नमस्कार बहनों !आज तो सभी अपना त्यौहार मनाकर आई हैं। सालभर का त्यौहार है ,किसी -किसी का तो ,इतने व्यस्त जीवन के चलते ,इसी त्यौहार के बहाने ही अपने घर जाना हो जाता है ,वरना मायके का मुँह देखे ,कई बरस बीत जाते हैं ,माता -पिता रहते हैं , तो बेटी को बुलाते रहते हैं। कभी तो बेटी को समय नहीं ,''कुछ काम की व्यस्तता ,कुछ दिलों की दूरी ,कुछ स्थान की दूरी तय करनी मुश्किल हो जाती है '',जिसमें ये रिश्ते स्वतः ही दूर होते चले जाती हैं। माता -पिता के न रहने पर ,भाभी बुलाये ,न बुलाये ,ये उसके स्वभाव ,पर नर्भर करता है रस्म ही निभानी है तो डाक से भी राखी चली जाती है।
सावन का महीना है ही ,ऐसा ,जहाँ दो प्रेमियों के मिलन में सहायक होता है ,वहीं शादीशुदा महिलाओं को उनके मायके की स्मृतियाँ भूलने नहीं देता। कभी तीज ,कभी रक्षा बंधन ,स्वतंत्रता दिवस भी नज़दीक ही आ जाता है। इतने गर्मी ,नमी वाले वातावरण में भी लोगों का उत्साह कम नहीं होता। मेरी बहनें भी ,इस पवित्र त्यौहार को मना आज आई हैं ,चलो ! इनके अनुभव बाँट लेते हैं।
हमेशा प्रसन्न रहने वाली रेनू जी ,आज कुछ शांत हैं ,तभी चहकती हुई ,कांता जी आई उसके हाथों की मेहँदी बड़ी ही सुंदर लगी है। मैंने उनसे ही शुरुआत की ,और भई !कांता जी आपका त्यौहार कैसा मना ?सब ठीक..... उसने मुस्कुराते हुए , हाँ में गर्दन हिलाई और अपनी जगह पर जा बैठी।
तभी दीप्ती ने अपने अनुभव साझा किये ,यार देखो !ये साड़ी मुझे मम्मी ने दी है ,अबकी बार तो मेरी मुंबई वाली भाभी भी ,आई थी। सब एक साथ मिल गए ,रस्म के बाद खाना -पीना और मस्ती। बहुत दिनों बाद ,बच्चे भी आपस में मिले ,हालांकि एक -दूसरे के भाई -बहन लगते हैं किन्तु हमें बताने से पहले ही ,उन लोगों ने दोस्ती कर ली। मैंने समझाया भी ,कि तुम लोग ,आपस में बहन -भाई लगते हो किन्तु बोले -रिश्ते में तो हम ,बहन -भाई हैं किन्तु बुआ जी , दोस्ती का रिश्ता ,ज्यादा दिन और देर तक चलता है।
अब भई ,इसमें मैं क्या कर सकती हूँ ?तुम्हारा जैसा जी चाहे ,मुझे तो बस इस बात की ख़ुशी थी कि इतने दिनों बात मिले ,एक -दूसरे से जान -पहचान बढ़ी ,मेरी बहन भी आई हुई थी उसके बच्चे भी। पहले तो सभी एक -दूसरे को अपरिचितों की तरह देखने लगे फिर धीरे -धीरे बातचीत में मशगूल हो गए। मैं तो यही कहती हूँ -ये तीज त्यौहार ,शादी -ब्याह ,ये ऐसे मौक़े होते हैं जिनमें लोग एक -दूसरे से मिलते भी हैं। अपनी रस्मों का भी पता चलता है। इसी बहाने सबसे मिलना और जान -पहचान भी हो जाती है। लो जी !आप भी मिठाई खाइये ये मथुरा के पेड़े हैं ,मेरे जीजाजी लाये थे।
उनकी ख़ुशी ,उनके चेहरे से ही ,झलक रही थीं ,सभी से मिलना भी हो गया। तब मैंने रेनू जी से पूछा -आज आप कैसे शांत हैं ?क्या आप अपने घर नहीं गयी ?वो थोड़ा झिझकीं और उन दोनों की तरफ भी देखने लगीं। यहाँ हम सभी बहनें हैं ,अपनी ही हैं ,जो भी दिल में भरा है ,निकाल सकती हैं।
तब रेनू बोली -मैं भी ,अपने घर गयी ,मिठाई भी ले गयी ,राखी भी। किन्तु भाभी ने ऐसी साड़ी दी है ,उसे न ही मैं पहनूँ ,न ही किसी को दे सकती हूँ ,जब मुझे ही अच्छी नहीं लगी तब मैं कैसे किसी और को दे सकती हूँ। कहने को तो मेरे भाई हैं ,किन्तु उन्हें इतनी भी शर्म नहीं,कि सालभर में बहन एक दिन के लिए आई है ,कुछ देना ही है ,तो ठीक सा दे दें। मैं कितने उत्साह से गयी थी किन्तु उनके व्यवहार ने ,मन क्षुब्ध कर दिया। बड़ा सोचता है -छोटा देगा ,छोटे की बहु कहती है -क्या सारी ज़िम्मेदारी हमारी ही बनती है ? उनके इस व्यवहार से ,मेरा तो रिश्तों से विश्वास उठने लगा। भाई को मिठाई में ''काजू कतली ''लेकर गयी थी। आप तो जानती ही हैं ,कितनी महंगी है ?दोनों भाईयों ने भी ,मिलाकर जैसे ,हिसाब लगाया हो ,उतने ही पैसे दे दिए।आज उनका मन अत्यंत दुखी था ,बोलीं - ऐसे रिश्तों से तो ,रिश्ते न ही हों ,तोअच्छा है।
हैं ..... दीदी !ये क्या कह रही हो ?रिश्ते हैं ,तभी तो आप गयीं ,हाँ ये बात अलग है ,वहाँ उन लोगों के व्यवहार से वो प्रेम -अपनापन आपको नहीं मिला। जिसकी आपने अपेक्षा रखी हो किन्तु आप ये तो सोचो !जिनके भाई ही नहीं है ,उन बहनों के दिल पर क्या बीतती होगी ?कांता बोली -वो उम्मीद करती हैं ,काश...... आज के दिन के लिए ,मेरा एक भाई तो होता जिसकी सूनी कलाई को ,मैं अपनी राखी से सजाती ,उससे लड़ती ,अपनी पसंद का उपहार मांगने का अधिकार रखती। कांता ये सब बताते हुए थोड़ा भावुक हो गयी।
क्या मतलब ?क्या तुम्हारे भाई नहीं है ?
नहीं ,तब तुमने ये त्यौहार कैसे मनाया ?गरीब बच्चों को राखी बांधकर ,और अपने फ़ौजी भाइयों को राखी भेजकर ,मेरे लिए ये त्यौहार ,घर तक ही सीमित नहीं ,रिश्तों से बंधा नहीं ,वरन पूरा देश ही मेरा है। गरीब बच्चों को ''रक्षा सूत्र ''बांधते हुए ,मैं सोचती हूँ -जब तक मेरे ,बस में होगा ,मैं इन लोगों की सहायता करूंगी ,इनकी शिक्षा में मदद करूंगी ,इन्हें जागरूक नागरिक बनाने का भरसक प्रयास करूंगी। रक्षा का कार्य भाइयों का ही नहीं वरन बहनें भी रक्षा कर सकती हैं। फ़ौजी भाई तो देश की शान हैं ही ,वो तो सम्पूर्ण देश के लिए सरहद पर हैं ,एक ''रक्षा सूत्र ''तो उनके लिए भी बनता है।
तभी मुझे भी एक किस्सा स्मरण हो आया ,मैंने कहा -''रक्षा सूत्र '' भाइयों को बाँ धा तो जाता है किंतु समय आने पर बहन भी पीछे नहीं रहती। एक लड़की ने ,अपने घर की आर्थिक सहायता ही नहीं की वरन उसके भाई को ,बहुत बड़ी बीमारी हो गयी थी ,तब उसी बहन ने अपना खून भी दिया और पैसे से सहायता भी की। हमारे देश में आज भी ,बहुत सी बेटियां ऐसी हैं ,जो बेटों से भी ज्यादा अच्छे कार्य कर रही हैं ,जिन बेटों ने माता -पिता को घर से निकाल दिया ,उन्हें भी बेटे की तरह ही ,अपना फ़र्ज निभा रही हैं। बस आवश्यकता है तो बस एक अच्छी सोच की।
बस यहीं इति करती हूँ ,रिश्ते अच्छे या बुरे नहीं होते बल्कि लोगों की सोच ,अच्छी या बुरी होती है और उसी सोच के आधार पर ,बने रिश्ते भी बिगड़ जाते हैं ,बिगड़े रिश्ते भी ,सम्भल जाते हैं।
