Bechari......[part 42]

अभी तक आपने पढ़ा -भैरों बाबा ,अपनी शक्ति से पता लगाने का प्रयास करते हैं कि वो कौन सी शक्ति है? जो हाइवे पर इतनी दुर्घटनाएँ करवा रही है ,इस सब बात का पता लगाने के लिए ,''प्रदीप की आत्मा '' सहायता करने का प्रयास करती है किन्तु वहां की नकारात्मक शक्तियाँ ,उसे खदेड़ देती हैं ,क्योंकि वो एक सच्ची और कमजोर आत्मा है। बाबा अपने तरीक़े से प्रयास करते हैं और वो सफ़ल  होते हैं ,एक आत्मा जो उनकी सहायता के लिए तैयार हो जाती है। और बाबा को आकर बताती है -अब आगे -


मैंने आपके कथनानुसार ,उस आत्मा से कहा -मैं आप लोगों का साथ देने के लिए तैयार हूँ। उसने मुझे अपने बंधनो से मुक्त किया और अपने संग चलने की भी इजाज़त दे दी। उसने उस स्थान पर  नकारात्मक ऊर्जाओं का घेरा बनाया हुआ है। उस घेरे में उसके बिना कोई प्रवेश नहीं कर सकता। मैंने उस घेरे में प्रवेश किया ,उसका उद्देश्य सम्पूर्ण  ''मानव जाति ''का विनाश कर आत्माओं की एक फ़ौज तैयार करना है और दोनों लोक में अपना राज्य स्थापित करना चाहती है। इसके लिए ,उसने एक मानव तन का सहारा लिया है। अपनी शक्तियों से ,वो दुर्घटनाएं करवाती है। उस मानव को तो पता ही नहीं ,कि वो क्या कर रहा है ?वो उसी के वश में है। 

ऋचा और बाबा मानव तन के नाम पर ,चौंक गए। उसने आगे बताया -वो दुर्घटना में ,मरे व्यक्ति की आत्मा को अपने वश में करता है और उसके तन का रसपान कर आनन्दानुभूति महसूस करता है। सभी आत्मायें उसके तन के  टुकड़ों को खाना चाहती हैं तो किसी के भी तन में प्रविष्ट कर जाती हैं ,जो भी व्यक्ति उस दायरे में आ जाता है। उसकी आतें ,दिल सब नोंच -नोंचकर उसके तन को इतना विकृत कर देती हैं ,देखने वाले की तो ,हालत ही खराब हो जाये। वहां तो........ आत्माओं द्वारा वहशीपन और दरिंदगी का नंगा नाच हो रहा है। 

तब बाबा समझ गए ,ये कार्य तो ''नितिका ''का ही हो सकता है।'' मानव तन ''उसने अपने पति का तन  ही तो प्राप्त किया हुआ है। वो उससे अनजाने में ही ,न जाने कितने अपराध करा रही है ?अब तो उसका मरना  भी आवश्यक है ,पता नहीं ,और वो कितने बेगुनाहों की जान लेगी ?उन्होंने ऋचा को सभी बातें बताईं। ऋचा को जब मालूम हुआ ,प्रत्यक्ष में तो ,मेरे पापा ही इन सभी अपराधों के दोषी हैं तो उसे बहुत दुःख होता है। 

बाबा ,इसका कोई उपाय...... ?

बस इसका एक ही उपाय है ,उनकी मौत !वो तो जीते जी वैसे ही मर गए हैं। अपना तो कुछ ,पता ही नहीं उसके वश में है। तुम्हारे लिए तो तभी मर गए थे ,एक उम्मीद तो बाक़ी थी ,किन्तु इन हादसों के पश्चात ,अब उनसे मिलने की भी उम्मीद नहीं है। अब तो उनका अंत ही ,रास्ता है। 

ऋचा को दुःख तो हुआ किन्तु अब वो समझ चुकी थी ,उसके पापा जीते हुए भी ,मौत के बराबर हैं ,और वो बाबा को मौन स्वीकृति देती है। बाबा वो यंत्र... तो..... 

हाँ ,मैं जानता हूँ ,वो खंडित हो चुका है ,दुबारा वो यंत्र तैयार करना होगा।

 वहां हम तो जा नहीं सकते ,फिर ये कैसे सम्भव है ?

बाबा ने कुछ सोचते हुए ,कहा -इसका भी हल निकालेंगे। 

अगले दिन वो अपने तंत्र द्वारा यंत्र तैयार करते हैं और उस आत्मा से मानसिक सम्पर्क साधते हैं और उस आत्मा को ,पृथ्वी पर आने का आमंत्रण देते हैं।बाबा ऋचा को लेकर ,उसी स्थान के करीब जाते हैं।एक निश्चित सीमा से आगे वे नहीं जा सके।  उस स्थान पर चील -कौवें मंडरा रहे थे।क्षत- विक्षत शव पड़े थे ,जिन्हे कोई डर के कारण लेने या उनकी शिनाख़्त कराने भी नहीं आया। उनकी हालत ऐसी थी ,उनकी शिनाख़्त होती भी नहीं। अपनी' जान से हाथ और धोने पड़ जाते।''उन टुकड़ों पर कीड़े रेंग रहे थे ,वहां के वातावरण में भयंकर बदबू फैली थी। मौत  का सन्नाटा था ,उस बदबू से ऋचा का जी मिचलाने लगा। वो बाबा से बोली -मैं ये कार्य नहीं कर पाऊँगी।

बाबा बोले -उस स्थान से तो हम ,अभी काफी दूर हैं। दिन में तो मैं  तुम्हें दिखाने लाया हूँ किन्तु ये कार्य तो तुम्हें रात्रि में करना होगा। 

बाबा ये आप क्या कह रहे हैं ?ये सब मुझसे नहीं होगा। मैं नहीं जानती ,इससे आगे के हालात इससे कितने अधिक बिगड़े हुए हैं ?यहाँ तो ''मौत तांडव ''कर रही है।

यदि तुम ये कार्य नहीं करती हो तो ,पता नहीं ,ये सिलसिला कब तक यूँ ही चलता रहेगा ? उसे और कोई नहीं मार सकता और आगे से ,इन सभी हत्याओं की दोषी तुम होंगी। 

ये आप क्या कह रहे हैं ?ऋचा परेशान होते हुए बोली। 


ठीक ही तो कह रहा हूँ ,यदि इन हादसों की वज़ह जानते हुए भी ,तुम ये कार्य नहीं करना चाहती हो तो और कौन  जिम्मेदार होगा ? वहां की हालात देखकर ऋचा को दुःख तो बहुत होता है किन्तु अन्य लोगों की जान बचाने के लिए ,मुझे  हिम्मत करनी ही होगी। 

रात्रि में ,वो आत्मा ऋचा के ,शरीर में आ जाती है ,और उसे अपने संग ले चलती है। ऋचा के पास में पवित्र यंत्र था ,जिस कारण उस ,आत्मा को थोड़ा कष्ट भी हो रहा था। अभी तो ऋचा  को कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था क्योंकि वो अभी ,उस आत्मा के वश में थी। किन्तु जैसे ही वोआत्मा उसके तन से अलग होगी वो अपने आप में लौट आएँगी और तभी इस यंत्र का प्रयोग कर सकती है। 

बाबा को उस आत्मा पर पूर्णतः विश्वास  नहीं था ,समय आने पर बदल भी सकती है या फिर उस आत्मा द्वारा विवश की जा सकती है। 

ये कहानी ,अब समाप्त  होने की कगार पर है ,किन्तु आप लोगों का सहयोग नहीं मिल पा रहा ,न ही कोई स्टिकर और पांच स्टार भी कम ही , पढ़ भी कम रहे हैं। क्या उभरते कलाकार मेहनत नहीं करते ?उन्हें बल्कि सबसे ज्यादा प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है।आपने सहयोग दीजिये।   


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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