नमस्कार दोस्तों !आज मैं एक नई समस्या लेकर आई हूँ ,और वो समस्या पारिवारिक भी कह सकते हैं ,अपने बच्चों के भविष्य से जुडी भी मान सकते हैं। जो भी चाहें ,जिस रूप में भी लें ,मेरा उद्देश्य तो ,आप लोगों को ,कहने में तो , ये तो छोटी है किन्तु ये ही समस्या समय के साथ बड़ी भी बन जाती है। स्वाभिमान ,मान -अपमान की बात बन जाती है। जो कि समय रहते ही इसको नहीं समझा या संभाला ये बड़ी भी बन जाती है।
आज मेरी सभी सहेलियाँ लगभग आ ही जाएँगी ,मैं उनसे भी शायद इस विषय पर वार्तालाप करूं। लो !रेनुजी और मीनाक्षी जी तो आ ही गयीं। तृप्ति आज बड़ी प्रसन्न नज़र आ रहीं थीं ,हमने कारण जानना चाहा।
मेरे बेटे की नौकरी लग गयी है और अब तो वो ,अपने पापा से भी कहता है -पापा अब आपको कार्य करने की आवश्यकता नहीं, मैं कमाने लगा हूँ ,हमारे लिए तो जैसे उसके इस तरह के शब्द ही काफ़ी हैं कि उसने अपने परिवार के लिए सोचा तो...... तृप्ति प्रसन्न होते हुए बोली। वैसे अभी -अभी नई -नई नौकरी लगी है ,कम ही पैसे मिलते हैं ,आगे बढ़ेंगे ही।
भई !हमारी तरफ से आपको बहुत -बहुत बधाई ,रेनू ने कहा। अब तो इस मिठाई के साथ ,ही साथ बेटे की शादी की मिठाई भी शीघ्र ही खाने को मिलेगी।
आपके मुँह में घी -शक़्कर ,मैंने भी एक दिन इसी तरह बेटे से ज़िक्र किया था। पहले तो उसने मना कर दिया ,बोला -मम्मी अभी इतनी जल्दी क्या है ?अभी तो नौकरी लगी है किन्तु जब मैंने कहा -लड़की भी ढूँढ़नी पड़ती है ,वो क्या घर बैठे ही मिल जाएगी उसमें अभी एक या दो वर्ष भी लग सकते हैं। तब बोला -लड़की देखनी ही है ,तो नौकरी वाली ही देखना।
बस यहीं ''इण्डिया मात खा गया ''साधना अचानक से बोली।
कोई भी उनकी बात का अर्थ नहीं समझ पाया ,सभी ने,प्रश्नात्मक नजरों से उनकी तरफ देखा।
वो बोलीं -नहीं समझीं !
नहीं ,में सभी ने गर्दन हिलाई।
वो बोलीं -आजकल पढ़ी -लिखी ,नौकरी पेशा बहु सभी को चाहिए ,किन्तु इन्हीं लड़कियों में इतना अहंकार आ जाता है ,घर के काम की उम्मीद तो, उनसे छोड़ ही दो। बेटा कमाने लगेगा ,तो घर -परिवार के लिए सोचता और करता है। पहली बात तो ,आजकल लडकियाँ जब नौकरी पर लग जाती हैं ,तो कहेंगी -मुझे किसी की कोई आवश्यकता ही नहीं। अब मुझे किसी की जरूरत नहीं। ऐसे वाक्य अक्सर सुनने को मिलते हैं। मेरी एक सहेली है ,उसकी बेटी कमा रही है और अब वो विवाह के लिए ही मना करती है।घरवालों से कहती है -क्यों मेरी आज़ादी छीनना चाहते हैं ?मुझे किसी की जरूरत नहीं ,न ही विवाह करना है। जब लड़कियों के मन में ऐसी भावना घर कर गयी ,तो वो क्या ज़िम्मेदारी उठायेंगी ?क्या घर को अपना घर मानेंगी ?अब तो वे कमाने लगीं ,उन्हें किसी की आवश्यकता नहीं। ऐसी सोच लेकर घर में वो ही लड़की बहु बनकर आती है ,तब उसका क्या व्यवहार होगा ?
हाँ....... आज इसी समस्या पर तो ,हम वार्तालाप करने वाले थे।
जब घर का बेटा ,या आदमी कमाता है ,तो अपने परिवार और सबके लिए सोचता है किन्तु जब बेटी कमाने लगती है तो वो कहती है -मुझे किसी की आवश्यकता नहीं ,क्या ये बात यहीं समाप्त हो जाती है ? उसके अंदर ये भावना क्यों आई ? वो परिवार के लिए सोचकर , या मिलजुलकर साथ चलने के लिए क्यों नहीं सोचती ?इसी सोच के साथ ,जब उसका विवाह होता है ,तब भी उसके अंदर यही अहंकार रहता है और वो किसी से भी नम्रता से बात करना ,किसी भी दबाब में रहने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। ये इतना लम्बा जीवन है और सदा एक जैसा तो रहेगा नहीं ,न ही रहता है। तब ऐसी सोच के साथ कभी न कभी तो टकराव आना स्वाभाविक है।
मेरी मौसी की लड़की है ,उसका इसी कारण से तलाक़ हो गया ,कोई बात चल रही होगी। उसने कहा -तुम कमा रहे हो ,तो मैं भी कमा रही हूँ। उसके पति ने उससे नौकरी छोड़ने के लिए कह दिया ,तुम नौकरी छोड़ दो ,मैं सारे खर्चे उठाने के लिए तैयार हूँ ,तुम बस बच्चों का ख़्याल रखो। उसने भी जबाब दिया -बच्चे मेरे ही नहीं तुम्हारे भी हैं ,मेरी ही ज़िम्मेदारी नहीं ,तुम्हारी भी ज़िम्मेदारी बनती है। इस तरह तो गृहस्थी चलती नहीं है न ,''एक सेर दूसरा सवा सेर '' पति -पत्नी का रिश्ता तो कोई भी ऐसा नहीं होता ,जहाँ नोक -झोंक न हो ,किन्तु एक समय में, एक को तो शांत रहना ही पड़ता है तृप्ति जी ने बतलाया। अब तो मुझे भी डर लगने लगा है ,पता नहीं ,मेरे बेटे की बहु कैसी आएगी ?अब बहु घर में लाना भी ,समझो ''हाथी पालने के बराबर है। ''
उनकी बात सुनकर ,उनका ड़र देखकर सभी हँस दीं। और बोलीं -अभी से ये चिंता क्यों ?जब जैसी परिस्थिति होगी देखा जायेगा।अब सास -ससुर भी साथ नहीं रहते ,बच्चे अपने घर में जैसे चाहें ,लड़ें ,घर में बड़े हों तो समझा भी दें।
अजी ये न कहो ! तब उनकी परेशानियों के ज़िम्मेदार माँ -बाप हो जाते ,बच्चे भी अब बच्चे कहाँ रहे ?जो कोई बड़ा उन्हें समझाने बैठे रेनू बोली। अब जैसा भी है ,हम अपना कार्यक्रम क्यों ख़राब करें ?कहकर उन्होंने सबके सामने चाय रखी और स्वयं भी पीने लगीं। अच्छा दोस्तों ,हमने तो अपनी फ़िक्र को चाय की चुस्कियों में उड़ा दिया ,आपको जो उचित लगे ,समीक्षा दे सकते हैं।

