Zeenat [part 49]

आदिल के, घर से चले जाने के पश्चात ,ज़ीनत और भी परेशान रहने लगी थी ,हालाँकि उसकी अम्मी सलमा अपनी बेटी का पूरा ख्याल रखने की कोशिश कर रही थी, किन्तु वो भी तो सारा दिन उसके घर में नहीं रह सकती थी । ज़ीनत घर का कोई काम नहीं करती थी ,सलमा ही उनके खाने -पीने का इंतज़ाम करती थी। एक दिन सलमा को ज़ीनत के पास पहुंचने में देर हो गयी। तब ज़ीनत अपने आप ही माँ के पास गयी किन्तु दरवाज़े पर ही वह अपने भाइयों की बातें सुनकर वापस घर आ गयी ,उसे बहुत गुस्सा आ रहा था। उसे लगने लगा था ,अब मेरा पहले की तरह कोई ख़्याल नहीं रखता है।  


सलमा समझती थी ,अब उसके दोनों बेटों का व्यवहार ,ज़ीनत के प्रति  इतना सहानुभूति पूर्ण नहीं रहा। उनका अपना परिवार हो गया है। उनकी बीवियां भी उनके'' कान भरती रहती  हैं। '' अब तो कभी -कभी सलमा को भी डर लगता ,न जाने उसका बुढ़ापा भी, कैसे कटेगा ? उसके मन में अपने बच्चों के प्रति प्यार है वो समझती भी है ,अपने अब्बू के जाने के बाद,उसके बच्चों ने किस तरह से अपने आपको संभाला है ?उनकी बीवियां भी सारा दिन कुछ न कुछ काम करती रहती हैं ,ताकि अपने शौहर की मदद कर सकें।  किन्तु ज़ीनत के प्रति उनके मन में गुस्सा है। उन्हें लगता है ,जिस तरह से हम काम कर रहीं हैं ,अपने घर को संभाल रहीं हैं ,उसी तरह ये, अपने घर को क्यों नहीं संभालती है ?

साधारण दृष्टि से देखा जाए तो... उनकी बात भी अपनी जगह सही है, वे भी तो अपने गृहस्थी को संभाल रहे हैं, फिर ज़ीनत ऐसा क्यों नहीं करती है ? अभी तक तो वह माता-पिता के साए में ही पल रही थी, हालांकि उसके जीवन में कुछ परेशानियां आई थीं  किंतु अब तो उसे आगे बढ़ जाना चाहिए। किंतु ऐसा कुछ भी नहीं है बल्कि सलमा ही उसको और उसके परिवार को संभाल रही है। आदिल के चले जाने पर चिंतित भी है। 

आज तो सलमा के दोनों बेटों ने भी कह दिया -कि उसे जिंदगी में आगे बढ़ने दो ! लोगों को देखेगी ,उनसे मिलेगी, जीवन में कुछ सीखने को ही मिलेगा और खुद काम करेगी ,तभी वो आगे बढ़ पायेगी। 

 तब भी सलमा को लगता है, अभी मेरी बच्ची नादान है।  अब तो उसके साथ, दो छोटे-छोटे बच्चे भी हैं। वह  यह सब कैसे संभालेगी ? अब तो अक्सर ज़ीनत का गुस्सा उसकी नाक पर रखा रहता और इसी गुस्से के कारण, वह घर से निकल गई। उसने यह बात अपनी अम्मी  को बतानी भी ,सही नहीं समझी। शांत रहती तो किसी की बात सुन भी लेती थी किन्तु गुस्से में तो उसकी हालत और बिगड़ जाती और किसी की सुनती भी नहीं थी।  

इससे पहले वह कहीं आई ,गई नहीं थी। वह नहीं जानती थी, कि उसे कहां जाना है ? फिर भी वह अपने दोनों बेटों के साथ एक बस में बैठ गई , उसे नहीं मालूम था, कि बस में कैसे जाते हैं ? यानी कि उसमें बैठने के लिए टिकट लेना पड़ता है।  जब वह बस में बैठ गई, तब बस आगे बढ़ी ,उसके बच्चे रोने लगे । इतने लोगों की भीड़ देखकर वे भी डर गए थे ,साथ ही उन्हें भूख भी लगी थी। 

तब बस में बैठी एक महिला ने उससे पूछा -ये क्यों रो रहे हैं ? इन्हें चुप कराओ !

चुप हो जा... कहते हुए ज़ीनत ने अपने लड़के को डांटा। 

उस महिला को ज़ीनत का बर्ताव ठीक नहीं लगा ,तब  शायद  उसे उन पर तरस आ गया और बोली -इन्हें भूख लगी है, कुछ खाने को दे दो !

ज़ीनत चुपचाप बैठ गयी ,उसकी विवशता उसके चेहरे पर साफ नजर आ रही ,थी ,किसी से क्या कहे ? बच्चे को अपने नजदीक खींचकर चुप कराने की कोशिश की। 

बस में बैठी ,वो महिला उनसे अपना ध्यान हटा लेना चाहती थी किन्तु भूख से बिलखते बच्चे उससे देखे नहीं जा रहे थे ,तब वो बोली - इन्हें इस तरह डांट क्यों रही है ? 

मेरे पास खाने को कुछ भी नहीं है, मैं इनके लिए खाने को कहां से लाऊं ? 

उस महिला को आश्चर्य होता है किंतु फिर भी वह तरस खाकर उन बच्चों को खाने के लिए कुछ दे देती है। बच्चे खाने लगते हैं किंतु ज़ीनत पानी पीकर ही अपने 'पेट की आग को शांत करती है।'

टिकट की जाँच करते हुए , जब कंडक्टर ने ज़ीनत से पूछा - टिकट दिखाओ !

पहले तो उसने समझा किसी और से कह रहा है ,कंडक्टर उससे फिर पूछा - तुम्हारा  टिकट कहां है ?टिकट दिखाओ !

पहले तो वो समझ ही नहीं पाई  तब वो बोली - मेरे पास कोई टिकट नहीं है। 

क्या तुमने टिकट ही नहीं लिया ? कंडक्टर को गुस्सा आया लेकिन उसकी हालत और बच्चों को देखकर शांत रहा और उससे पूछा -तुम्हें कहां जाना है ?

ज़ीनत सोचती रही , उसे तो पता ही नहीं उसे कहां जाना है ? कि उसे किसी शहर या किसी गांव में जाना है ? क्या हुआ ? बताओ ! कहां जाना है ? कंडक्टर ने कुछ रूखे  शब्दों में उससे पूछा। 

मुझे नहीं पता, दूसरे शहर में ,अपने शौहर के पास जाना है।

 कौन से दूसरे शहर में ? टिकट भी नहीं लिया।

 कुछ लोग बोले - लगता है, यह' पगली 'है , यह कुछ नहीं जानती है। 

तभी एक आदमी बोला -ऐसा तो नहीं , कहीं ये बच्चे भी इसके न हों ,कहीं से उठा लाई हो,ज़ीनत ने उसे घूरा  तब उसने कंडक्टर से कहा- इसे अगले स्टॉप पर उतार देना, जहां इच्छा होगी वहां चली जाएगी। 

तब एक व्यक्ति ने उससे पूछा -तुम कहां से आई हो ? कहां रहती थीं ?

 अपने घर से आई हूं, अम्मी के पास रहती थी, उसके ऐसे जवाब सुनकर कोई भी समझ लेगा, कि ये मानसिक रूप से सही नहीं है।  मैं, इसी शहर में रहती हूँ। उसके आधे -अधूरे से ,उसकी तोतली जबान में ऐसे जबाब सुनकर ,एक ने कहा -लगता है, कि यह कम दिमाग की है।

 कंडक्टर ने उससे, अगला स्टॉप आने पर बोला -यहां उतर जाओ ! 

ज़ीनत को, उन सबका व्यवहार बहुत ही गलत लग रहा था ,सभी उसे ऐसे देख रहे थे ,जैसे वो कोई इंसान न हो ,इस तरह बस से उतारे जाने पर उसे अपनी बेइज्जती महसूस हो रही थी। तब ज़ीनत  ने उससे पूछा - मैं कहां जाऊं ?

 कहीं भी जाओ ! कह कर उसने, उसके दोनों बच्चों को भी बस से उतार दिया। हालांकि वह अपने घर वालों की बात सुनकर, आदिल के शहर के लिए ही बस में बैठी थी किंतु उसे आदिल के  शहर का नाम ही मालूम नहीं था।

  जब अम्मी अपने बच्चों से कह रही थी -आदिल के शहर का नाम सुना तो था लेकिन अब याद नहीं आ रहा। अपने बच्चों के साथ वह उस अनजान जगह पर उतर गई।

 अनजान सड़कें , अनजान लोग, कहां जाए ? किससे  बात करें ? कुछ समझ नहीं आ रहा था। 

बस से उतरी एक  महिला ,जिसके साथ दो बच्चे भी हैं ,उसे देखकर एक रिक्शे वाले ने नज़दीक आकर पूछा -  कहां जाना है ?

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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