Barsat ki wo raat [part 13]

अभी तक आपने पढ़ा ,शैलेश रुहाना के लिए ,परेशान हो रहा था ,उसके सामने ही ,उसकी रुहाना गायब हो गयी थी। जबकि शहर में ,खबर फैली है कि ''भवदीय '' होटल में ,किसी जानवर ने एक आदमी का खून पीकर उसे मार डाला।लोग अटकलें लगा रहे हैं ,ये कार्य किसी पिशाचिनी या पिशाच का हो सकता है।  नंदिनी भी उस समय उसी ,होटल में तुषार  के साथ थी। उसने भी अपने ऊपर से जाते ,किसी परछाई को देखा था किन्तु समझ नहीं पाई ,कि वो क्या था ?शैलेश को ,इन सभी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ रहा ,वो तो अपनी रुहाना के लिए परेशान था। रात्रि में सोते ,समय उसे अपने घर की खिड़की में कोई परछाई दिखी ,जब वो खिड़की खोलता है ,तब उसे रुहाना दिखती है। मरते व्यक्ति में जैसे जान आ गयी ,वो तो प्रसन्न हो गया और उसने हाथ आगे करके ,अपनी रुहाना को अपने समीप बुला लिया। अब आगे -


रुहाना अब उसके पास थी, उसे देखते ही ,वो बहुत प्रसन्न हुआ और बोला -तुम गाड़ी से उतरकर अचानक किधर चली  गयी थीं ?मैं तुम्हें ढूँढ -ढूंढकर परेशान हो रहा था।वो बच्चों की तरह ,उससे शिकायतें करने लगा।  वो मुस्कुराई और बोली -अब तो तुम्हारे सामने हूँ। अब तुमसे मिलने हर रोज यहीं आ जाया करुँगी। शैलेश तो बहुत प्रसन्न हो गया और बोला -तुम कुछ खाओगी या पियोगी वो फिर से मुस्कुराई और बोली -नहीं ,मुझे तुम्हारा स्मरण हो रहा था इसीलिए मिलने चली आई ,मुझे लगता है ,अब तुम ठीक हो ,आओ मैं तुम्हें सुला दूँ और वो वहीँ उसके पलंग पर बैठ गयी और शैलेश का सर अपनी गोद में रख लिया और गुनगुनाने लगी। शैलेश को तो उसके स्पर्श मात्र से ही नींद ने अपने आग़ोश में ले लिया। जब वो गहरी नींद सो गया तब वो ,चली गयी। 

सुबह जब वो उठा ,तब बड़ा प्रसन्न था।उसने इधर -उधर देखा ,वो समझ नहीं पा रहा था कि वो एक सच्चाई थी या सपना !क्या वो सच में ,यहाँ आई थी। सपना था ,तो बहुत ही प्यारा यदि हकीक़त थी -तब वो आज भी आएगी ,यही सोचकर प्रसन्न था।  माँ को बड़ा सुकून मिला -आखिर उनकी मिर्ची और नमक से उसकी नजर उतारना सफल रहा।किन्तु आज भी ,समाचार पत्र में और टी.वी. पर एक और नई खबर थी। कल रात्रि में भी ,चाय की दुकान पर बैठे ,एक आदमी की फिर से हत्या हो चुकी थी। समझ नहीं आ रहा था ,कि ये हत्यायें कौन कर रहा है ?कहाँ से आता है और किधर को चला जाता है ?

आज नंदिनी ने फिर से तुषार को फोन लगाया ,कैसे हो ?

ठीक हूँ !!अब तो मैंने सारी तस्वीरें मिटा दीं ,अब क्यों परेशान हो ?

दिल से भी मिटा दीं !

उधर से कुछ देर तक ,कोई आवाज नहीं आई फिर तुषार बोला -मेरा दिल ,जिसे चाहे रखूं या मिटा दूँ ,तुम कौन होती हो ?ये सब पूछने वाली !

जिसकी तस्वीर रखी है ,वो तो पूछ ही सकता है। 

तुम्हें क्या पता ,किसकी तस्वीर है ,किसकी नहीं ?

भूल गए ,तुमने ही तो बताया था ,सभी तस्वीरें दिल में छुपा रखी हैं। 

वो तुम्हारी बात नही  थी ,तुम अब मेरी तरफ से आज़ाद हो। 

किन्तु मैं तो अब आज़ाद होना ही नहीं चाहती ,अब मैं कैद होना चाहती हूँ ,कहना तो ,वो बहुत कुछ चाहती थी किन्तु लब एकदम से खामोश हो गए और उसने फोन बंद कर दिया। अपने आप से ही मुस्कुराकर बोली -तुम्हारे दिल में ,तुम्हारी बाँहों में ,कहकर स्वयं ही लाल हो गयी। तभी उसे स्मरण हुआ ,उसने उस हत्या के कारण ही तुषार को फोन किया था। तभी वो बाहर आई और ये तो नहीं बताया कि उसने उसी होटल में किसी बड़ी सी चीज की परछाई देखी  थी ,बात को बदलते हुए बोली -एक दिन मैंने भी अपने घर की छत से किसी बड़े से साये को गुजरते देखा था। 

उसकी बात सुनकर शैलेश चौंक गया और घबरा भी गया कि कहीं  इसने ,रुहाना को तो नहीं देख लिया हो और उसे ही ये कोई बड़ी परछाई समझ रही हो। घबराकर बोला -पगली है ,क्या ?इधर कौन आएगा ?

भाई ,मैं यहाँ की बात नहीं कर रही ,कल छत से मैंने दूर किसी बड़े से पंछी को उड़ते देखा ,हो सकता है ,वही लोगों का खून पी  रहा हो। 

आश्वस्त होकर ,शैलेश बोला -तू भी बहुत उछलती -कूदती रहती है ,अब घर में रहा कर ,कहीं अगला नंबर तेरा ही न हो। 

नंदिनी बोली -कोई ''हेंडसम ''सा पिशाच हुआ तो मैं उससे शादी कर लूँगी और यदि ''पिशाचिनी ''हुई तो मैं उसे अपनी भाभी बना लूंगी। वो मेरे चिकित्सक भाई के लिए खून का इंतजाम किया करेगी ,लोगों के खून चूस -चूसकर तुम्हें लाकर दिया करेगी। 

कविता जो अभी तक उन दोनों की बकवास सुन रही थी ,उसकी नजर में दोनों ही बकवास कर रहे थे। दोनों से बोली -हमारे सिर पर ख़तरा मंडरा रहा है ,और तुम दोनों को मस्ती सूझ रही है। अब तुम दोनों समय से ही अपने घर आ जाया करो। आज ही ,पंडितजी से मिलकर कुछ उपाय पूछती हूँ ,वो मन ही मन बुदबुदाई।

अगले दिन कविता ,पंडितजी के पास गयी


,उन्होंने बताया -बेटे के ग्रह काफी संकटमय हैं ,विपदा पता नहीं, किस तरह से, किस रूप में आ जाये ?इस दुःखद समाचार के बाद ही उन्होंने एक खुशखबरी भी उन्हें सुनाई -जैसी लड़की आप चाहती थीं ,ऐसी ही एक लड़की ,हमें मिली है। आप उसे देख लीजिये और पसंद आ जाये तो बात आगे बढ़ाइए। अब शैलेश के तीस बरस के होने में दस दिन बाक़ी है ,शायद इस संजोग से ,उस पर आई बुरी बला भी टल जाये।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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