Bevafa sanam [part 14 ]

 श्याम मनु को बिल्लू बनाकर, अपने गांव को दिखाने और अपने दादाजी से मिलाने ले जाता है ,मनु उनसे  उस जंगल से संबंधित कोई कहानी सुनाने को कहती है। दादा जी ने जो कहानी अपनी दादी से सुनी थी ,वही कहानी मनु को सुनाई किन्तु मनु को उस कहानी पर विश्वास नहीं हुआ। तब वो दादाजी से पूछती है -क्या आपको इस कहानी पर विश्वास था ?

नहीं ,किन्तु अपने बड़ों की बात पर अवश्य विश्वास था ,जब उन्होंने ये कहानी सुनाई है तो अवश्य ही कुछ सच्चाई भी होगी।'' बिना आग के तो धुंआ उठता नहीं है।'' 



ये बात भी सही है ,ये कहानी तो आपकी दादीजी ने सुनाई किन्तु आपके सामने ऐसी कोई घटना घटी ,जो इस जंगल से संबंधित  हो ,मनु ने पूछा। 

दादा जी ने सोचते हुए कहा -नहीं ,सब अपने -अपने काम में रहते हैं। किसी ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। 

उनकी बात सुनकर ,मनु ने सोचा -अब दादाजी से कोई ख़ास जानकारी नहीं मिलने वाली है ,वो उठकर चलने लगी। तभी ,दादाजी बोले -जब मैं ,तेरह -चौदह  बरस का था ,तब एक व्यक्ति तो यहाँ आया था। सुना था ,वो इस जमीन को खरीदने आया था। 

मनु को ,एक उम्मीद की किरण नजर आई और बोली -क्या उसने वो जमीन ख़रीदी ?

वो बहुत पैसे वाला था ,पता नहीं ,उसने जमीन खरीदी या नहीं ,किन्तु कुछ दिनों पश्चात सुनने में आया अब  वो नहीं रहा। तबसे अब तो किसी का भी साहस उधर देखने का भी नहीं हुआ वरन उस जमीन को शापित जमीन कहने लगे। 

मनु की जो उम्मीद की किरण थी ,वह वहीं दबकर रह गयी। वो बाहर आ गयी। तब दादाजी ने श्याम को बुलाया और बोले -ये कबसे यहां है ?

जी....... तीन दिनों से !

अब इसे जो भी जानकारी लेनी थी ,ले ली और अब इससे कहो कि अपने घर जाये ,इस तरह स्यानी लड़की का ,अनजान जगह पर इतने दिनों तक रहना ठीक नहीं ,इसे कल ही बस में बिठा देना या फिर तुम छोड़ आना। 

श्याम हैरत से दादा जी का चेहरा देख रहा था ,वो मुस्कुराकर बोले - दादा हूँ तुम्हारा।  

श्याम ने  बाहर आकर मनु को देखा ,मनु ने उसे इस तरह अपने को देखते ,देखकर पूछा -क्या देख रहे हो ?अब अपना गांव और दिखा दो। 

नहीं गांव नहीं ,तुम्हें तो दादाजी ही पहचान गए ,अब ''फॉर्म हॉउस'' में ही चलो। 

कैसे ??? उसने अपनी दाढ़ी -मूंछ को ठीक करते हुए पूछा। तब उस जंगल के आस -पास का इलाका ही दिखा दो। या..... वैसे उधर तो कोई जाता भी नहीं ,वहाँ मुझे कोई नहीं पहचान पायेगा। 

श्याम मनु को लेकर ,उस जंगल की तरफ बढ़ चला ,वो जानता था -यदि वो नहीं ले गया तो ये स्वयं ही चली जाएगी। यही सोचकर आगे बढ़ा। 

मनु उस जंगल की तरफ बड़ी गहराई से देख रही थी ,उसके थोड़ा नजदीक गयी ,ऐसा कुछ विशेष नजर नहीं आया ,तब उसने अंदाजा लगाया ,शायद उस व्यक्ति को मैंने उस पेड़ के करीब से जाते देखा था। वो उधर ही बढ़ चली।

 श्याम उसके पीछे ही था ,बोला ज्यादा आगे मत जाना। 

मनु ने उस  स्थान पर ,कुछ ढूंढने का प्रयत्न किया तभी ,उसने श्याम को बुलाया और बोली -देखो !ये पगडंडी !

हाँ तो..... 

तुम समझे नहीं ,ऐसी पगडंडी तभी बनती हैं ,जब लोग उधर से ज्यादा निकलते हैं। अब तुम ये सोचो !जब यहां कोई रहता नहीं ,इस जंगल में जाता नहीं ,तब ये पगडंडी कैसे बनी ?ये देखो ! यहाँ से घास दबी हुई है। जैसे पैरों से दब जाती है। यहाँ अवश्य ही कुछ तो है ,जो मेरे लिए रोचक और ख़तरनाक भी हो सकता है। अच्छा ये बताओ !इधर से कोई विशेष आवाज आई है। 

नहीं ,हमने तो कोई आवाज नहीं सुनी। 

आई भी तो ,इस जंगल के प्रति इतना ड़र बैठा हुआ है ,किसी ने ध्यान ही नहीं दिया होगा।कुछ सोचते हुए बोली - चलो !अब वापस चलते हैं।

श्याम उसे लेकर ''फॉर्म हॉउस ''में आ जाता है। मनु के मन में कुछ तो चल रहा है। उसे छोडकर श्याम बाहर आ गया। मनु  कम्प्यूटर के पास पहुँची। आज वो स्वयं को अपने कैमरे  में देख रही थी। अँधेरा होने लगा था। वो छत पर टहलने के लिए गयी ,जंगल इतना घना था ,ऊपर से तो कुछ दिखने वाला नहीं था। उसे लगा वो अकेली कैसे इस जंगल के रहस्य को  खोल पायेगी ? मम्मी -पापा को पता चल गया तो वो भी उसे नहीं भेजेंगे। तभी उसने उन  घने पेड़ों  में रौशनी देखी ,ये रौशनी किधर से आ रही है ?वह यह जानने का प्रयत्न कर रही थी ,या फिर आस -पास की रौशनी वहां दिख रही थी। ऐसे समय में उसे ,''ड्रोन कैमरा ''याद आया किन्तु वो उसके पास नहीं था। वो भी तो आवाज करता ,ये खोजबीन तो गुप्त तरीक़े से होनी चाहिए।  वो वापस नीचे  आ गयी।

 तब तक श्याम भी आ चुका था। खाना खाते हुए श्याम बोला - मुझे लगता है , इस जंगल में कुछ तो है ,जो हम समझ नहीं पा रहे हैं। 

मनु उसकी ये बातें सुनते हुए खुश होकर बोली -अब तो तुम मानते हो। अब कैसे तुम्हें मेरी बात पर विश्वास हुआ ?

उस पगडंडी को देखकर लगा ,उधर से कोई तो जाता होगा किन्तु हम लोग अपने कार्यों में इतने व्यस्त रहते हैं ,इतनी खोजबीन का हममें धैर्य ही नहीं है। मनु के मन में एक उजाले की किरण दौड़ गयी उसे जोश आया और उसने  फिर से अपने कैमरे में नजरें गड़ा दीं। 

तभी वो ख़ुशी से लगभग चीख़ते हुए बोली -देखो ,आज इस कैमरे में भी ,ये तस्वीर कैद हो गयी। श्याम भी आ गया उसने भी किसी को उसी स्थान से बाहर आते देखा। किन्तु वो किधर गया ?ये नहीं दिखलाई पड़ा।



मनु  उस जंगल के बीचों -बीच खड़ी है ,बहुत ही मनोहारी दृश्य है ,वो इधर -उधर ,कभी झरने के नीचे नहा रही है।कोयल की कूक दूर से ही सुनाई पड़  रही थी ,तभी एकदम से अँधेरा गहराने लगता है और धीरे -धीरे घुप्प अँधेरा हो जाता है। उस अँधेरे में दो आँखें उसे घूर रहीं हैं ,वो उन नजरों से बचने के लिए ,अँधेरे में ही दौड़ती है। दौड़ते -दौड़ते किसी चीज से टकरा जाती है और वो दर्द से कराह उठती है। उस दर्द में उसकी आँखें खुल जाती हैं। तब वो देखती है ,उसका पैर पलंग की पट्टी में फंस गया था ,नींद में होने के कारण वो निकल नहीं पाया और दर्द करने लगा ,तब उसे लगा ,ये तो एक सपना था। 

   अगले दिन मनु अपना सामान लेकर ,अपने घर के लिए प्रस्थान करती है क्योंकि वो नहीं चाहती थी कि उसके मम्मी -पापा को उसकी चिंता हो। अपना कैमरा और कम्प्यूटर वो वहीं श्याम की निगरानी में छोड़ गयी। अब उसे विश्वास था- श्याम उसका विरोध नहीं करेगा। 

 

 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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