नमस्कार बहनों ! कुछ न कुछ तो, हम ले ही आते हैं। चलने का नाम ही जीवन है ,आगे बढ़ते जाना है किन्तु समाज में कुछ प्रथाएँ हैं, जिन्हें हम सहर्ष स्वीकार करते हैं ,किन्तु वो प्रथाएं भी ,कभी -कभी कुप्रथा का रूप ले लेती हैं। तब समाज के लोगों को ,तनिक सोचने की आवश्यकता पड़ जाती है ,कि प्रथा ''कुप्रथा'' में बदली कैसे ?किन्तु उस कुप्रथा को हम साथ लिए घूमते हैं और उस ओर तनिक भी , ध्यान ही नहीं जाता। जैसे -हमारे यहाँ विवाह एक प्रथा है ,लड़के लड़की को आपस में मिलने के लिए ,संग रहने के लिए ,समाज को आगे बढ़ाने के लिए ,''गृहस्थ आश्रम '' में प्रवेश पाने के लिए एक प्रथा ''विवाह ''से होकर गुजरना पड़ता है। ये ''सनातनधर्म'' में ही नहीं ,वरन सभी धर्मों के लोग, इस प्रथा को मानते हैं। कहीं इसे'' विवाह ',कहीं ''निक़ाह ''तो कहीं ''मैरिज ''.,शादी ,पाणिग्रहण ,गठबंधन ,इत्यादि नामों से पुकारते हैं किन्तु इस ''प्रथा के साथ ही एक ''कुप्रथा ''भी जुडी है ,वो आप सभी समझ रहे होंगे ''दहेज़ ''
'दहेज़ 'भी कोई कुप्रथा नहीं थी ,ये मात्र एक रस्म थी ,जिसमें माता -पिता अपनी बेटी को उपहार के रूप में ,अपनी हैसियत के हिसाब से ,धन -सम्पदा अपनी बेटी को प्रसन्न्तापूर्वक देते थे किन्तु जिनके पास पैसा नहीं होता ,उनके इस तरह ठीक से रस्म न निभा पाने के कारण ,लड़केवालों ने मांग आरम्भ की। कुछ लोग प्रसन्नता से दे देते ,कुछ लोगों पर आर्थिक भार अधिक पड़ा,तब इसका विरोध होने लगा और ये प्रथा अथवा रस्म ने 'कुप्रथा दहेज़ '' का रूप धारण कर लिया।
किन्तु हम यहाँ ,दहेज़ के विषय में ,चर्चा करने नहीं बैठे ,हम यहाँ ,उन विषयों पर चर्चा करने बैठे हैं ,जो धीरे -धीरे 'कुप्रथा 'का रूप धारण कर रही हैं। कल मीनाक्षी जी ,अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ विवाह में गयीं। भई, ख़ुशी का मौका है ,जाना तो बनता है ,किन्तु वहाँ से, वे कुछ उदासी लेकर आयीं। सब कुछ मैं ,ही बता दूँगी तो ये क्या बताएंगी ?इन्हीं से सुन लीजिये।
कल जब मैं उस विवाह में गयी ,मंडप बहुत सुंदर था ,हर चीज़ को एक ''थीम '' के तहत चुना गया। हल्दी पर सभी के एक जैसे वस्त्र ,मेहँदी पर अलग ,कैमरे वाले किसी चलचित्र की भाँति उनकी तस्वीरें निकाल रहे थे। किसी अभिनेता की तरह उन्हें घेरा हुआ था। दुल्हन ने भी ,महंगा लहंगा पहना हुआ था। जब वो तैयार होकर आई ,किसी परी से कम नहीं लग रही थी।हालाँकि इतनी सुंदर नहीं थी किन्तु महंगे से महंगी सजावट वाली तय की गयी थी ,ये उसी का परिणाम था।
दूल्हा -दुल्हन के लिए ,अलग मंच और उसकी सजावट भी विशेष थी। दोनों के लिए ,क्रेन मंगवाई गयी और उस पर बैठाकर जयमाला हुई। कुछ देर तक तो मैं भी ,अचम्भित सी उस साज -सज्जा को देखती रही। कुछ देर बाद ,ये सब मुझे बनावटी और खोखला नजर आने लगा। किसी फ़िल्म की शूटिंग के लिए सजाया गया सैट लगने लगा। इतना बड़ा आडंबर लग रहा था जिसमें उस पिता की मेहनत की गाढ़ी कमाई, व्यर्थ होते हुए दिखने लगी। जगह -जगह टेलीविजन लगे थे। कुछ लोग जैसे ,उन्हीं के रिश्तों में भी हो सकते हैं ,जो ऐसे स्थानों पर कभी गए ही नहीं ,उनके लिए तो जैसे ,वो मेले में टहलने आये हैं।
हालाँकि ये दिन रोज़ -रोज नहीं आते ,उसके पिता के पास ,इतना पैसा भी था या उसने जोड़ा था कि वो खर्च कर सकता था किन्तु एक मध्यवर्गीय परिवार की बेटी के सपने ,तो बस सपने ही रह जायेंगे। ऐसा विवाह देखकर ,उसका दिल भी चाहेगा कि उसका विवाह भी ,ऐसे ही धूमधड़ाके से हो ,किन्तु उस बाप की मजबूरी को कौन समझेगा ?जो इन सब सुविधाओं के लिए ,जीवनभर की पूंजी लगा देता है। क्या इन विवाहों में ,हमारी रस्में इतना महत्व रख पाती हैं ?ऐसा लगता है ,फोटो के लिए ,मात्र औपचारिकता है। ऐसे में ,उन संस्कारों ,रीति -रिवाज़ों का महत्व ,वो कहाँ समझ पायेगी ?ये तो मात्र उसके लिए ऐसी रस्में हैं ,जो माता -पिता पीढ़ी -दर पीढ़ी निभाते आ रहे हैं ,कुछ रस्मों का तो माता -पिता को भी स्मरण नहीं होता। उनसे बड़े ,या जो इन रस्मों के विषय में जानते हैं ,बताते हैं। कुल मिलाकर ,'विवाह ''एक संस्कार होने के बावजूद ,मात्र हँसी ख़ुशी और सजावट की वस्तु बनकर रह गया है।
वो देवताओं के गीत गाना ,सुबह से ही रस्मों में लग जाना ,बड़ी -बूढी कुछ अलग रस्में करतीं ,कभी धान की कभी हल्दी पीसने की रस्म ,घर में बन्ना -बन्नी गए जाते। अब तो जैसे किसी को स्मरण ही नहीं होंगे। अब तो डीजे पर फ़िल्मी गाने लग जाते हैं। कई बन्ना या बन्नी के गीत मैंने भी सुने हैं ,उनमें अपने रीति -रिवाज़ों के महत्व को समझाने के साथ -साथ ,अपने संस्कारों और ससुराल में कैसे निभाना है ?परिवार का मान -सम्मान बनाये रखना है ?गीत गाकर भी समझाया जाता था। मैं मानती हूँ ,आजकल तो लड़का -लड़की दोनों ही परिश्रम कर रहे हैं। इन नौकरियों में इतना समय ही नहीं मिलता कि वो आराम से और सही से अपने रीति -रिवाज़ों और संस्कारों को समझे। उनके लिए तो बस लड़का कमाता है ,लड़की कमाती है। तीन -चार दिनों की छट्टियों में सम्पूर्ण रस्में ,कैसे भी निपटा ली जाती हैं। उसमें भी रस्मों से ज्यादा तो, फ़ोन पर अधिक ध्यान रहता है।
बस कान पर फोन लगा है ,और रस्में कर रहे हैं ,पंडितजी क्या कह रहे हैं ?सही या गलत कुछ कह भी रहे हैं या फिर अपनी हाज़िरी ही देने आये हैं किसी को कुछ नहीं मालूम ,क्योंकि किसी के पास इतना समय ही कहाँ है ?पहले कम उम्र में विवाह होता था ,बालक अबोध होते थे ,उन्हें भी धीरे -धीरे विवाह की रस्मों और विवाह होने के कारणों का पता चलता था। अब तो विवाह के लिए ही ,समय नहीं है। तीस भी पार कर जाते हैं। जैसे -तैसे विवाह हुआ भी ,तो फोन पर पहले ही ''हनीमून ''की टिकट तैयार मिलती है।सभी कार्य शीघ्र अति शीघ्र होते हैं और रिश्ते भी उतनी ही शीघ्रता से टूटते नजर आते हैं। आज इतना ही ,अगले भाग में मिलते हैं।

