Kiski dulhan [part 12]

जब मोहिनी और भानु ने उस व्यक्ति के मुख से उसका नाम सुना, तो बुरी तरह चौंक गए।'' एक  ज़िंदा आदमी... जिसे दुनिया मरा हुआ समझती है।''वो आज यहां हमारे सामने खड़ा है, किन्तु कुछ भी पूछने का अब समय नहीं था क्योंकि सुरंग से कदमों की आवाज़ लगातार तेज़ होती जा रही थी। ऐसा लग रहा था ,जैसे कोई इधर ही आ रहा है - ठक... ठक... ठक...

ऐसा लग रहा था ,कोई एक इंसान नहीं ,जैसे चार-पाँच लोग, एक साथ चल रहे हों। रत्न प्रताप राजवीर का चेहरा पहली बार डर से भर गया।


उन्होंने बिना देर किये ,तुरंत कमरे की लालटेन बुझा दी ,पूरा तहखाना अँधेरे में डूब गया। उन्होंने मोहिनी और भानु से धीरे से फुसफुसाकर कहा -"एक शब्द भी मत बोलना !और ये टॉर्च भी बंद कर दो !"

भानु ने बिना देर किए टॉर्च बंद कर दी ,अब चारों तरफ़ गहन अंधकार था, इतना गहरा कि हाथ को हाथ भी नहीं सूझ रहा था। कुछ ही क्षण बाद...तहखाने के बाहर, लोहे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई -घर्रर...

किसी ने बाहर से दरवाज़ा नहीं खोला था बल्कि...ऐसा लगा, जैसे उसके बगल में कोई दूसरा गुप्त रास्ता खुला हो।

आश्चर्य और ड़र से मोहिनी की साँसें तेज़ हो गईं ,क्या इस तहखाने में आने का कोई दूसरा रास्ता भी है?"उसने मन ही मन सोचा।

धीरे-धीरे कई टॉर्चों की रोशनी सुरंग में घूमने लगी ,जैसे वो लोग किसी की तलाश में हों। दीवारों पर पड़ती रोशनी दरारों से छनकर कमरे के भीतर आ रही थी।

रत्न प्रताप ने, बहुत धीरे से लकड़ी की एक अलमारी को पीछे धकेला। वहां अलमारी के पीछे एक संकरा छिपा हुआ कक्ष था। तब रत्न प्रताप ने धीमे से कहा -"अंदर'' कहते हुए उस कक्ष में गए और उन दोनों को भी अंदर आने का इशारा किया।

मोहिनी  और भानु बिना आवाज़ किए ,उस छोटे से कक्ष में घुस गए। तब रत्न प्रताप ने, अलमारी वापस अपनी जगह लगा दी। अब वे तीनों एक बेहद तंग जगह में थे।

बाहर क्या हो रहा था? यह वे सिर्फ़ दीवार की छोटी-सी दरार से देख सकते थे।

कुछ ही सेकंड बाद...चार लोग,उस कक्ष में दाखिल हुए ,जिसमें अभी थोड़ी देर पहले वे तीनों [रत्न प्रताप  ,भानु और मोहिनी ] थे। उन चार लोगों में ,सभी ने काले रंग के लंबे कोट पहन रखे थे। चेहरे आधे नकाब से ढके हुए थे। उनमें से सबसे लंबा आदमी सीधे मेज़ के समीप गया। उसने मेज़ पर हाथ फेरा ,फिर अचानक रुक गया और बोला -यहाँ कोई आया था।"उसकी आवाज़ भारी थी।

दूसरे आदमी ने पूछा -आपको, कैसे पता चला ?"

उसने धूल की ओर इशारा किया ,यह धूल कल रात तक बराबर थी।"आज इसमें उँगलियों के निशान हैं।"

तभी वह नीचे झुका,फर्श पर बने पैरों के निशान ध्यान से देखने लगा। कुछ पल बाद उसने धीरे से कहा—"दो लोग हैं ,जिनमें एक लड़की !और एक पुरुष।"

उनका वार्तालाप सुनकर मोहिनी  का ह्रदय  ज़ोरों से धड़कने लगा ,मन ही मन सोच रही थी ,'अगर वे लोग अलमारी के पीछे देखने लगे...तो सब खत्म हो जाएगा।

लेकिन तभी...सबसे पीछे खड़े व्यक्ति ने कहा,"रत्न प्रताप राजवीर 'यहाँ नहीं है ,अगर होता....तो वह अपने निशान कभी नहीं छोड़ता।

लंबे आदमी ने सिर हिलाया -सही कह रहे हो ,ये दो जो कोई हैं ,लगता है ,नए हैं, फिर भी..."उसने कमरे में चारों ओर नज़र दौड़ाई और अपने साथियों को आदेश दिया -'आज से सुरक्षा दोगुनी कर दो।"और याद रखो...".लड़की को चाबी तक पहुँचने नहीं देना है ।"अब वह हमारे हाथ से निकल चुकी है।

यह सुनकर रत्न प्रताप ने, अपनी आँखें बंद कर लीं। जैसे उन्हें पहले से यही डर था। कुछ मिनटों के पश्चात, वे चारों वापस उसी गुप्त द्वार  से वापस चले गए।उनके कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होती चली गई।

जब पूरा सन्नाटा छा गया...तभी रत्न प्रताप ने एक गहरी राहत की साँस ली। उन्होंने धीरे से अलमारी हटाई, तीनों फिर से कमरे में आ गए।

भानु ने, पहले यही बात पूछी -ये लोग कौन थे ?"

'रत्न प्रताप' कुछ क्षण चुप रहे,फिर बोले,"ये किसी व्यक्ति के आदमी नहीं हैं।"ये...एक शपथ के आदमी हैं।"

मोहिनी को कुछ समझ नहीं आया और पूछा,-"मतलब?"

रत्न प्रताप ने, मेज़ पर रखा पुराना धातु का डिब्बा खोला -उसमें एक चाँदी का गोल प्रतीक रखा था। उस पर वही दो साँप बने हुए थे ,लेकिन इस बार उनके बीच अंक नहीं...एक आँख बनी हुई थी, इसे...".'रक्षक मंडल' का चिह्न कहते हैं।"

भानु ने पूछा -रक्षक ! किसके?"

रत्न प्रताप  हल्के से  हँसा ,यही सवाल आज से तीस साल पहले मैंने भी पूछा था और उसी दिन...मुझे मारने की कोशिश की गई।"

कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। मोहिनी ने धीरे से पूछा -आपको सब मरा हुआ, क्यों मानते हैं?"

रुद्र की आँखें कहीं दूर जाकर टिक गईं ,जैसे वो अतीत में चला गया हो। अतीत में झांकते हुए , वो बोला - क्योंकि...मेरी चिता सचमुच जली थी।"

भानु और मोहिनी अचम्भित हो एक साथ बोले  -क्या?"

दरअसल हुआ यह था ,जिस आदमी का अंतिम संस्कार हुआ था ,वो मैं नहीं था।"उस रात...एक निर्दोष आदमी मेरी जगह मर गया और दुनिया को यही दिखलाया गया, कि ''रत्न प्रताप राजवीर ''खत्म हो चुका है।"

भानु के मन में,ऐसे दर्जनों सवाल उठने लगे,लेकिन क्यों?"आपने वापस आने की कोशिश क्यों नहीं की?"

रत्न प्रताप ने उसकी ओर देखा और बोला - क्योंकि..."जिस दिन मैं बाहर आता...उस दिन तुम्हारे पिता सबसे पहले मारे जाते।

यह सुनकर भानु  का चेहरा एकदम बदल गया -"पिताजी?"

"हाँ" वैसे विक्रम दोषी नहीं था।"वो भी हमारी तरह ही एक 'मोहरा' था।"

मोहिनी को अब रत्न प्रताप की बातों में सच्चाई नजर आ रही थी ,तब उसने पहली बार वो डायरी आगे बढ़ाई और रत्न प्रताप से पूछा - क्या इसमें सारी सच्चाई है ?

रत्न प्रताप ने डायरी को देखा लेकिन उसको हाथ भी नहीं लगाया और बोला -नहीं ! उसमें सिर्फ़ शुरुआत है। "पूरा सच..! उन्होंने अपनी छाती पर हाथ रखा...अभी भी मेरे पास है ,मेरे सीने में दफ़्न है। 

तभी सुरंग की छत से महीन मिट्टी झड़ने लगी, रत्न प्रताप यह सब देखकर सतर्क हो गए ,उन्होंने ऊपर देखा और बोले -अब समय नहीं है।"उन्होंने तुरंत मेज़ के नीचे से एक कपड़े की थैली निकाली और मोहिनी को दे दी और बोले - इसे, अभी मत खोलना !"फिर उन्होंने भानु के कंधे पर हाथ रखा,आज से.....अपने पिता पर नज़र रखना।

भानु  तुरंत बोला -आपने अभी कहा- कि वो निर्दोष हैं।"

रत्न प्रताप ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया , निर्दोष हैं...लेकिन सुरक्षित नहीं।"

अचानक सुरंग के दूसरे सिरे पर एक तेज़ विस्फोट जैसी आवाज़ गूँजी - बूम !

उस आवाज से पूरी ज़मीन हिल गई ,पत्थर छत से टूटकर गिरने लगे। हालातों को समझते हुए ,रत्न प्रताप  ने ज़ोर से कहा -"भागो! अभी !"

भानु  ने मोहिनी का हाथ पकड़ा ,तीनों तेजी से सुरंग की ओर दौड़ पड़े ,अभी मुश्किल से दस कदम ही चले थे कि पीछे का रास्ता भारी चट्टानों से बंद हो गया।अब उनके सामने सिर्फ़ एक ही रास्ता बचा था—एक बेहद पुरानी, अंधेरी सुरंग...जिस पर जंग लगी लोहे की पट्टिका टंगी थी ,उस पर धूल जमी हुई थी।

भानु ने हाथ से धूल हटाई -उस पट्टिका पर उभरे अक्षर पढ़ते ही, रत्न प्रताप का चेहरा सफेद पड़ गया।उस पर लिखा था—"राजवीर हवेली ,निजी कारागार"और उसके ठीक नीचे...छोटे अक्षरों में लिखा था —"प्रवेश करने वाला... कभी वापस नहीं लौटता।"


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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