Jaam

दोस्तों और बहनों !आप सभी को मेरा नमस्कार ! देश की आबादी  इतनी  बढ़ गयी है ,कहीं भी चले जाइये ,वहीं भीड़ -भाड़ और धक्का -मुक्की है। किसी भी लाइन में खड़े हो जाइये ,प्रतियोगिता के साथ -साथ ,आगे बढ़ने की धक्का मुक्की। शिक्षा के क्षेत्र में जाइये ,वहाँ भी बच्चों का हाथ पकड़े, माता -पिता पहले तो फार्म लेने की लाइन में ,फिर बच्चों के साथ -साथ साक्षात्कार की लाइन में खड़े दिखाई देंगे। जिनके माता -पिता अंग्रेजी नहीं जानते या कम पढ़े -लिखे हैं ,उनके बच्चों के तो दाखिले ही  न हों। इतनी मेहनत मशक्क़त के पश्चात भी ,माता -पिता को आराम नहीं ,उसके बाद बच्चे को पढ़ाना ,''गृहकार्य कराना ''ये भी माता -पिता की ज़िम्मेदारी ,समय नहीं है ,तब अलग से ''व्यक्तिगत अध्यापक ''की व्यवस्था।


 

पहले तो स्वयं पढ़ो। नौकरी करो, फिर से ,बच्चों के साथ अभ्यास कार्य प्रारम्भ करो। अपने रोज़गार के लिए धक्के खाये। लाइन में लगे ,भीड़ में शामिल हुए और अब बच्चों के लिए ,परेशान रहो। बस यूँ ही ज़िंदगी का सफ़र समाप्त हो जाता है और बाद आदमी सोचता है ,ज़िंदगी को अभी तो समझना ही आरंम्भ किया और समाप्त होने की कगार पर आ गई। 

आज गर्मी भी बहुत है ,तभी अपनी साड़ी के पल्ले से पंखा सा करती नंदिनी आती है। 

आज कहाँ रह गयी ?पूरे आधा घंटे देरी से आई हो।

क्या बताऊं  ? दीदी ! जाम में फंस गयी। इसी समय तो बच्चों की छुट्टी होती है और उसी समय इतना यातायात होता है कि निकलना मुश्किल हो जाता है। जहाँ से ,मैं आती हूँ ,उस रास्ते में ,दो स्कूल पड़ते हैं और आप देखो ,दीदी !इतनी गर्मी में भी भीड़ का ये हाल है। रिक्शे ,टेम्पो ,और बस वालों की चिल्ल पों में न जाने कैसे -कैसे निकलकर आई हूँ ?

तभी रेनू को शरारत सूझी और बोली -'' ज़ाम पीना छोड़ दिया मैंने ,जब से मैंने तुमसे मुहब्बत का वादा किया।'' 

ये आप क्या कह रही हैं ?मैं तो जाम की बात कर रही हूँ नंदिनी बोली। 

मैं भी ज़ाम की ही बात कर रही हूँ। दोनों में ही आदमी फंसकर रह जाता है। एक में मज़ा है ,और एक में सज़ा है। रेनू बोली।

 वाह जी वाह !आपने कहाँ की बात कहाँ लाकर जोड़ दी ?चिढ़कर बोली -अपनी ही धुन में मस्त रहती हैं।

और क्या अब इस गर्मी में  ?गर्मी का रोना रोती रहूं ,जो हो गया सो हो गया यार...... चिल करो !

क्या बात है ?आज क्या सुबह  -सुबह ही पी ली ?भाई साहब तो काम पर गए होंगे और आप यहाँ इस तरह ,ज़ाम की बातें कर रही हैं। 

मैडम !ज़ाम बोतल से ही नहीं ,नजरों से भी पीया जाता है। रेनू जी ने तो वहाँ का वातावरण ही बदलकर रख दिया। रोना तो ज़िंदगी भर का है कभी हँस भी लिया करो। गर्मी है ,तो सबके लिए ही है , भीड़ है तो वो भी सभी के लिए है। हम तो ताउम्र बस कभी भीड़ को लेकर ,कभी जाम को लेकर ,कभी लाइनों को लेकर ,उम्रभर किया ही क्या है ?रोना ही रोया है। 

ये बात तो आप सही कह रहीं हैं ,ये भी जीवन के ही हिस्से हैं ,परेशानी होती है तो कहना भी पड़  ही जाता है , काजल बोली।

कहो किसने रोका है ?किन्तु उस बात को लेकर मत बैठो ,ज़िंदगी को यूँ 'बेज़ार 'न करो ''जियो और जीने दो। ''

आज तो मुझे लगता है ,रेनू दीदी ने पी  है या फिर गर्मी उनके दिमाग़ पर चढ़ गयी है।


 उसके जबाब में ,रेनू अपनी ही मस्ती में बोली -''ज़ाम  क्या पिया ?उनकी शोख़ निग़ाहों से। 

                                                                             लोगों ने मुझे शराबी समझ लिया। ''

कहकर उन्होंने गाना  चला  दिया  - मुझको यारों माफ करना ,मैं नशे में हूँ। उनके साथ ही ,अन्य बहनें भी उठकर नाचने लगीं और इस तरह हमारी बैठक एक गंभीर विषय ''जाम से होती हुई ,ज़ाम की शायरियों से गुजरते हुए ,मदहोश कर देने वाले नाचने -गाने पर समाप्त हुई। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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