माना कि !छल -कपट के बिना ,
दुनिया जीने नहीं देती।
तुम भी ईंट का जबाब -पत्थर से दो !
तो ये मरने भी नहीं देती ।
छल -कपट करना, हर किसी की फ़ितरत नहीं।
छल के चला जाये कोई.......
सीधे बने रहना ,ये भी तो जरूरी तो नहीं।
छल -कपट न करना ! ये प्रकृति हैं ,हमारी ।
किसी के छलने पर तुम रोको ! छल करो नहीं।
कपटी लोगों से ,कपट द्वारा ही जीता जा सकता है।
जब तक पता चलता है , छले जाते हैं ,हम।
अपनी ही नादानियों पर........
मंद -मंद मुस्कुराकर रह जाते हैं ,हम।
माना कि ,छल -कपट बहुत है, तेरी दुनिया में ,
ऐसे लोगों का प्रवेश नहीं है ,मेरी दुनिया में।
