पूरी उम्र गुज़ार दी ,ज़िंदगी की तलाश में ,
ज़िंदगी भी न जाने ,कहाँ छुपकर बैठी है ?
न जाने , किस आस में..... ?
कभी दिखती, किसी की मुस्कुराहट में।
कभी दिख जाती ,किसी की उम्मीदों में।
कभी वो दिखी ,ज़िंदगी के थपेड़ों में।
दिखलाई देती, किसी की ख़ुशी ,ग़म में।
कभी ज़िंदगी मुस्काई ,कभी दुखदाई है।
कभी लगती ,कड़वी करेले जैसी ,
कभी ज़िंदगी ने ,मीठी तान भी सुनाई है।
उसके मुस्कुराते लबों पर ,
ज़िंदगी नज़र आई है।
मेरे बहते अश्कों ने समझा ,
ज़िंदगी किसी की भी समझ नहीं आई है।
उम्रभर यूँ ही लुका -छुपी खेलती रही ,
ख़ुशी में ,ग़म में ,कभी हाथ नहीं आई है।
