Kuprtha [part 2]

नमस्कार दोस्तों !ये बातें सिर्फ बहन ही नहीं ,हमारे दोस्त भी ग्रहण कर सकते हैं और अपने सुझाव भी प्रस्तुत कर सकते हैं। कल हमारी मीनाक्षी बहन बतला रही थीं कि हमारे रीति -रिवाज़ों में आडंबर ने अपना स्थान ले लिया  है।पढ़िए मीनाक्षी जी की जुबानी - ''हनीमून ''पर भी प्रदर्शन ,पहले शर्म के कारण पति -पत्नी से मिलन की बातों पर, शर्म से लाल हो जाते थे किन्तु अब तो घूमने जाते हैं उनकी भी एक अलग से फोटोग्राफ़ी होती है। और फिर उन तस्वीरों को माता -पिता ,या सास -ससुर साथ मिलकर देख रहे होते हैं और उन पर चर्चा भी चलती है।


मेरा उद्देश्य ,यहाँ ये बात बताने का नहीं है, कि क्या हो रहा है ?बल्कि ये बताने का है कि धीरे -धीरे कुछ कुप्रथाएं जन्म ले रही हैं। दिखावा ,प्रदर्शन अब कहीं ज्यादा हो गया है। लोग रात -दिन मेहनत कर रहे हैं ,पैसों के लिए ,किन्तु साथ ही ,उन्हें बर्बाद भी कर रहे हैं। एक तरफ तो वे ''दहेज ''प्रथा जैसी कुप्रथा का विरोध करते दिखाई देते हैं। दूसरी तरफ ,मंडप सजावट ,जयमाला पर नए -नए तरीक़े अपनाते हैं ,इत्यादि चीजों पर और भी न जाने ,कितना अनाप -शनाप पैसा ,दो दिनों में पानी की तरह बहा देते हैं।फिर 'चार दिन की चांदनी ''देखकर भी ये रिश्ते जीवनभर कहाँ निभा पाते हैं ?कई लोगों के मुँह से मैंने इस तरह की अनेक घटनाएं सुनी। इतनी धूमधाम से शादी की और तीन माह पश्चात ही ,तलाक हो गया। उनमें झगड़े आरम्भ हो गए। अब आप ही ये बताइये -ये कैसे विवाह हैं ?जिनमें विवाह की शालीनता ,उसकी गरिमा को नहीं बना पाते हैं। 

जब उस विवाह के महत्व ,उसकी गरिमा को ही नहीं समझेंगे तो कैसे रिश्ते निबाहेंगे ?उनके लिए तो विवाह भी एक खेल तमाशा है और फिर तलाक ,उसका हल ,निबाहना नहीं। विवाह की पवित्रता किसमें है? ,उसको कैसे मरते दम तक भी निबाहने का प्रयत्न करते थे। उन सात फेरों के वचनों का क्या महत्व है ?कुछ नहीं।

पहले हमारा जीवन चार अवस्थाओं और  संस्कारों में बँटा था -  बाल्यावस्था ,युवावस्था ,प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था। इसी तरह हमारे जीवन में चार आश्रम  भी महत्वपूर्ण स्थान रखते थे -ब्रह्मचर्य आश्रम ,गृहस्थ आश्रम ,वानप्रस्थ आश्रम और चौथा था  सन्यास आश्रम। इन सभी आश्रमों में सबसे महत्वपूर्ण आश्रम है -''गृहस्थ आश्रम'' किन्तु आज के समय में उस रिश्ते की ज़िम्मेदारियाँ और उस रिश्ते की मर्यादा ,पवित्रता का महत्व समाप्त होता जा रहा है। इस रिश्ते में ,जो हमारे पितृ ऋण ,मातृ ऋण ,देव ऋण इत्यादि ऋणों से पति -पत्नी दोनों ही इन्हें पूर्ण करते थे किन्तु आज पति -पत्नी किसी भी प्रकार की जिम्मेरियों को पूर्ण करना अपना उत्तरदायित्व नहीं समझते। न ही ,आपस में ही वो सम्मान रह गया है ,जो एक पत्नी अपने पति को ए ,जी ,कहकर देती थी। आजकल तो सीधे नाम लेतीं हैं और नाम लेते -लेते बात  कभी -कभी तू पर भी आ जाती है। और फिर बात बढ़ते -बढ़ते तलाक पर भी आ जाती है। जैसे खेल की तरह ,उन विवाह की रस्मों को किया उसी तरह खेलते -खेलते तलाक तक भी बात पहुंच जाती है क्योंकि आरम्भ से ही उस रिश्ते के प्रति वो सम्मान ,डाला ही नहीं जाता।

आजकल तो ,बड़े -बूढ़ों के कहने  पर विवाह कर भी लिया तो ,मात्र सैक्स पूर्ति पूर्ण करते हैं या फिर आगे वंशवृद्धि के लिए ये सब करते हैं। इन संबंधों में भी प्यार का वो एहसास ,इंतजार ,अपनापन ,- दूसरे के लिए सोचना,उसकी इच्छा -अनिच्छा का ख़्याल रखना  ,मनाना -रूठना नहीं -नहीं यहाँ मैं गलत बोल गयी। रूठना और मनाना तो अब भी चलता है।बाक़ी चीजों  के लिए तो समय ही नहीं है। किसे इतना समय है? ,कभी आठवीं -दसवीं में ऐसा किसी के लिए किया होगा अब इन चीजों का समय ही नहीं ,कौन खाली बैठा है। विवाह के समय आने तक तो ,स्कूल समय में ही काफ़ी अनुभव हो चुके होते हैं।पति -पत्नी को मनाने के लिए बाहर खाना खा आते हैं ,या फिर झगड़े बढ़ते ही जाते है। 

मैं  भी न ,किन चीजों को लेकर बैठ गयी ,मेरा उद्देश्य ,एक ऐसी कुप्रथा को लेकर था जो धीरे -धीरे हमारे बीच पनप रही है और हमें इसका आभास भी नहीं। वो है -व्यर्थ के प्रदर्शन ,आडंबर। सादगी से विवाह  हो तो ,जो पैसा बच जाये ,उसे बेटे -बेटी के नाम कर दें ताकि उनका  भविष्य सुरक्षित रहे। कल को अगर नौकरी नहीं है अथवा उसे व्यापार करना है तो वो पैसा वहां काम आये। 


पहले घर की बहुएँ घर की इज्ज़त, उस घर का मान होती थीं। विवाह में नाचने वाले बाहर से बुलवाये जाते थे या फिर महिलाओं के अलग से कार्क्रम होते थे ,जिनमें बहु से देवता के नाम पर गाना -बजाना करवाकर उसके हुनर की पहचान की जाती थी  किन्तु आजकल ,बहु -बेटे को नृत्य सिखाने  के लिए ,नर्तक बुलाये जाते हैं। उससे सीखने के पश्चात ही ,बहु -बेटा स्वयं ही ,मंच पर नृत्य करते दिखाई दे जाते हैं। जहाँ हमारी संस्कृति में अपने बड़ों के पैर छुए जाते थे ,उनके सम्मान में सिर पर पल्लू रखा जाता था। वहीं अब बहु -बेटा बारातियों के बीच कूल्हे मटकाते नजर आते हैं। ''हनीमून पर कहाँ जाना है ?वार्तालाप करते हैं।

मीनाक्षी जी की कुछ बातें तो.... मुझे भी अच्छी लगीं ,जैसे विवाह में आडंबर ज्यादा हो रहे हैं ,दिखावा अधिक है। कुछ लोगों को तो हम कहते सुनते हैं ,ये दिन रोज -रोज नहीं आते ,वहीं  भविष्य का न सोचकर ,व्यर्थ में पैसा बहाते हैं। ये तो मैं भी मानती हूँ कि विवाह एक बार होता है किन्तु कार्य वो करें आगे परेशानी भी न उठानी पड़े। एक -दूसरे को नीचे दिखाने की होड़ भी किसी' कुप्रथा 'से कम नहीं।     

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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