस लड़के का विवाह उसी लड़की से हुआ जिसे उन्होंने मना कर दिया। प्रोफेसर साहब का विवाह पढ़ी - लिखी किन्तु सुंदर नहीं थी ऐसी लड़की से हुआ। प्रोफ़ेसर साहब ने एक दिन अपने उस विद्यार्थी को एक सुंदर लड़की के साथ देखा। उन्होंने उससे उसका परिचय माँगा। तब उसने जो बताया ,उन्हें तो चक्कर आ गया ,ये वो ही लड़की थी जिससे किसी के कहने पर उन्होंने विवाह से इंकार कर दिया। अब तो वो बहुत पछताए और शराब पीकर अपना ग़म भुलाने लगे और सारी बात उस विद्यार्थी को भी बताई।
तब उसने कहा -ये क़िस्मत में तो मेरे लिखी थी , तब आपको कैसे मिलती ?तभी तो आपने ,रिश्ता हुआ था तब भी तोड़ दिया। कुछ लोग रोते रहते हैं ,ऐसी पत्नी मिली जीवन नर्क बन गया किन्तु किस्मत में जब वो ही लिखी है ,तब कैसे बदलोगे ? किन्तु अपने कर्मो द्वारा उन प्रोफेसर साहब ने अपने जीवन को और नर्क बना दिया। शराब में डूबकर ,इसीलिए जो भी मिला है या मिल रहा है उसी में प्रसन्न रहना सीखिए ,''रोकर भी गुजारनी है और हँसकर भी गुजर जायेगी ये ज़िंदगी। ''क्योंकि किस्मत तो अपना खेल खेलती रहेगी तो क्यों न उसे हँसकर मात दी जाये।''
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