रत्न प्रताप ,भानु और मोहिनी अभी बातें ही कर रहे थे ,तभी उन्हें लगा जैसे इस तहखाने की तरफ कोई बढ़ रहा है। वो कोई एक व्यक्ति नहीं था ,चार लोग थे, किन्तु ये तीनों एक अलमारी के पीछे छुप गए। उन्हें एहसास हो गया था ,कोई तो था, जो यहाँ आया है। इसलिए वो लोग ,चुपचाप वहां से चले तो गए किन्तु तभी बाहर कोई बड़ा धमाका हुआ और सुरंग का दरवाजा बंद हो गया।
"भागो!"रत्न प्रताप सिंह की आवाज़ पूरे तहखाने में गूँज उठी ,वरना यहीं कैद होकर रह जायेंगे।
भानु ने, बिना एक पल गंवाए , कसकर मोहिनी का हाथ पकड़ लिया। तीनों उस पुराने लोहे के दरवाज़े की ओर दौड़ लगाने लगे, जिसके ऊपर जंग लगी, पट्टिका पर लिखा था—"राजवीर हवेली –'' निजी कारागार"
पीछे से पत्थरों के गिरने की आवाज़ लगातार बढ़ती जा रही थी। धड़ाम! एक विशाल चट्टान ठीक उसी जगह गिरी जहाँ कुछ क्षण पहले वे लोग खड़े हुए थे। यह देखकर मोहिनी काँप गयी ,वो सोच रही थी ,अगर हमें थोड़ी भी देर हो जाती ,हम उस चट्टान के नीचे होते।
रत्न प्रताप ने, तुरंत लोहे के भारी दरवाज़े को पूरी ताकत से धक्का दिया किन्तु दरवाज़ा खुलने का नाम नहीं ले रहा था ,तब भानु ने भी धक्का लगाया ,मुश्किल से खुला किन्तु खुल गया। तब तीनों के भीतर घुसते ही रत्न प्रताप ने, उसे बंद कर दिया। अगले ही पल बाहर की सुरंग पूरी तरह ढह गई। कुछ क्षणों तक कोई कुछ नहीं बोला,क्योंकि तीनों की साँसें तेज़ चल रही थीं।
जब उन लोगों को लगा ,अब वे सुरक्षित हैं ,तब मोहिनी ने, पहली बार चारों ओर नज़र उठाकर उस स्थान को देखा । यह जगह किसी तहखाने से ज़्यादा एक पुरानी 'जेल' जैसी लग रही थी। दोनों ओर लोहे की सलाखों वाली छोटी-छोटी कोठरियाँ थीं। छत मेहराबदार थी और दीवारों पर सीलन की मोटी परत जमी हुई थी। हवा में जंग, धूल और नमी की मिली-जुली गंध थी। दूर कहीं, पानी की बूँदें टपकने की लगातार आवाज़ आ रही थीं - टप... टप... टप...
रत्न प्रताप राजवीर ने धीमे स्वर में मुस्कुराकर कहा -"स्वागत है !"...राजवीर परिवार के सबसे बड़े पाप में।"
भानु ने अविश्वास से पूछा -यह जगह आखिर है ,क्या ?"
रत्न प्रताप राजवीर कुछ पल चुप रहे ,फिर बोले -"इस हवेली के इतिहास की वह किताब...जिसका हर पन्ना खून से लिखा गया है।"बाहर तख़्ती पर नहीं पढ़ा ''निजी कारागार''
चलो !आगे बढ़ते हैं , धीरे -धीरे तीनों आगे बढ़ने लगे।पहली कोठरी खाली थी,जिसमें सिर्फ़ एक टूटी हुई चारपाई पड़ी थी। दूसरी में दीवार पर नाखूनों से कुछ लिखा गया था।
मोहिनी ने टॉर्च की रोशनी उस पर डाली ,शब्द मुश्किल से पढ़े जा रहे थे—"मैं चोर नहीं था..."उसके नीचे लिखा था —"मैंने सिर्फ़ सच देखा था।"
कोई अपनी बेग़ुनाही साबित करना चाहता था किन्तु फिर भी उसको कारागार में डाल दिया गया ,ये सब पढ़कर मोहिनी के रोंगटे खड़े हो गए।"यह किसने लिखा होगा?"
रत्न प्रताप सिंह ने उत्तर दिया - जिसे इस परिवार ने दुनिया से ही गायब कर दिया।"
आगे तीसरी कोठरी आई , उसका दरवाज़ा आधा खुला हुआ था।अंदर ज़मीन पर लोहे की टूटी हुई बेड़ियाँ पड़ी थीं।
भानु नीचे झुका और उन बेड़ियों को देखते हुए बोला -"ये बहुत पुरानी हैं।"
रत्न सिंह ने सिर हिलाया, हाँ आख़िरी बार इनका इस्तेमाल......सिर्फ़ अट्ठाईस साल पहले हुआ था।"
"किसके लिए?"भावुक होकर भानु ने पूछा किन्तु रत्न प्रताप ने कोई जवाब नहीं दिया।
मोहिनी की नज़र अचानक फर्श पर पड़ी। धूल की मोटी परत पर ताज़ा जूतों के निशान बने हुए थे।वह तुरंत रुक गई।
"रत्न प्रताप जी..."यह देखिए।"
रत्न और भानु दोनों नीचे झुके ,निशान बिल्कुल नए थे। जैसे कोई कुछ घंटे पहले ही वहाँ से गुज़रा हो।भानु ने गंभीर स्वर में कहा,"मतलब..."हमारे आने से पहले भी कोई यहाँ था।"
भानु का चेहरा कठोर हो गया।"या...".अब भी यहीं है।"उसने अनुमान लगाया।
तीनों ने बिना आवाज़ किए आगे बढ़ना शुरू किया। गलियारा मुड़कर एक गोल कक्ष में पहुंच गया। वहाँ उस कक्ष के बीचों-बीच एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी ,उस पर धूल नहीं थी,मानो कोई हाल ही में उस पर बैठा हो। कुर्सी के सामने पत्थर की मेज़ थी। मेज़ पर एक शतरंज की बिसात बिछी हुई थी।
सफेद और काले मोहरे अपनी जगह पर रखे थे,लेकिन खेल अधूरा था।राजा घिर चुका था।एक चाल बाकी थी।
मोहिनी ने हैरानी से पूछा,"इतनी पुरानी जगह में...".यह किसने लगाया?
रत्न प्रताप ने धीमे स्वर में कहा,"जिसे इंतज़ार करना आता है।
भानु ने एक मोहरे को छूने के लिए हाथ आगे बढ़ाया ही था ,तभी "नहीं! रत्न प्रताप लगभग चिल्ला पड़े।
भानु ने तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया।
इस जगह किसी भी चीज़ को बिना सोचे मत छूना !
"क्यों?"
"क्योंकि यहाँ हर चीज़...किसी वजह से रखी गई है।"
उसी समय गलियारे के दूसरे सिरे से बहुत हल्की सी आवाज़ आई। जैसे किसी ने धीरे से खाँसा हो।तीनों एक साथ उधर देखने लगे। टॉर्च की रोशनी अँधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ी ,लेकिन वहाँ कोई नजर नहीं आया । सिर्फ़ आख़िरी कोठरी का दरवाज़ा...जो कुछ क्षण पहले बंद था...अब थोड़ा-सा खुला हुआ था।चर्र...
वह अपने-आप और खुल गया। मोहिनी ने घबराकर अनायास ही ,भानु की बाँह पकड़ ली।
भानु ने पहली बार उसका हाथ नहीं हटाया।उसने धीमे स्वर में कहा,"मैं आगे चलता हूँ।"
रत्न प्रताप ने सिर हिलाया ,"नहीं" हम तीनों साथ चलेंगे।"तीनों सावधानी से आख़िरी कोठरी तक पहुँचे।
अंदर अँधेरा था ,भानु ने टॉर्च भीतर घुमाई ,दीवार पर जंग लगी ज़ंजीरें थीं। एक टूटी हुई मेज़ और सामने...पत्थर की दीवार पर किसी ने बड़े अक्षरों में कोयले से लिखा था—"अगर तुम यह पढ़ रहे हो....तो समझो, असली जेल अभी शुरू हुई है।"उसके ठीक नीचे एक ताज़ा लाल निशान बना था। जैसे किसी ने कुछ ही घंटे पहले उँगली से बनाया हो। तीनों अभी उस निशान को देख ही रहे थे कि...गलियारे के पीछे से फिर वही कदमों की आवाज़ सुनाई दी।ठक...ठक...ठक...
लेकिन इस बार...आवाज़ उनकी ओर नहीं आ रही थी। ऐसा लग रहा था...जैसे कोई उनके पीछे खड़ा होकर...उसी गति से उनके कदमों की नकल कर रहा हो।
रत्न प्रताप ने बिना पीछे देखे, बहुत धीमे स्वर में कहा—"कोई भी....पीछे मुड़कर मत देखना।"
रत्न प्रताप के इस तरह कहने से दोनों बहुत ड़र गए ,पीछे देख नहीं सकते थे किन्तु बार -बार उन्हें ऐसा एहसास हो रहा था कोई तो है ,जो उनका पीछा कर रहा है। जब वो चलते तो ठक...ठक...की आवाज़ आती रुकते तो रुक जाती।
ये कैसी दुविधा है ? पीछे मुड़कर देख नहीं सकते और लग रहा है, हमारे पीछे कोई है, किन्तु किसी की स्वासों का एहसास भी नहीं हो रहा था। इच्छा तो बार -बार हो रही थी किन्तु वे अब तक रत्न प्रताप के कहे अनुसार ही चल रहे थे ,ऐसे समय में उन पर ही भरोसा किया जा सकता था।
