नमस्कार दोस्तों !आजकल बहनों की जगह 'दोस्तों' लिखना आरम्भ किया ,ताकि हमारी बातें ,जिन समस्याओं पर हम तर्क करते हैं ,नोक -झोंक करते हैं ,उन्हें हमारे अन्य दोस्त भी पढ़ सकें और अपनी समीक्षा दें। आज का विषय है -ख़ुशी या ग़म ,दुःख या सुख ,वैसे एक बात देखी जाये तो ,कोई भी वस्तु स्थिति अपनी वर्तमान स्थिति में है ,उसका विपरीत स्वभाव भी है। जैसे -रात है तो दिन भी है ,अँधेरा है तो उजाला भी है। मोटा है तो पतला भी है जीवन है तो मृत्यु भी है। मानव के जीवन में ये दोनों ही सदैव संग चलते हैं। दोनों ही स्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है। किन्तु फिर भी इंसान भरमाया रहता है और न जाने, किस बात पर अहंकार कर बैठता है ? पैसे का ,जो आज है कल नहीं ,ताक़त का ,वो भी चिर स्थाई नहीं है किन्तु उसे तो खुश होना है ,जबकि उसे मालूम होना चाहिए ,पलक झपकते ही गम भी पीछे खड़ा है और अपनी बारी की प्रतीक्षा में है।
आज हमारी बहन कृति बहुत प्रसन्न है , जानते हैं ,क्यों ?क्योंकि आज बहुत दिनों पश्चात, उसके जीवन में खुशियों ने अपना द्वार खोला है। आज उसे लड़के वाले देखने आये और उसे पसंद भी कर गए। बात यही प्रसन्नता की नहीं है वरन उन्होंने इसकी सोच, इसके काम को भी सराहा। जैसा वो चाहती थी। ऐसा नहीं कि इससे पहले उसके रिश्ते नहीं आये थे किन्तु वे लोग उसके पापा की हैसियत को देखते थे ,इसकी क़ाबिलियत को नहीं ,परिणामस्वरूप इसने भी ठान लिया जिस दिन मुझे और मेरी क़ाबिलियत को महत्व मिलेगा तभी उस लड़के से विवाह करूंगी। और आज वो दिन आ भी गया।
आपको बहुत -बहुत बधाई !समवेत स्वर उभरे। सभी प्रसन्न थे और कृति की लाई ,मिठाई का रसास्वादन लेने लगे।
अब भाभी जी ,कृति को सुख मिला है ,तब क्या दुःख भी इसकी प्रतीक्षा में खड़ा होगा ,बुरा नहीं मानिये ,ये सवाल थोड़ा अटपटा सा है किन्तु अभी इन्होने ही आरम्भ में कहा। रेनू जी का इस समय पर ये प्रश्न पूछना किसी को भी नहीं भाया किन्तु ज़बाब तो देना था।
अभी आपने ये क्यों नहीं सोचा ?इतने दुःख और परेशानियों के पश्चात ही , तो इन्हें ये सुख मिला है। ये जीवन तो एक मेला ही तो है ,जिसमें सुख -दुःख ,ख़ुशी ग़म ,सभी कुछ मुफ़्त में ही तो मिलता है। बस उनकी कीमत है ,आपके कर्म ,कर्मों के आधार पर ही तो सुख -दुःख तय होते हैं। ये बेवज़ह पीछे नहीं पड़ते। यदि आपके कर्म सही नहीं हैं ,आप चोरी ,कालाबाज़ारी ,किसी को सताना ,किसी का हक मारना जैसे कर्म कर रहे हैं और अभी आपको इन सबसे सुखानुभूति हो रही है किन्तु इन कर्मों के आधार पर ही ,दुःख की अनुभूति भी हो सकती है। हर दिन एक जैसे ही रहते।
जो हमारे अपने हैं ,उनके ग़लत कर्मों पर हम पर्दा तो डाल देते हैं ,किन्तु उनके लिए बुरा नहीं सोच सकते किन्तु उनके कर्मों का हिसाब तो उन्हें देना ही होगा। इसीलिए अपनों का हित चाहते हो, तो उन्हें पहले ही रोकना होगा। ताकि आपके समझाने पर थोड़ी परेशानी में ही ,सब ठीक हो जाये। किसी अपने को तुम गलत करते देख रहे हो , किन्तु उसे रोक नहीं रहे हो , उस गुनाह में तुम भी उतने ही ज़िम्मेदार हो ,तब आप उनके हितैषी नहीं, बल्कि दुश्मन हो कृतिका ने भी अपने विचार प्रस्तुत किये।
किन्तु एक बात तो है ,सुख कभी पैसे या धन से नहीं मिलता सुख तो अपने मन का होता है ,जिसमें भी आपको सुख मिले।धन से यदि सुख मिलता तो हर धनी व्यक्ति सुखी होता। किसी को सुख ,लिखने में मिलता है ,किसी को सुख सेवा भाव में मिलता है ,किसी को राजनीति में ,किसी को चित्रकारी में ,सुख की कोई परिभाषा नहीं। इसके विपरीत अवस्था आते ही दुःख आ जाता है। किन्तु इन दोनों का धन से कोई लेना देना नहीं , नेहा ने बताया।
इतना तो मैं भी समझती हूँ ,धन हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है ,क्षणिक सुख भी मिल सकता है किन्तु स्थायी नहीं कृति बोली।
वाह !हमारी बेटी कितनी समझदार हो गयी है ? रेनू उसका उत्साहवर्धन करते हुए बोली।
तभी अचानक से ,सुलेखा जी पीछे को लुढ़क गयीं ,पहले तो सबने समझा ,शायद संतुलन न बना हो किन्तु तभी ,सभी मुस्कुराते चेहरे ,एकदम से गंभीर हो गए।
तभी कृति बोली -आंटी जी का ,रक्तचाप निम्न हो जाता है ,इसीलिए ऐसा हुआ ,वो तो अच्छा हुआ घर में मशीन भी थी ,उनका रक्तचाप मापा गया।
कॉफी और ,मिठाई खिलाइये इन्हें ,तनु बोली।
सभी उनकी तीमारदारी में लग गयीं। कुछ समय पश्चात ,उनकी सेवा काम आई और उन्होंने आँखें खोलीं। उनके आँखें खोलते ही ,सभी के चेहरों पर फिर से मुस्कुराहट आ गयी।
तभी दीपा गुनगुनाने लगी -कभी ख़ुशी ,कभी ग़म.......
उसकी बात सुनकर सभी खिलखिलाकर हँस दीं।

