Antarman ki aawaz

''अंतर्मन की आवाज '',सुनने से पहले, हमें ये जानना है ,कि अंतर्मन क्या है ?कुछ लोग दिल की आवाज को ही अंतर्मन की आवाज समझ लेते हैं। किन्तु अंतर्मन की आवाज़ और दिल की आवाज में उतना ही अंतर् है जितना सही और गलत में ,झूठ और सच में।दिल की आवाज़ या कहो ,मन की आवाज वो तो हमें समय-समय पर विचलित करती रहती है। 


एक उदाहरण से हम जान सकते हैं -हम कोई भी एक कार्य कर रहे  हैं किन्तु तभी हमारा मन उस कार्य से ध्यान भटकाकर ,दूसरी और ले जाता है। उसे मन के द्वारा एहसास होता है जिस कार्य को कर रहा हूँ ,यदि आलसी प्रकृति का व्यक्ति होता है तो वो सरल रास्ता चुनना चाहेगा। तब वो उस कार्य को छोड़कर उसका मन दूसरे कार्य के लिए भटकेगा जो सरलता से हो जाये , किन्तु उसके 'अंतर्मन की आवाज़ '' उसे ऐसा करने से रोकेगी- कि नहीं थोड़ी मेहनत की और आवश्यकता है ,बस कार्य हुआ ही समझो। 

इससे पता चलता है ,इसमें मानव  प्रकृति [स्वभाव ]भी  अपना सहयोग देती है ,जो व्यक्ति जैसे स्वभाव का होगा उसी आधार पर ही ,अपने मन की बात सुनता है। ''वो मन जो भटकाव पैदा करता है किन्तु अंतर्मन की आवाज सही दिशा निर्देशन करती है।'' जिस प्रकार सही -गलत की भी ,कोई निश्चित परिभाषा नहीं है ,हमारी दृष्टि में जो कार्य गलत है ,वही दूसरे व्यक्ति की नजर में उचित भी हो सकता है। इसीलिए मानव अधिकतर अपने मन की ही सुनता है ,अंतर्मन की आवाज को ज्यादातर नकार जाता है। यदि वो अपने अंतर्मन की आवाज सुनेगा तो उसका स्वार्थ सिद्ध नहीं होगा। 

पुराने चलचित्रों में भी कभी -कभी ऐसा ही सीन दिखाते थे ,कि एक तरफ श्वेत वस्त्रों में और सिर पर श्वेत घेरा लगाए परी दिखाते थे ,दूसरी तरफ काले लबादे में उसी की तस्वीर है ,एक तरफ उसकी आत्मा और दूसरी तरफ उसका विचलित मन। जिसको हम आम भाषा में कह देते हैं -'मेरे दो मन हो रहे हैं ',एक कह रहा है -कि ये कार्य करो ,दूसरा मन कह रहा है ,नहीं। इसी को हम ''अंतर्दवंद ''भी कह देते हैं। जब व्यक्ति बुरे कार्य करते -करते थकता नहीं है ,तब हम में से ही कोई उसे धिक्कारता है ,तुम्हारी आत्मा बिलकुल ही मर चुकी है या तुमने अपनी आत्मा को कहीं बेच या गिरवी रख दिया। हम लेखकों को भी तो हमारे ,अंतर्मन की आवाज़ ही तो ,कुछ गलत के विरुद्ध लिखने के लिए ,प्रेरित करती है,*  कि अपना हथियार उठाओ !और सही साहित्य का सृजन करो।'' 


सीधे -सीधे लफ्जों में कह सकते हैं -हमारे मन की आवाज स्वार्थी और अपनी ही ख़ुशी चाहने वाली होती है ,जो हमें समय -समय पर भटका भी देती है। अंतर्मन की आवाज़ सही दिशा निर्देशन करती है ,और मन को भी एकाग्रचित्त होने के लिए ,समय -समय पर प्रेरित करती रहती है।'' किन्तु मानव इतना चालाक है ,सुनता अपने मन की है। अंतर्मन की आवाज को दरकिनार रख देता है ,यदि अंतर्मन की आवाज़ हर व्यक्ति सुनने लगा तो शायद संसार में बहुत कुछ सही हो जाये। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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