Bhai bahan ka pavitar rishta

वो बड़े प्रेम से ,छोटी सी थाली लाती है ,और बड़े प्रेम से सजाती  है ,जैसा मम्मी ने समझाया -उसने वैसा ही किया ,उसके पश्चात मिठाई और छोटी -छोटी रंग -बिरंगी राखी रखी। स्वयं भी नई फ्रॉक पहनी और भाई को भी माँ ने पहले ही तैयार कर दिया था। उसे नहीं पता ,वो क्या कर रही है और क्यों ?किन्तु ये सब करना उसे अच्छा लग रहा है। जब उसने राखी बाँधी ,बल्कि उससे ठीक से बंधी भी नहीं तब मम्मी ने सहायता की ,तब पापा ने भाई की थाली में ,पचास रूपये रखे अपनी बहन को देने के लिए। उसे तो ये भी नहीं मालूम,इन पैसों का वो क्या करे ?


भाई के दिए पैसे ,वापस पापा को दे दिए ,क्योंकि उन पैसों से उसे कोई सरोकार नहीं ,उसकी आवश्यकताएँ भी इतनी नहीं ,जो भी हैं ,माता -पिता पूर्ण कर देते हैं।तीन - चार वर्ष इसी तरह बीते ।  थोड़ा बड़ी हो ,गयी और अपने स्कूल में भी ,उसने 'भाई -बहन के रिश्ते पर' दस लाइनों का निबंध भी लिखा। अब उसे पता था -कि इस त्यौहार को ''रक्षा -बंधन ''कहते हैं। अबकी बार उसे पैसे मिले ,तब उसने वापस पापा को नहीं दिए।तब तक उसे एहसास हो चुका था ,ये उसके अपने पैसे हैं ,वो उनका जो चाहे ,वही कर सकती है। अभी भी ,इच्छाएं इतनी नहीं बढ़ीं ,सिर्फ टॉफी -चॉकलेट ,या कॉपी -किताबों तक ही सीमित थीं। 

कुछ और वर्ष बढ़े और इच्छायें भी ,अबकी बार तो उसने भाई से कह ही दिया ,तू मुझे पापा से लेकर ,अबकि बार सौ रूपये देगा। पचास रूपये से काम नहीं चलेगा ,मुझे अपने लिए ,टीना जैसी सुंदर फ्रॉक लेनी है ,खूब झालर वाली और मम्मी से जूती दिलवा लूँगी। उस नन्ही सी परी को आवश्यकताओं ने परेशान तो किया ही साथ भी ,अपने लिए चिंतित भी ,कि उसे अपनी पोशाक से मिलती -जुलती जूती भी पहननी हैं और इसका जुगाड़ ,मम्मी से ,कहने पर होगा। 

अब तो कहने की आवश्यकता ही नहीं ,ये उसके उड़ने के दिन थे ,उसे उड़ने के लिए ,पंख चाहिए। शिक्षा ,सुंदरता और कल्पनाओं में खोना ,ख्वाब देखना ये सभी चीजें , उसके जीवन में ,प्रविष्ट कर चुकी थीं। उसके लिए अब ये त्यौहार आता किन्तु अधिक से अधिक पैसों की मांग बढ़ती। कभी -कभी तो वो दर्शा देती ,कि वो उसे राखी बांधकर भाई पर  एहसान कर रही है। भाई भी ,उसकी ख़्वाहिश पूरी होते देख ,चिढ़ जाता। इसे ही पैसे मिलते हैं ,मुझे नहीं। कभी -कभी झगड़ा होता तो वो कहता -अब दूंगा ,तुझे राखी पर पैसे ,ठेंगा मिलेगा ,ठेंगा...... मैं राखी ही नहीं ,बँधवाउंगा। 

वो भी कहती -देखती हूँ ,तू कैसे राखी नहीं ,बंधवाता है ?बच्चू पैसे तो मैं लेकर रहूंगी। माता -पिता बच्चों की ये नोक -झोंक देखकर मुस्कुराते हँसते।

एक दिन वो अपनी ससुराल चली गयी ,ससुराल से ,गाड़ी में भरकर ,उपहार लाती और इसी तरह ले भी जाती ,ताकि ससुराल में किसी को कुछ भी कहने का मौका न मिले। कभी -कभी तो पापा से भी लड़ बैठती ,सालभर का त्यौहार है ,और ये कंजूस क्या दे रहा है ?अब बच्ची नहीं रही ,कि बहका लोगे ,अब तो कमाने भी लगा है ,लाखों कमाता है और बहन को बस ये दो हज़ार ,इतने कि तो अच्छी सी साड़ी भी लेने लगी तो वो भी नहीं आयेगी। चुपचाप दस हजार निकाल ,और सौदा होते ,मामला पांच पर निपटता। बाक़ी पापा और मम्मी संभालते। 


पापा -मम्मी नहीं रहे ,भाई का विवाह भी हो गया। अब तो ,जैसे वो भी समझदार हो गयी। काफी दुनिया देख ली। भाई की भी ,अपनी गृहस्थी है ,भाभी की भी इच्छाएं हैं ,क्या तुम्हारी बहन के लिए ही करते रहेंगे ? हमारे खर्चे नहीं हैं।मुँह उठाये ,चली आती है ,उसे खुद भी तो सोचना चाहिए। ऐसा उसने अपने कानों से सुना। भाई अपनी बहन से ऐसा कुछ भी नहीं कहना चाहता किन्तु मन में तो ,उसके भी ये बातें घर कर गयीं। आज भी , वो राखी लेकर आती किन्तु उतना अधिकार  नहीं जतला पाती ,भाई जो थाली में ,रख देता चुपचाप लेकर चली जाती है। अधिकार के साथ ही ,उसकी इच्छाएँ भी कहीं किसी कोने में पहले तो सिसकतीं थीं  ,और धीरे -धीरे ,उसकी जगह एक गरिमामयी ,बड़ी बहन ने जन्म लिया ,जो आज पूछती है -तुझे कोई परेशानी हो तो हमें बताना ,मैं और तेरे जीजा तेरे साथ हैं। हालाँकि उसने कुछ अपमान झेला किन्तु समय ने ,उसे कमजोर बेल नहीं ,एक पेड़ बना दिया।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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