नमस्कार दोस्तों और बहनों ! आजकल हम टेलीविजन पर एक कार्यक्रम देख रहे हैं -''बिग बॉस ''! बिग बॉस तो पहले भी आता था किन्तु इतना समझ नहीं आता था। हम सोचते थे -कि एक ही घर में इन सबको रखने का इनका उद्देश्य क्या है ? क्यों इन्हें परस्पर लड़वाते हैं ? क्यों ?इन्हें ये कार्य करने को दिए जाते हैं। किन्तु जब समझ में आया तो बहुत कुछ....... अपने कुछ विचार आप लोगों के सामने प्रस्तुत करना चाहती हूँ।
एक घर जिसमें भिन्न -भिन्न स्वभाव ,जाति ,व्यवहार के लोग उसमें रहते हैं किन्तु वे सभी ''बिग बॉस 'के लिए समान हैं। जिस प्रकार हमारा देश अथवा सम्पूर्ण संसार , जिसमें भाँति -भाँति के लोग रहते हैं। जिनका रहन -सहन ,सोच -व्यवहार ,यहां तक की उनकी बोली ,भाषा ,धर्म और मज़हब सभी भिन्न -भिन्न हैं किन्तु उस ईश्वर ,भगवान ,के लिए सब उसकी बनाई पृथ्वी पर निवास करते हैं और सभी मानव उसके लिए समान हैं।
''बिग बॉस ''जो सभी को कैमरे की नजर से देखता है ,उसकी इतनी आँखें बनी हुई हैं ,कि कोई कितना भी अपने को पर्दों में रख ले ,कहीं भी चला जाये किन्तु बिग बॉस की नजरों से नहीं बच सकता। इसी तरह हमारा वो ईश्वर है ,वो हमें अपने घर यानि पृथ्वीवासियों को अनेक कैमरे जैसे नजरों से देखता रहता है। और उसके घर में रहने वाले हर प्राणी के कर्मों का लेखा -जोखा उसके खाते में लिखा जाता है। यहाँ तक की उसकी गहरी नजरों से व्यक्ति की सोच ,उसका स्वभाव उसके कर्म नहीं छिप पाते।
इंसान होकर , इंसानों की नजरों से तो बच सकता है किन्तु वो जो ऊपर बैठा ''बिग बॉस ''है जो किसी को दिखाई नहीं देता किन्तु उसे सभी के कर्म दिखाई और सुनाई भी पड़ते हैं। उसने सभी की ज़िन्दगी के कार्य भी निश्चित किये हुए हैं ,उन कार्यों को वो मानव कितनी शिद्द्त से पूर्ण करता है ? उन्हें करते हुए ,रोता है या हंसकर पूर्ण करता है। उन कार्यों को करते समय उसके पीछे की सोच ,उस कार्य को करने के पीछे उद्देश्य क्या है ?यही है ,''बिग बॉस। ''
दीदी ! आज कैसे ''बिग बॉस ''का जिक्र आ गया ?
अब तुम्हें क्या बताऊँ ?पहले तो ये खेल मुझे समझ ही नहीं आता था किन्तु अब इसे समझने लगी हूँ। इसमें मैंने देखा और महसूस किया -घर हो या देश....... ये तभी चलता है ,जिसमें एक बॉस यानि बड़ा हो और वो घर के सभी सदस्यों से निष्पक्ष भाव से ,एक जैसा व्यवहार करे और समय आने पर दंड का भी प्रावधान हो।
ये तो आप सही कह रहीं हैं ,पहले घर में बड़े -बूढ़े होते थे ,उनके ड़र के साथ -साथ उनका लिहाज़ भी था ,तब कुछ भी गलत करने से पहले ,चार बार सोचते थे- कि हमारे इस कर्म का हमारे घर -परिवार ,रिश्तों और समाज पर क्या असर होगा ? किन्तु आधुनिकता के नाम पर आजकल बड़ों की तो कोई सुनता ही नहीं ,वरन अब तो इतनी बुरी हालत हो गयी है ,जब घर के बड़े टोकते हैं तो बच्चे चिढ जाते हैं। ज़िंदगी में ,दखलंदाजी पसंद नहीं है ,रेनू बोली।
दीदी !आजकल तो हालात इतने बिगड़ चुके हैं , या तो बड़े -बुजुर्ग शांत हों ,चुपचाप तमाशा देखते रहें वरना..... बच्चों के नाम सब कुछ कर ,वृद्धा आश्रम में बाकि का जीवन व्यतीत करो।
कुछ लोग ,तो अपने घर के बड़े -बूढ़ों को सड़क पर ही छोड़कर चले जाते हैं ,इसीलिए तो घरों का नाश हो रहा है। बहुएँ -बेटियां सर पर पल्ला लेना तो दूर ,कम कपड़ों में ,घूमती नजर आ जाती हैं। अब इनसे कोई पूछे ,ये किस फ़िल्म की अभिनेत्री हैं ? वो लोग तो ऐसे कपड़े कहानी की मांग के आधार पर पहनती हैं। कहानी की मांग होगी तो साड़ी भी पहनेंगी किन्तु ये हमारी आने वाली पीढ़ी बड़ों का कहा तो सुनती ही नहीं। हम ये नहीं कहते -कि तुम दक़ियानूसी बनो ,कुछ भी पहनो किन्तु सभ्यता के दायरे में तो रहो। कभी -कभी सोचती हूँ , हमारे जो बड़े -बूढ़ों का नियंत्रण था ,वो सही था नंदिनी हताश से स्वर में बोली।
तभी एक तेज स्वर गूंजा -मम्मी..... मम्मी...! तब तक एक लड़की कमरे के अंदर आ चुकी थी। उसने ''वनपीस 'पहना हुआ था। शायद वो किसी कार्यक्रम में जाने के लिए तैयार होकर आई थी। सभी उसे देखने लगीं उसने इधर -उधर नहीं देखा और सीधे ,अपनी माँ से बोली -मम्मी मेरी ''वॉच ''नहीं मिल रही। मैं इतनी देरी से परेशान हो रही हूँ और आप यहाँ आ गयीं यह कहकर ,उसने सभी की ओर देखकर ,नजरअंदाज कर बोली आप जल्दी चलिए ,मुझे जाना भी है।
वो तो अपनी मंम्मी को लेकर गयी किन्तु हमारे दिलों में कई प्रश्न चिन्ह छोड़ गयी। अब हमें महसूस हुआ नंदिनी जी ,एक आम बात नहीं बल्कि अपना दर्द ही सुना रही थीं। उनकी बेटी के व्यवहार से लगा ,न ही उसे कोई राम -रहीम करने की तहज़ीब ,तेज स्वर में बोलना, किसी की न सुनना। यही सब उसने सीखा है ,पढ़ी -लिखी भी है ,कम्पनी सेक्रेटरी की पढ़ाई की है किन्तु शिक्षा ने सिर्फ उसे एक पैसा कमाने के माध्यम के सिवा वो कुछ नहीं सीख़ पाई। पढ़ाई करो ,और फिर माता -पिता की न सुनना ,ये सिर्फ नंदिनी के घर की कहानी नहीं वरन न जाने कितने घर बिना'' बिग बॉस ''के चल रहे हैं या सिर्फ सिसक रहे हैं।
आजकल की शिक्षा ,सिर्फ़ कमाई का जरिया बनी हुई है ,घरों से संस्कार मिलते हैं ,घर के बड़े -बुजुर्गों का लिहाज़ रहता है। बड़े -बूढ़े तो घरों में रहते ही नहीं ,माता -पिता दोनों ही कमाने जाते हैं ,तब सँस्कार की घुट्टी कौन पिलाये ?अंग्रेजी स्कूल में शिक्षा ,घर पर फोन या फिर दोस्त ,ऐसी परवरिश के साथ ,बच्चा क्या सीखेगा ?ऋतु ने सबकी तरफ देखते हुए पूछा।
अब आप ही सोचिये -ये जो टेलीविजन पर ''बिग बॉस ''आ रहा है ,यदि ''बिग बॉस ''ही न हो ,उसके दंड़ का भय ही न हो ,तब इस घर का क्या हश्र होगा ? ये जो संसार चल रहा है ,उस संसार को चलाने वाले का ड़र ही न हो तो.......
अच्छा !चलिए ,अब इस चर्चा को यहीं समाप्त करते हैं ,किन्तु हमारी ये चर्चा कुछ लोगों के लिए कुछ प्रश्न छोड़कर और कुछ को जबाब देकर समाप्त होती है , धन्यवाद !
