नमस्कार बहनों और दोस्तों !आज हम अपनी इच्छाओं और ख़्वाहिशों पर चर्चा करेंगे। हमारा जीवन इतना लम्बा है, किन्तु उससे अधिक हमारी इच्छायें होती हैं ,जो हमें दिन रात घेरे रहती हैं। हम चाहकर भी उनसे पीछा नहीं छुड़ा पाते हैं। एक तरह से देखा जाये तो हम उनके गुलाम हो जाते हैं , क्योंकि इच्छाएं तो अनंत हैं ,कुछ आवश्यक भी हैं। एक पूर्ण होते ही दूसरी इच्छा जाग्रत हो जाती है। जो इच्छाओं को दफ़न कर सके या उन्हें मिटा दे ,ऐसा तो हो ही नहीं सकता क्योंकि हम सामजिक प्राणी हैं ,हम कोई साधू -संत नहीं। समाज में रहकर ,आवश्यकयताएँ तो बढ़ ही जाती हैं। एक बार हम अपनी आवश्यकताओं को नियंत्रित कर भी लें तो कुछ चीजें सामाजिक तोेर पर भी करनी पड़ती हैं और कुछ इच्छाएँ या आवश्यकताएं व्यक्तिगत तौर पर भी होती हैं। कुछ धन से जुडी होती हैं ,और कुछ व्यक्तिगत ,भावनाओं से जुडी हैं। हमें अपने लिए कुछ करना है ,अपना कुछ करना चाहते हैं या थे
अब इस हिसाब से ,हमारी इच्छाएं दो हिस्सों में बंट जाती हैं ,सामाजिक और व्यक्तिगत इच्छाएँ।जैसे -मका न बनवाना है ,बच्चों की शिक्षा ,उनके विवाह इत्यादि सामाजिक और धन से जुडी इच्छायें।
कुछ इच्छाएं धन से जुडी होती हैं ,कुछ व्यक्तिगत और भावनाओं से जुडी होती हैं ,जैसे -मुझे पत्रकार बनना था ,एक कलाकार बनना था ,या फिर लिखने का शौक था ,मुझे तो घूमना पसंद था ,अमीरों की तरह ज़िंदगी जीने की इच्छा थी। लोगों की इच्छाओं की कोई सीमा नहीं।
हमारी इच्छाएँ ,जो सामाजिक होती हैं ,वो अवश्य ही धन से संबंधित होती हैं ,किन्तु व्यक्तिगत इच्छाएं भावनाओं से जुडी होती हैं ,किन्तु विवाह एक सामाजिक रस्म है किन्तु लड़के -लड़की के लिए व्यक्तिगत और उनकी अपनी भावनाओं से जुडी होती हैं।
अब इसमें समाज से जुड़े दो परिवार ,कुछ धन व्यय करके ,लड़के -लड़की का विवाह करवाते हैं ,कई बार दोनों ही पति -पत्नी बनकर प्रसन्न होते हैं और अपना गृहस्थ जीवन आरम्भ करते हैं। अब तक दोनों अनजान थे इसीलिए कुछ दिन तो आराम से गुज़र जाते हैं किन्तु जैसे -जैसे दोनों एक -दूसरे को समझने लगते हैं तो एक -दूसरे की कमियां भी नजर आने लगती हैं। ततपश्चात ,उनके पास ताने और शिक़वा -शिकायतों के सिवा कुछ नहीं रह जाता है।
अक्सर आप लोगों ने कहते सुना होगा ,जब मेरा विवाह हुआ ,तब मुझे इतना ज्ञान नहीं था वरना मैं इंकार कर देती।
या फिर ,इस आदमी के साथ सम्पूर्ण ज़िंदगी बिता दी किन्तु इसने कभी मेरा कहना नहीं माना ,हमेशा अपनी चलाई। इसी तरह कि कुछ शिकायतें आज भी आप लोगों को होगीं । अपने जीवन से या फिर अपने सहयोगी से।
जी...... हाँ मैं तो पढ़ -लिखकर नौकरी करना चाहती थी किन्तु मेरे पापा ने मेरा विवाह करा दिया और आज मैं इनके घर में सिर्फ़ एक नौकरानी बनकर रह गयी हूँ। पहले इनके माता -पिता की सेवा की उसके पश्चात इनके बच्चे पाले ,मेरा तो जैसे कुछ जीवन रह ही नहीं गया है कृति बोली।
तब इसमें दोष किसका है ?उन माता -पिता का ,जिन्होंने समय से ही अपनी बेटी का विवाह कर दिया या फिर उन माता -पिता का जिन्होंने अपनी बहु से एक उम्मीद लगाई ,उसे अपना सारा घर सौंप दिया। या फिर उस पति की ,जो अपने तन -मन -धन से अपने परिवार और अपनी पत्नी को रात -दिन खुश करने में व्यस्त है और कोई भी खुश नहीं।
अजी दोष किसका है ?मेरी किस्मत का है ,जब कृति को कोई जबाब नहीं सूझा तब उसने अपनी क़िस्मत को ही दोष दे डाला।
ये कल्पना जी !आप तो नौकरी करती हैं ,आपको भी तो किसी से शिकायत होगी ,अपने परिवार से ,या समाज से ,आप तो मजे में रहती होंगी या आपकी भी कुछ इच्छाएँ थी जो आज भी दिल के किसी कोने में कुलबुलाती होंगी।
जी ,मैं नौकरी ही नहीं करना चाहती थी ,नौ से छह की गधा मजदूरी मुझे पसंद ही नहीं ,उस दिन तो अच्छा लगता है, जिस दिन पैसे यानि वेतन हाथ में आता है। वो भी खर्चों में ,चार -पांच दिन तक दिखलाई पड़ता है। मैं तो चाहती थी ,देश -विदेशों में घूमूँ ,घर के काम से तो मैं नौकरी के कारण बच जाती हूँ किन्तु सभी को काम चाहिए बिना काम किये तो वेतन भी नहीं मिलने का। नाक इधर से पकड़ो या फिर उधर से ,पकड़ी तो नाक ही जाती है। काम घर में करो या बाहर ,काम तो काम ही है। एक मिनट का आराम नहीं।
देखा !कल्पना जी की भी अपनी इच्छाएं हैं ,वे भी संतुष्ट नहीं ,वो आंटीजी जो पीछे बैठी हैं ,उनसे पूछते हैं ,उनकी कोई ख़्वाहिश ऐसी है जो पूर्ण न हुई हो।शायद अब कोई इच्छा ही न हो ,उम्र के साथ ख़्वाहिशों ने भी दम तोड़ दिया हो। जी ,मिसेज़ अग्रवाल जी आपकी तो सभी इच्छाएं पूर्ण हो गयी होंगी।
अब क्या इच्छाएं पूर्ण होना ,अब तो इच्छाएँ दम तोड़ चुकी हैं।
क्यों ?अब तो आपके दो -दो मकान हैं ,दो बहुएं हैं ,बेटियों का विवाह हो चुका ,पोते -पोती आंगन में खेल रहे हैं और क्या चाहिए ?बच्चे होना कोई बड़ी बात नहीं ,वो तो जानवरों के भी हो जाते हैं ,बच्चे बड़े हुए हैं तो विवाह भी होंगे किन्तु इन सबके लिए ,मैंने अपनी इच्छाओं को कितना दबाया है ?ये तो मैं ही जानती हूँ ?कभी तुम्हारे अंकल मेरे साथ खड़े नहीं थे। उस आदमी के साथ मैंने अपने जीवन के पैंतीस साल बिता दिए किन्तु कभी भी उसको अपने साथ खड़े नहीं पाया। जब उनके परिवार की बात होती थी ,तब मैं अपने को अकेला पाती थी। कभी उस आदमी ने मुझसे मेरे पास आकर ये नहीं पूछा -''सरला तू क्या चाहती है ?तेरी भी कोई इच्छा है या नहीं। तुम लोग जो आज मेरा हंसी -ख़ुशी वाला परिवार देख रहे हो ,उसको संवारने के लिए मैंने अपनी इच्छाओं के विषय में तो कभी सोचा ही नहीं ,और उसका परिणाम आज ये है। बहुएं अपनी मस्ती में रहती हैं ,अपना घूमती -मजे करती हैं। और उस घर की देखभाल के लिए ,पीछे से मैं चौकीदार बन रह गयी हूँ। बाहर से तो मम्मी जी करतीं हैं किन्तु मैं महसूस करती हूँ ,उनके मन में ,मेरे प्रति कोई सम्मान नहीं। जब बच्चे हुए तो सोचती थी ,बच्चे थोड़े बड़े हो जायेंगे ,तब अपना शौक पूरा करूंगी ,बच्चे बड़े हुए तब उनको पढ़ाने की ज़िम्मेदारी ,बच्चे क़ाबिल हुए ,कुछ समय अपने लिए निकालती भी ,तब बच्चे और पति कहते -अब इस उम्र में ,क्या लेकर बैठ गयीं ?
तब थोड़ा मुस्कुराकर बोलीं -मेरी एक दोस्त है ,उसने हमेशा अपनी मनमर्ज़ी की ,आज वो खुश है किन्तु परिवार तो उससे दुखी है या फिर उसके पीछे है।कम से कम उसने अपनी मनमर्जी की ज़िंदगी तो जी। हम तो ये भी नहीं कह सकते।
आज की चर्चा यहीं समाप्त करते हुए ,इन सभी चर्चाओं से हम इस नतीज़े पर पहुंचते हैं -हमारी ज़िंदगी अनजान परिस्थितियों से घिरी होती है ,सभी की इच्छाएं भी अलग -अलग होती हैं कोई इच्छाओं को पूर्ण करके भी सुखी नहीं है ,कोई उन्हें पूर्ण करने के लिए ताउम्र प्रयासरत रहता है। किन्तु मेरा तो ये मानना है ,सभी कि इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं ,विपरीत परिस्थितियों में ,सुख -दुःख का कारण बन जाता है। किन्तु जो पूर्ण हो जाती हैं या जैसी भी स्थिति में हम रह रहे हैं ,उन्हीं में सुकून ढूंढने का प्रयास करना चाहिए। सीखने या कोई भी कार्य करने की कोई निश्चित उम्र या समय नहीं होता ,जब भी मौका मिले ,तो प्रतीक्षा ,किस बात की ?जुट जाइये ,प्रयास करते रहिये किसी की प्रशंसा का मोहताज़ न होकर अपने कार्य को लग्न और मेहनत से करिये ! सफलता अवश्य मिलेगी। समीक्षा और प्रोत्साहन अवश्य दीजिये धन्यवाद !
