लगाती हूँ, बिंदिया ! पहनती हूँ ,चूड़ियां !
मुस्कुराती हूँ ,एक रिक्त स्थान तेरी यादों का।
सजती -संवरती हूँ ,दिन -रात कटते हैं ,मगर ,
रिक्त स्थान,जो भरा तेरी चाहत की 'उम्मीदों' में।
रातों को तारे गिनती हूँ , लोगों से मिलती हूँ।
एक रिक्त स्थान,जिसको भरा तेरे' इंतजार' में।
भर लेती हूँ ,वो रिक्त स्थान,जो सताते ,मुझको !
तेरे समीप न होने का एहसास दिलाते मुझको !
जीवन की मेरे ,शून्यता को समझ पाओगे ,क्या ?
प्रश्न को जगह दी,रिक्तता को समझ पाओगे क्या ?
जीवन के कुछ पन्ने, तेरी यादों ,तेरे इंतज़ार के हैं।
आओगे !जब,जीवन की रिक्तता भर पाओगे क्या ?
तुम हो ,दूर ही सही तेरे होने का एहसास है ,मुझे।
छूट गए जो ख़ाली पन्ने ,तहरीर लिख पाओगे क्या ?
सब कुछ है ,मेरे क़रीब !एक '' तू'' तेरा इश्क़ नहीं ,
इस जीवन के ''रिक्त स्थान ''को भर पाओगे क्या ?
