Tlash zindgi ki !

पूरी उम्र गुज़ार दी ,ज़िंदगी की तलाश में ,
ज़िंदगी भी न जाने ,कहाँ छुपकर बैठी है ?
न जाने , किस आस में..... ?
कभी दिखती, किसी की मुस्कुराहट  में। 
कभी दिख जाती ,किसी की उम्मीदों में। 
कभी वो दिखी ,ज़िंदगी  के थपेड़ों में। 
कभी खो जाती ,सुनहरे ख्वाबों में। 
दिखलाई देती, किसी की ख़ुशी ,ग़म में। 
कभी ज़िंदगी मुस्काई ,कभी दुखदाई है। 
कभी लगती ,कड़वी करेले जैसी ,
कभी ज़िंदगी ने ,मीठी तान भी सुनाई है। 
उसके मुस्कुराते लबों पर ,
ज़िंदगी नज़र आई है। 
मेरे बहते अश्कों ने समझा ,
ज़िंदगी किसी की भी समझ नहीं आई है। 
उम्रभर यूँ ही लुका -छुपी खेलती रही ,
ख़ुशी में ,ग़म में ,कभी हाथ नहीं आई  है। 
 
laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post