अभी तक आपने पढ़ा ,शैलेश रूहाना की तलाश में ,घर से शीघ्र ही निकलता है। नंदिनी आज उस तुषार से मिलने जाने वाली है। दिन जब निकलता है ,कुछ लोगों के लिए खुशियाँ लाता है ,कुछ को ग़मों की गर्त में धकेल देता है ,करे भी तो क्या ?ये जीवन ही ऐसा है ,किसी को समझ कहाँ आता है ?किन्तु सभी को अपनी -अपनी जिम्मेदारियां तो निभानी ही हैं। शैलेश जब उस स्थान की खोजबीन आरम्भ करता है ,तब उसे वहां कोई भी स्थान ,ऐसा नजर नहीं आता ,जहाँ आस -पास कोई बस्ती या गांव भी नहीं है। तभी उसे लगता है- ,शायद ये कोई छलावा अथवा जरूरतमंद तो नहीं।
नंदिनी तुषार के पास जाती है,और कहती है -ये तुम अच्छा नहीं कर रहे हो किसी की मजबूरी का लाभ उठाना ठीक नहीं।
तुषार एक पल के लिए ,उसकी तरफ देखता है और अपनी विजयी मुस्कान लिए ,एक तरफ खड़ा हो जाता है। और फिर कुछ समय पश्चात ,नन्दिनी से होटल में चलने के लिए कहता है -वो उसके पीछे ,किसी घायल हिरणी की तरह चल रह थी किन्तु उसकी आँखों से बरबस ही आंसू बहने लगे। आज मैं पता नहीं ,क्या करने जा रही हूँ ?ये सही है या गलत। मेरी नजर में तो गलत ही है किन्तु मम्मी -पापा को पता चला तो उन पर क्या बीतेगी ?उनकी नजरें नीची करने से पहले ,मैं मरना पसंद करूंगी। न जाने कितने विचारों ने उसे घेरा हुआ था ?उन विचारों में खोयी, वो कब होटल आ गयी ?उसे नहीं पता चला ,किन्तु आज ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल का उसे दंड़ मिलने जा रहा था।
उसकी आँखों में आंसू देखकर ,तुषार बोला -ये तुम क्या कर रही हो ?किसी ने तुम्हें इस तरह देख लिया तो शक़ हो जायेगा ,हो सकता है ,पुलिस को भी सूचना दे दे। यहाँ पुलिस आ गयी तो बहुत बदनामी होगी। हो सकता है ,मुझे पकड़कर भी ले जाये। जब मेरी जाँच होगी ,तब मुझे सब सच -सच बताना होगा और तुम्हारी वो तस्वीरें भी दिखानी पड़ सकती हैं। उसकी बातें सुनकर ,नंदिनी ने झट से आँसू पोंछें। तब वो उसके साथ अंदर होटल में गयी। तुषार ने ,पहले कोई ''पेय पदार्थ ''मंगवाया। नंदिनी ने इंकार भी किया किन्तु तुषार ने उसे पीने के लिए बाध्य किया।पहले तो उसने सोचा -कहीं न कहीं ,इसने मेरे ''ड्रिंक ''में कुछ मिला तो नहीं दिया होगा। फिर सोचा -जो भी होगा ,नशे में या बेहोशी में ही हो जाये ,सोचकर पी गयी किन्तु जैसा उसने सोचा था , उसका उसे कोई परिणाम न मिला।
उसके पश्चात ,तुषार ने खाना मंगवाया ,इस बात से ,नंदिनी खफ़ा हो गयी और बोली -मुझे नहीं खाना खाना। हम यहां किस उद्देश्य से आये हैं ?हम नहीं ,तुम उसने अपनी गलती सुधारते हुए कहा -तुम जो चा हते हो ,उसी कार्य पर अपना ध्यान लगाओ !
मेरी जान !क्यों खफ़ा होती हो ?इसीलिए तो माहौल बना रहा हूँ ,अपने को भी तो तैयार करना पड़ता है कि नहीं ,उसने ढिटाई से कहा।
खाना खाकर, वो एक कमरे की तरफ बढ़े ,कमरे की तरफ जाते हुए ,नंदिनी इधर -उधर देख रही थी। शायद किसी के देख लेना का डर हो। किसी तरह दोनों एक कमरे में पहुंचे ,तुषार ने दरवाजा बंद कर लिया ,उसके दरवाजा बंद करते ही, नंदिनी का ह्रदय काँप गया और उसका दिल किया कि वो रो दे ,बोली -मुझसे जो गलती हो गयी ,इसके लिए मुझे क्षमा कर दो ,उस बात की मुझे इतनी बड़ी सज़ा मत दो। तुषार कुछ देर कुछ सोचते हुए ,देर तक खिड़की के पास खड़ा बाहर देखता रहा।नंदिनी से कुछ नहीं बोला। नंदिनी ने भी शायद समझ लिया ,इस पर मेरे रोने -गिड़गिड़ाने का कोई असर नहीं होगा। बोली -क्या तुम बाहर देखने के लिए ही आये हो ?मुझे ये तो बताओ कि तुम चाहते क्या हो ?या अब मैं जाऊँ !
तुम क्या समझती हो ?तुमने मुझे क्या समझ रखा है ?मैं कोई बलात्कारी या गुंडा हूँ ,मेरी ज़िंदगी में बहुत परेशानियाँ आईं। मैं एक किसान का बेटा हूँ ,जो दिन में अपने पिता के साथ खेतों में काम करवाता था ,रात्रि में पढ़ता था। अपनी मेहनत के बल पर ,आज यहाँ तक पहुंचा हूँ। जब मैंने तुम्हे देखा -मेरे दिल के कोने में कहीं ,तुम्हारे लिए ,कोमल भावनाओं ने जन्म लिया ,एक उम्मीद जागी ,तुम जैसी पत्नी पाकर मैं धन्य हो जाऊंगा। तुम्हारे संग जीवन के सुंदर सपने सजाने लगा था। तुम मेरे ख्वाबों में बस गयी थीं। उन विचारों -ख्वाबों का परिणाम ये हुआ -एक दिन तुमसे अपने दिल की बात कह बैठा। किन्तु मैंने महसूस किया तुम्हें तो किसी की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं ,तुम तो अपने परिवार के पैसों ,पर घमंड करती घूम रही थीं। तुम्हें मेरा प्रेम या मैं पसंद नहीं आये, तो नम्रता से ,इंकार कर सकती थीं ,मैंने कोई जबरदस्ती तो नहीं की। किन्तु तुमने जब तक पूरी कक्षा में मेरा अपमान नहीं कर लिया। तब तक ,तुम्हारे अभिमान को शांति नहीं मिली। तुम्हें अपने सुंदर होने पर गर्व था ,अपने बाप के पैसे पर गर्व था और उसी अहंकार ने मेरे प्रेम को नहीं समझा। समझा नहीं चलो माना ,किन्तु अपमानित कर दूसरों को एहसास दिलाना कि मेरी सुंदरता पर भी कोई मरता है जिसे मैं तनिक भी महत्व नहीं देती।
उसकी बातें सुनकर ,नंदिनी को दुःख और अपनी गलती का एहसास तो हुआ ,किन्तु ''तीर तो कमान ''से निकल चुका था। वो रो रही थी ,किन्तु अब हो भी क्या सकता था ?समय को बदला तो नहीं जा सकता था। अपनी गलती का एहसास होने पर ,नंदिनी बोली -अब तुम ही बताओ ?मै क्या करूं ?तुम्हारे कहने पर आ तो गयी।
तुम मेरे कहने से नहीं ,मेरे ड़र से आई हो। बात तो तब होती ,जब तुम अपने मन से ,प्रेम से मुझसे मिलने आतीं। मेरे ऐसे संस्कार ही नहीं ,कि मैं किसी की मजबूरी का लाभ उठाऊं ,इतना सब भी मैंने ,सिर्फ तुम्हें ये जतलाने के लिए किया है कि कोई सीधा है ,गरीब है ,उसका अपना भी मान -सम्मान है ,उसकी भी भावनाएँ होती हैं।
नंदिनी उसकी बातो को सुनकर अपने को कितना बोना महसूस कर रही थी ,इस दृष्टिकोण से तो उसने सोचा ही नहीं था।
क्या आज की रात ,नंदिनी की आखिरी रात होगी ,क्या तुषार उससे जबरदस्ती करेगा या विवाह करेगा ,जानने के लिए पढ़ते रहिये -''बरसात की वो रात ''

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