नमस्कार बहनों ! आज मैं जिस विषय पर चर्चा करने वाली हूँ ,वो हमारी ज़िंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा मान सकते हैं ,अथवा है। जी हाँ ,आज सभी को ''करवा चौथ ''की शुभकामनाओं के साथ ही ,इसी विषय पर आज चर्चा होगी। ''करवा चौथ ''की शुरुआत कब ,कहाँ और कैसे हुई ये तो नहीं पता किन्तु इतना अवश्य पता है -जब से हमने जन्म लिया तबसे हमारी मम्मी और दादी ,अपने पति की लम्बी उम्र की कामना से, व्रत करती आई हैं। ये पति -पत्नी का रिश्ता भी बड़ा विचित्र है ,इसमें प्यार है ,झगड़े हैं ,अपनापन है ,एक -दूसरे का साथ निभाने का वायदा है। सात जन्मो का साथ है ,किसी ने देखा तो नहीं किन्तु हमारे संस्कार और रीति -रिवाज़ हमें यही समझाते हैं और रिश्ते तो...... धीरे -धीरे छूट या टूट जाते हैं किन्तु ये पति -पत्नी का रिश्ता अटूट है। सुख -दुःख में अंत तक यही रिश्ता साथ निभाता है।
किन्तु अब इसी रिश्ते पर ग्रहण लगने लगा है ,न ही पति -पत्नी में ,अब इतना विश्वास रहा और रिश्ते शीघ्र ही तलाक़ की कगार पर खड़े होकर ,अदालत का दरवाज़ा खटखटाते नजर आते हैं क्योंकि इस रिश्ते में भी अहं घुस गया है। जो प्रेम ,विश्वास की डोर होनी चाहिए ,वो कमजोर पड़ती जा रही है।''करवा चौथ ''के व्रत को भी लोगों ने मज़ाक बना दिया। पत्नी कहती है -यदि तुमने मेरी ,मांग पूर्ण नहीं की तो अभी तोडूं व्रत। ''ये तो एक मज़ाक की बात हो गयी। किन्तु इसको आज की पीढ़ी ने गंभीरता से ले लिया और उम्मीद रखती हैं कि मैंने इसके लिए व्रत रखा तो इसका भी कर्त्तव्य बनता है कि मेरे लिए कुछ उपहार लाये। आजकल पति भी लापरवाह भी कह सकते हैं। पहले चाहे आदमी का बजट नहीं होता था ,तब वो एक ग़ुलाब का फूल ही लेकर आये पत्नी सहर्ष स्वीकार करती। किन्तु उसे अपने व्रत पर विश्वास और श्रद्धा थी ,उसे इस बात का भी यक़ीन था कि पति सही -सलामत रहा इसकी उम्र लम्बी रही तो ये सुविधाएँ भी मिल ही जाएँगी।
आजकल तो जो भी चाहिए अभी ही चाहिए ,चाहे किसी से कर्ज़ा लेकर आये। बात जिद पर और आन पर आ जाती है। जैसे वो ये व्रत करके उस पर एहसान कर रही हो।
आजकल सतसंगों में भी ,सुनने को मिलता है ,क्या तुम्हारे व्रत करने से पति की उम्र लम्बी हो जाती है ? इसी की तर्ज़ पर कई महिलाओं ने तो व्रत करना ही छोड़ दिया। माना कि, आजकल न ही कोई सावित्री है जो अपने पति के प्राण यमराज से बचा लाई थी ,न ही कोई सत्यवान है। न ही ऐसे प्रेम और विश्वास रहे। किन्तु मेरा मानना है -''करवा चौथ ''का ये वार्षिक त्यौहार ,अपने और अपनों के लिए , प्रेम और उत्साह लेकर आता है। एक विश्वास से भर देता है ,आज हम किसी अपने के लिए भूखे रह जाते हैं ,उसके लिए शृंगार करते हैं। हमारी आत्मा का कोई रूप या आकार नहीं होता किन्तु जिस तन में ये आत्मा निवास करती है। वो तन तो सभी को नजर आता है। इसी इंसानी रूप में हम वर्षों से रह रहे हैं और माना जाता है ,कि इसके अंदर परमात्मा निवास करता है। तो क्या पति के रूप में ,वो परमात्मा उसके अंदर विराजमान नहीं है ? जब कण -कण में वो ही बसता है तो क्या पति के रूप में ,उस परमात्मा के लिए ,एक ''करवा चौथ ''का व्रत नहीं रखा जा सकता जो तुम्हारे सुख -दुःख और जीवनभर का साथी है।
बात व्रत की नहीं ,भाव और श्रद्धा की है। एक तरफ तो तुम कह रहे हो ,कि कण -कण में वो ही निवास करता है ,दूसरी तरफ इसी बात से इंकार करते हो -कि क्या तुम्हारे व्रत रखने से पति की लम्बी उम्र होगी ?मन में भाव हैं ,श्रद्धा है ,विश्वास है तो अवश्य होगी। इस तरह के व्रत पर ,चुटकुले बनाकर ,हंसी -मज़ाक बनाकर ,वो विश्वास कैसे पैदा कर पाओगे ? इसीलिए आजकल की पीढ़ी को भी ,इन चीजों पर विश्वास नहीं रहा। बरसों से चली आ रही ,हमारे रीति -रिवाज़ों का संस्कारों का मज़ाक बनाकर रख दिया। न ही रिश्तों पर विश्वास रहा ,न ही रीति -रिवाजों पर ,ये तो जैसे खेल की या स्तर की बातें हो गयीं। किसी के पति ने सोने का सेट दिया ,मुझे तो हीरों का हार चाहिए। बस ये मानसिकता यहीं तक सीमित होकर रह गयी।
आजकल कुछ महिलाओं ,जो नई -नई शादीशुदा हैं ,कहते सुना है -हम ही क्यों उनके लिए व्रत रखें ?वो भी तो रख सकते हैं ,ये तो भई ,प्यार और विश्वास का सौदा है। कोई किसी के लिए कुछ करता है तो बदले में भी कुछ उम्मीद लगा बैठता है। मैंने आजकल कुछ लड़कों को भी ,अपनी पत्नी के लिए व्रत करते देखा है। किन्तु किसी के लिए ,तुम कुछ अच्छा कर रहे हो ,तो बदले की भावना से नहीं। ये आपका अपने प्रेम ,विश्वास है किसी को मजबूर करना नहीं।
आज तो कोई भी बहन नहीं आई ,सभी अपने -अपने घरों में व्यस्त होंगी। मैं भी अभी पूजा करके बैठी और एक वीडियो देखी , तभी ये विचार मेरे मानस पटल में घूमने लगे ,जो मैंने आप लोगों से कहे यदि आपको मेरे विचार पसंद नहीं आये तो आप अवश्य ही समीक्षा द्वारा समझा सकते हैं और पसंद आ गए तब भी वो ही रास्ता अपना सकते हैं ,धन्यवाद !
